मुक्ति का पहला चरण – शरीर का सहज स्वीकार

जो शरीर को दबायेगा, शरीर उसके ऊपर छा जायेगा।
उसके रेशे-रेशे से, बस शरीर आवाज़ देगा, क्योंकि शरीर को तुम दबा सकते नहीं।
फिर शरीर इधर से, उधर से, हज़ार तिकड़में कर के, अपने आप को अभिव्यक्त करेगा।

जो जगह शरीर को नहीं लेनी चाहिये, उस जगह पर भी शरीर जा कर के बैठ जायेगा।
शरीर तुम्हारी पूजा भी बन जायेगा, शरीर तुम्हारा प्रेम बन जायेगा,
यहाँ तक कि तुम्हारा मोक्ष भी शरीर बन जायेगा।

जिन्होंने शरीर को खूब दबाया होता है, वो जब मोक्ष की भी कल्पना करते हैं,
तो यही सोचते हैं कि हम ऐसे ही कहीं और अवतरित हो जायेंगे।
“हमें मोक्ष मिल गया, अब हम ऐसे ही किसी और लोक में पहुँच जायेंगे, सशरीर।”

शरीर से मुक्ति चाहते हो, तो शरीर को ‘शरीर’ रहने दो।
जिन्हें शरीर से मुक्ति चाहिये हो, वो शरीर के दमन का प्रयास बिल्कुल न करें।
जिन्हें शरीर से ऊपर उठना हो, वो शरीर से दोस्ती करें।
शरीर से डरें नहीं, घबरायें नहीं।

आशा बचाती है अतीत के कचरे को

जलना स्वभाव-विरुद्ध है।
जो जलता हो उसे फिर, जल ही जाने दो। संघर्ष न करो।
जो सहजता से हो, वही भला है।

जो संबंध कायम रखने के लिए बड़ी मेहनत करनी पड़े,
उस संबंध को ख़त्म हो जाने दो।
जो मंज़िल हासिल करने के लिए बड़ी मेहनत करनी पड़े, संघर्ष करना पड़े,
समझ लो कि वो मंज़िल तुम्हारे लिए नहीं है।

संतुष्ट रहो, शिकायतों से बचो

वक्ता: शिक़ायत करने में एक बहुत बड़ा सुकून है| शिक़ायतें करना हमारा स्वभाव बन चुका है| यह मानना कि परिस्थितियों ने, समाज ने, पूरी दुनिया

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