गुरु वचन – अहंकार नाशी

बहुत तरह के संबंध होते हैं हमारे।

सबसे निचले तल पर शरीर से शरीर का संबंध होता ही है, और ध्यान से आप देखेंगे तो अधिकांशतः जो हमारे संबंध होते हैं वह इसी श्रेणी में आते हैं, शरीर से शरीर। शरीर का अर्थ है पदार्थ, जहाँ कहीं भी व्यक्ति पदार्थ भर है वहाँ संबंध शरीर से शरीर तक का है।

फ़िर आप उससे थोड़ा ऊपर उठते हैं, तो मन के संबंध बनने लग जाते है। यहाँ पर कम ध्यान दिया जाता है कि आप दिखते कैसे हो, यहाँ पर ध्यान इस पर चला जाता है कि आप सोचते कैसे हो। आपकी विचारणा कैसी है, आप किस विचारधारा से आ रहे हो, आपके मत कैसे हैं।

फ़िर एक संबंध होता है गुरु का और शिष्य का, प्रेम का संबंध, यह अपने आप में अकेला संबंध है जो न शरीर का है न मन का है, यह संबंध कहीं और का है। पर यह कहाँ का है यह आप कैसे जानोगे जबतक आपने अपने आप को शरीर और मन ही समझा है?

इसी कारण गुरु रहें आते हैं, पड़े रह जाते हैं, पूरा अस्तित्व ही गुरु है, गुरुओं की कोई कमी नहीं, लेकिन उनसे लाभ किसी को नहीं मिल पाता।

समाज द्वारा संस्कारित मन निजता से अनछुआ

तुम जब किसी से मिलते हो, तो उससे व्यक्ति की तरह कहाँ मिलते हो| तुम उससे ऐसे मिलते हो कि “ये तो मेरा भाई है, कि पति है, कि यार है, या कोई अनजाना है, या माँ है”| आदमी और आदमी कहाँ मिल पाते हैं?

एक आदमी होता है और दूसरा आदमी होता है, और इन दोनों से बहुत ज़्यादा ताक़तवर एक समाज, एक मालिक बैठा होता है| जो इस बात को फ़ैसला कर रहा होता है कि ये दोनों आपस में कैसे सम्बंधित होंगे|

तो जो संबंध हैं, वो दो व्यक्तियों के बीच में तो कभी होते ही नहीं हैं| वो तो दो धारणाओं के बीच में होते हैं, दो मशीनों के बीच में होते हैं| दो मशीन आपस में पूर्व-निर्धारित तरीके से कोई संबंध स्थापित कर लेती हैं| निश्चित रूप से ये इंडिविजुएल्टी तो नहीं है| और इसी बात को आप समाज की महत्ता बोलते हो, और समाज का आविष्कार भी इसीलिए हुआ है|

असंबद्धता स्वभाव है तुम्हारा

जो परम को भुला कर संसार की ओर जायेगा,
वो संसार में मात्र चोट खायेगा।

जो संसार को भूल कर, परम की ओर जायेगा,
वो परम को तो पायेगा ही, संसार को भी पा जायेगा।

मोह भय में मरे, प्रेम चिंता न करे

इंसान की गहरी से गहरी प्यास होती है प्रेम की; वो जब मिलती नहीं है तो दिमाग बिल्कुल रुखा-सूखा और भ्रष्ट हो जाता है । प्रेम कल की परवाह नहीं करता, वो समझदार होता है, वो अच्छे से जानता है कि कल आज से ही निकलेगा । प्रेम कहता है आज में पूरी तरह से डूबो, आज अगर सुन्दर है तो कल की चिंता करने की ज़रूरत ही नहीं । ये प्रेम का अनिवार्य लक्षण है कि प्रेम आज में जियेगा ।

कल की फ़िक्र करेगा नहीं क्योंकि प्रेम बहुत समझदार है और वो अच्छे से जानता है कि जिसने आज को पूरा-पूरा जी लिया, पी लिया उसका कल अपनेआप ठीक रहेगा, बिना फ़िक्र किये । पर जहाँ प्रेम नहीं होता वहाँ आज की अवहेलना कर दी जाती है और कल की कल्पना की जाती है । आज की अवहेलना, कल की कल्पना ।

मैं लड़कियों से बात क्यों नहीं कर पाता?

ऐसे लोगों से बचना जिन्हें आँख बचा कर बात करने की आदत हो। और बहुत हैं ऐसे। ऐसे क्षणों से भी बचना जिसमें सहज भाव से, निर्मल भाव से, सरल होकर, निर्दोष होकर किसी को देख ना पाओ। ऐसे क्षणों से भी बचना।

एक नज़र होती है जो समर्पण में झुकती है, प्यारी है वो नज़र। और एक नज़र होती है जो ग्लानि में और अपराध की तैयारी में झुकती है, उस नज़र से बचना।

हमारे रिश्तों की वास्तविकता

जो कुछ भी जन्म से आया है, जो कुछ भी जीवन में मिला है, वो तो चला ही जाना है। इनके आने और जाने को अगर परख लिया, तब तो सत्य फिर भी परिलक्षित हो सकता है, लेकिन ये स्वयं सत्य नहीं बता पाएँगे। जो कुछ भी आया है वो तो खुद द्वैत में है। वो कैसे अद्वैत का पता देगा?

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