मन को देखना मग्नता

श्रोता:  ‘सविकल्प समाधि’ में कोई एक विचार रह जाता है?

आचार्य प्रशांत: नहीं, एक विचार नहीं। देखो, यह सब भाषा की बातें हैं| एक विचार रह सकता है कभी? अगर मात्र एक हो, तो क्या तुम एक को भी जान पाओगे? तुम एक को जान ही तभी सकते हो जब एक से ज्यादा हों।

तुम स्पेस  में हो, और स्पेस में सिर्फ एक है, स्पेस। क्या तुम जान पाओगे कि यह स्पेस  है? और कोई मापदंड ही नहीं है उसको स्पेस  बोलने के लिए। एक को तभी जाना जा सकता है जब एक से ज्यादा हों। तो सविकल्प समाधि में यह कहना कि एक रह जाता है, कहने की बात है। विकल्प का मतलब ही है ‘दो’।
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जो अच्छा होता है कोई उसका फायदा नहीं उठा सकता

जो अच्छा होता है कोई उसका फायदा नहीं उठा सकता| हाँ, जो अच्छा होता है उससे सबका फायदा होता जरूर है| दोनों बातों में बड़ा

चालाक आदमी को उसकी चालाकी ही भारी पड़ती है

कोई भी तुम्हें लूटता बाद में है पहले तुम्हें ललचाता है| जब तक तुम ललचाए नहीं गए तुम लुट नहीं सकते, मैं उन स्थितियों की बात नहीं कर रहा हूं कि जहाँ कोई आकर के तुम्हारे ऊपर बंदूक ही रखकर लूट ले| आमतौर पर यदि हम सौ बार लूटते हैं तो निन्यानवे बार इसलिए नहीं लूटते कि किसी ने बंदूक रखकर लुटा था, निन्यानवे बार इसलिए लुटते हैं क्योंकि किसी ने लालच का जाल बिछाया था और हम जा कर के उसमें फंस गए| और अच्छे आदमी का कोई फायदा नहीं उठा सकता, अच्छे आदमी को लूटा जा ही नहीं सकता, अच्छे होने का फायदा ही यही है कि कोई तुम्हारा फायदा नहीं उठा पाएगा अब|
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