पढ़ाई में मन क्यों नहीं लगता? || आचार्य प्रशांत (2016)

क़िताब डराती सिर्फ़ इसलिए है क्योंकि तुम क़िताब से वो माँग रहे हो जो कोई क़िताब तुम्हें नहीं दे सकती।

तुम क़िताब को सहज तरीक़े से नहीं पढ़ते।

तुम क़िताब को ऐसे पढ़ते हो कि पढ़ लिया, तो परिणाम आएगा, परिणाम आया तो ये मिलेगा, ये मिला तो जीवन बनेगा।

जीवन कोई बनाने की चीज़ है?

मन को मुक्ति की ओर कैसे बढ़ाएँ? || आचार्य प्रशांत, तत्वबोध पर (2019)

जब तुम अपनी वास्तविक इच्छा के प्रति ज़रा सजग, ज़रा संवेदनशील होते हो, तब तुम मुक्ति की ओर मुड़ते हो। 

दुःख से बड़ा मित्र तुम्हारा कोई नहीं।

भला हो कि तुममें दुःख के प्रति संवेदनशीलता बढ़े, तुम जान पाओ कि आम आदमी – तुम, मैं, सभी – कितने दुःख में जीते हैं।

जैसे-जैसे दुःख का एहसास सघन होता जाएगा,वैसे-वैसे मुक्ति की अभीप्सा प्रबल होती जाएगी।

अध्यात्म है दोनों से आज़ादी ||आचार्य प्रशांत, ज़ेन कोआन पर 2018

अध्यात्म न दाएँ से आसक्त हो जाने का नाम है, और न बाएँ से।

अध्यात्म न बंद मुट्ठी का नाम है, और न ही खुली मुट्ठी का नाम है।

अध्यात्म का अर्थ है – बंद मुट्ठी से आज़ादी और खुली मुट्ठी से भी आज़ादी।

माँसाहार भोजन नहीं || आचार्य प्रशांत (2019)

ये सिर्फ़ इसीलिए है क्योंकि ज़िंदगी में प्रेम नहीं जानते, बहुत कमी है प्रेम की।

पशुओं से क्या, इंसानों से भी प्रेम नहीं है।

तुम्हें कभी किसी से सच्ची मोहब्बत हो जाए, उसके बाद माँस नहीं खा पाओगे।

मोहब्बत छोड़ दो, तुम्हें मोह भी हो जाए, तो भी माँस खाना मुश्किल हो जाएगा।

ठंड रख! || आचार्य प्रशांत (2019)

हमें पता होना चाहिए कि इससे आगे हम नहीं झेलेंगे।

कोई भी चीज़ इस संसार की इतनी क़ीमती नहीं कि उसके लिए अपनी आत्यंतिक शांति को दाँव पर लगा दें।  

जब तक बाहर-बाहर कोलाहल है, तब तक हम बर्दाश्त कर लेंगे।

जैसे ही पाएँगे कोलाहल अब आत्मा पर छाने लगा है, हम कहेंगे, “अजी हटो!”

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)

जो वास्तव में बड़ा होता जाता है, कर्म वो भी करता है, पर उन कर्मों से उसकी कोई लिप्तता, कोई वासना नहीं होती।

कर्म भर करता है, फल छोड़ देता है।

फल दूसरों के लिए हैं।

अपनी इच्छा ही नहीं है कुछ पाने की।

कर्म पूरा है, फल की इच्छा नहीं है।

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