बदलो नहीं, समझो

तुम्हारी हर इच्छा, हर वस्तु, हर राह, हर कोशिश सिर्फ़ अपने स्त्रोत तक पहुँचने के प्रयास हैं। लेकिन जीवन के कुछ विकृत प्रभाव हैं जिनके कारण तुम परोक्ष रास्ते ले लेते हो – जैसे हत्या, चोरी, सिगरेट, महत्वाकांक्षा। परन्तु अस्तित्व में कुछ भी घृणित नहीं होता, अतः कुछ भी बदलने की चेष्टा मत करो। सिर्फ समझो। सही बदलाव समझ में स्वतः हो जायेगा।

माँ-बाप मुझे समझते क्यों नहीं?

कौन है जो कुछ भी समझता है? क्या कोई भी कुछ भी समझ रहा है? सब सिर्फ एक सोच के गुलाम हैं। माँ-बाप भी ऐसे ही लोगों में से हैं। तो इसमें ताजुब्ब क्या है कि उन्हें कुछ भी क्यों नहीं समझ आता? माँ-बाप हो जाने से अचानक आप में कोई दैविक गुण तो आ नहीं जाएंगे। माँ-बाप हो जाना तो सिर्फ एक शारीरिक प्रक्रिया है।

स्थिरता क्या है ?

स्थिर कुछ भी नहीं है। सब गतिशील है। जो कुछ स्थिर सा प्रतीत होता है वो किसी सन्दर्भ में होता है। तो वाकई कुछ भी स्थिर है क्या? हाँ। स्थिर है तुम्हारी समझ, तुम्हारी जानने की शक्ति।

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