एकाग्रता क्यों नहीं बनती? || आचार्य प्रशांत (2017)

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मन को कैसे एकाग्र करें? || आचार्य प्रशांत (2017)

मुक्त अस्तित्व का न होना ही कष्ट है।

‘कमी है’ के भाव को जितना पोषण दोगे, उतना ज़्यादा मन मलिन होता जाएगा, धूमिल होता जाएगा।

मन को संयमित कैसे करें? || आचार्य प्रशांत (2019)

संसार में ही ख़ास तरह के विषय होते हैं, जिनके पास जाओ अगर, तो वो संसार से आगे, संसार से पलटकर, तुमको आत्मा की ओर ले जाते हैं।

आत्मा पर संयम करने का अर्थ हुआ, मन के सन्दर्भ में – संसार के उस विषय पर संयम करना, जो तुम्हें आत्मा तक ले जा सके।

वो विषय आपके व्यक्तित्व पर निर्भर करते हुए अलग-अलग होता है।

एकाग्रता और आदतों का प्रभाव || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2017)

दूसरों की समस्या हल करने के लिए सबसे पहले तो ये ज़रूरी है कि उसकी समस्या कहीं तुम्हारी समस्या न बन जाए।

किसी की बीमारी हटाने के लिए सबसे पहले ये ज़रूरी है कि उसकी बीमारी तुम्हारी बीमारी न बन जाए।

तुम स्वस्थ रहो।

वो बीमार है, और तुम उसको तब तक स्वास्थ्य तक ला सकते हो, जब तक तुम स्वस्थ हो।

पर तुम भी बीमार, वो भी बीमार, तो अँधा-अँधे को सहारा नहीं दे पाएगा।

पढ़ने बैठो तो मन भागता है || आचार्य प्रशांत (2020)

विद्या-अविद्या दोनों साथ होने चाहिए।

इस डर से कि अविद्या तुममें देहभाव और प्रबल कर देगी, अविद्या को छोड़ा नहीं जा सकता।

दुनिया के बारे में भी जानना ज़रूरी है।

एकदम कुछ नहीं जानोगे, भोंदू रहोगे, कुछ पता ही नहीं है दुनिया का, तो फिर अध्यात्म भी तुम्हें समझ नहीं आएगा।

मन सही लक्ष्य से भटक क्यों जाता है? || आचार्य प्रशांत (2019)

अपनी हालत को गौर से देखो तो, चित्त भटकना बंद हो जाएगा।

फिर एक ही चीत्कार उठेगा – “आज़ादी, आज़ादी। और कुछ नहीं चाहिए, बस आज़ादी।”

जितने अँधेरे में तुम जिओगे, उतने तुम्हारे पास सपने होंगे।

ज़रा प्रकाश तो जलाओ।

हटाओ सपने, ज़िंदगी की हक़ीक़त देखो।

फिर बताना मुझे कि – क्या मन अभी-भी इधर-उधर विचलित होता है, भटकता है? 

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