वह रात

बस यूँ ही अनायास, उदासी सी छा गयी थी, सूरज के डूबने के साथ ही, और मैं – मुरझाया, उदास देखता था गहरा रही रात

इंसान

इंसान, लगता है बहुत आक्रामक होते जा रहे हो तुम, गिद्ध सी तुम्हारी पैनी नज़र तेंदुए सा तुम्हारा हमला, सिंह सा प्रहार, अपराजेय तुम, शक्तिशाली,

मैं

मैं क्यों इतना शक्तिहीन, चाहता हूँ कहना कवि स्वयं को, पर शब्दावरण झीन, ढाँप नहीं पाता- शब्द को, शब्द के अर्थ को, भावुक शब्द की

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