शिव  भी, शंकर भी, शक्ति भी ….. शिव के सहस्रों नाम 

शिव अचिन्त्य हैं – जो शब्दों में आ न सकें, विचार में समा न सकें, चित्रों-मूर्तियों में जिन्हें दर्शा न सकें।

शंकर सरूप सगुण हैं, मन के निकट और बुद्धिग्राह्य हैं।

शक्ति माने ये समूची व्यवस्था, ये अस्तित्व, ये खेल, ये आना-जाना, ये ऊर्जा का प्रवाह।

जो कुछ हम जान सकते हैं, सब शक्ति है।

विद्या की गरिमा और सम्मान

विद्या को उसका उचित स्थान दें।

आध्यात्मिकता की ओर अधिक ध्यान, समय और संसाधनों का निवेश करें।

वेदांत जैसे उच्चतम दर्शनों के अध्ययन को संस्थागत रूप दें, संतों के सुंदर गीतों को मुख्यधारा की संस्कृति में प्रवेश करने के अवसर दें, समाज के सब वर्गों को एक समान जीवन के उच्च आयाम की खोज करने का अवसर दें।

केवल यही दृष्टि हमें बचा सकती है, और यही बसंत पंचमी का वास्तविक उत्सव होगा।

आचार्य प्रशांत जी के करीब आने का सबसे सरल मार्ग! || YouTube Join

आचार्य प्रशांत से ज़िंदगी सीख रही है दुनिया, कोई उनके वीडियोस, कोई उनके ऑडिओस, कोई उनकी किताबों, कोई उनके कोर्सेज एवं उनके अन्य कार्यक्रमों के माध्यम से। ✨

पर कुछ लोग हैं जो सीखते हैं आचार्य जी के करीब रहकर चौबीस घंटा लगातार 🦁

और अब आप भी इसका लाभ पा सकते हैं!

यूट्यूब ‘जॉइन’ के माध्यम से प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन यह अवसर अब आप सभी के लिए भी उपलब्ध कराने का प्रयास कर रहा है। 🎊🎉

इस समूह के सदस्यों को दैनिक रूप से आचार्य जी द्वारा भेजे गए कुछ खास संदेशों का लाभ मिलेगा।

आकाश का देवता नहीं, माटी का महात्मा || आचार्य प्रशांत, महात्मा गाँधी पर (2019)

आकाश से नहीं उतरे थे।

ज़मीन से उठे थे।

उनकी बात में देवपुष्पों की मादक सुगंध नहीं, गाँव की मिट्टी का सोंधापन था।

मनुष्य से महात्मा तक की श्रमसाध्य व लम्बी यात्रा की थी।

ठीक कहते थे: उनका जीवन ही उनका सन्देश है। जो उनके लिए संभव हो पाया, सबके लिए संभव है।

जब कोई अपने अतीत, अपनी वृत्तियों, और अपनी सीमाओं को चुनौती देता हुआ श्रद्धापूर्वक आगे बढ़ता है, तब उसकी उपस्थिति पूरे जगत में एक अपूर्व चेतना का संचार करती है।

आई.आई.टी., आई.आई.एम. के बाद अध्यात्म की शरण में क्यों गये आचार्य प्रशांत जी?||आचार्य प्रशांत (2019)

एक बार ये समझ में आया कि क्या पसंद है, क्या नहीं पसंद है, एक बार ये समझ में आया कि क्या अपना है, क्या अपना नहीं है, फिर रास्ते अपने आप खुल जाते हैं।

फिर तुम कहते हो, “जो मुझे मिला है उसमें इतनी ऐश है, कि वो दूसरों में भी बटें। काश किसी तरह दूसरे भी इस ऐश का अनुभव कर सकें।”

फिर तुम कहते हो, “मुझ तक ही क्यों सीमित रहे? जो मुझे मिला है, ज़रा उसको दूसरों को भी चख लेने दो।”

वही ‘अद्वैत’ है।

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