केसरी फ़िल्म, कैसे और बेहतर हो सकती थी?|| आचार्य प्रशांत (2019)

वीरता मूलतः आध्यात्मिक ही होती है।

वीरता कोई अहंकार की बात नहीं होती कि – लड़ जाएँगे, भिड़ जाएँगे, मर जाएँगे।

न।

अहंकार पर आधारित जो वीरता होती है वो बड़ी उथली होती है, थोड़ी दूर चलती है फ़िर गिर जाती है।

ऐसी वीरता जो शहादत को चुनने ले, वो तो आध्यात्मिक ही होगी।  

व्यर्थ चीज़ों को जीवन से कैसे हटाएँ? || आचार्य प्रशांत, आत्मबोध पर (2019)

जीवन को साफ़-साफ़ देखकर के जब तुम समझने लगते हो कि कौन-सा काम तुम्हारी सच्च्चाई से निकल रहा है, और कौन-सा काम तुम्हारी कमज़ोरी से, या तुम्हारे डर से, या तुम्हारे लालच से निकल रहा है, तो उससे एक आग पैदा होती है जो जीवन की सब अशुद्धताओं को जला देती है।  

नारी के लिए आकर्षण हो तो || आचार्य प्रशांत (2019)

कुछ तो हो जाओ शरीर से आगे के, तो फिर तुम्हें दुनिया भी फिर शरीर से आगे की दिखाई दे।

नहीं तो दुनिया का कामकाज चलता रहेगा, तुम्हारी नज़र बस माँस पर रहेगी। 

दुनिया को माँस की तरह देखना छोड़ना हो, तो स्वयं को माँस की तरह देखना छोड़ो।

तुम स्वयं जितने ऊँचे उठते जाओगे, दुनिया को देखने का तुम्हारा नज़रिया भी बदलता जाएगा।

क्या पुनर्जन्म होता है? || आचार्य प्रशांत (2018)

तुम जो कुछ हो , उसका कोई पुनर्जन्म नहीं होता।

तुम्हारा कोई पुनर्जन्म नहीं होता।

जहाँ तक आत्मा के पुनर्जन्म की बात है, वो पुनर्जन्म नहीं है।

वो खेल है, वो लीला है।  

लड़का-लड़की के खेल में जवानी की बर्बादी || आचार्य प्रशांत (2019)

कोई नहीं अपनी जवानी के पाँच साल ख़राब करे, अगर उसके पीछे लोग न हों जो उसको बैठाकर खिला न रहे हों।

हिम्मत ही नहीं पड़ेगी।

ये बात न प्रेम की है, न भावनाओं की है, न प्रतियोगी परीक्षा में असफलता की है, बात सीधी-सीधी ये है कि अधिकाँश ऐसे मामलों में पीछे माँ-बाप बैठे होते हैं, जो लड़के को घर में बैठाकर आसरा देने तैयार होते हैं।

पढ़ाई के किसी विषय में रुचि न हो तो? || आचार्य प्रशांत (2019)

रुचि छोटी चीज़ होती है, सत्यता बड़ी चीज़ होती है।

अहंकार कहता है, “रुचि को प्रधानता दो।”

अध्यात्म कहता है, “धर्म प्रधान है।”

अध्यात्म का अर्थ ही है – रुचि की परवाह ही न करना और उस तरफ़ चलना जिस तरफ़ धर्म है, जिधर सत्य है।

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