चाँद से आगे ले गया भारत को चंद्रयान || आचार्य प्रशांत, चंद्रयान-2 पर (2019)

भारत की प्रगति की राह में मैं बहुत बड़ा रोड़ा मानता हूँ, विज्ञान के प्रति जो हमारी उपेक्षा और अशिक्षा है।

अशिक्षा भर होती तो कोई बात नहीं थी, सिर्फ़ अशिक्षा भर होती तो कोई बात नहीं थी।

हम उपेक्षा भी करते हैं।

तो चन्द्रयान का जो दूरगामी लाभ है भारत को, वो ये है कि भारत जगा है विज्ञान के प्रति।

और भारत का विज्ञान के प्रति जगना बहुत ज़रूरी है, नहीं तो  – अंधविश्वास, और अंधविश्वास, और अंधविश्वास!

आइन रैंड की द फाउन्टेनहेड पर (The Fountainhead by Ayn Rand) || आचार्य प्रशांत (2019)

रोअर्क की खूबसूरती इसमें है कि वो बिलकुल भी एक आम नौजवान जैसा नहीं है।

उसकी ज़िन्दगी में ना माँ के हाथ का निवाला है , ना प्रेमिका के हाथ का।

ना वो बाप से थर्राता है ना प्रिंसिपल से।  

ना उसे डिग्री की चाहत है, ना नौकरी की।

पर प्यार है उसे!

व्यक्तित्व उसका देखने में इतना रूखा, कि अगर आप शायर क़िस्म के आदमी हैं, तो कहेंगे, “ये तो बंजर रेगिस्तान है। यहाँ तो कोई ग़ज़ल ही नहीं!”

पर रोअर्क का अपना एक गीत है, प्रेम गीत।

और सबके लिए नहीं है, उनके लिए नहीं है जिनको घी लगी चुपड़ी रोटी पसंद है।

कम बोलता है रोअर्क, और अकेले रहता है।

देखिए अगर आपको उसकी संगति मिल सके तो!

क्या सेक्स का कोई विकल्प है जो मन शांत रख सके? || आचार्य प्रशांत (2018)

कुछ बातों का समाधान करने के लिए भी उन बातों से उलझा नहीं जाता, बस उन बातों से आगे बढ़ जाते हैं।

आगे बढ़ जाओ, तो ये बातें पीछे छूट जाती हैं।

और इनका समाधान करने लग गए, तो इन बातों के सामने अटके रह जाओगे।

आई.आई.टी., आई.आई.एम. के बाद अध्यात्म की शरण में क्यों गये आचार्य प्रशांत जी?||आचार्य प्रशांत (2019)

एक बार ये समझ में आया कि क्या पसंद है, क्या नहीं पसंद है, एक बार ये समझ में आया कि क्या अपना है, क्या अपना नहीं है, फिर रास्ते अपने आप खुल जाते हैं।

फिर तुम कहते हो, “जो मुझे मिला है उसमें इतनी ऐश है, कि वो दूसरों में भी बटें। काश किसी तरह दूसरे भी इस ऐश का अनुभव कर सकें।”

फिर तुम कहते हो, “मुझ तक ही क्यों सीमित रहे? जो मुझे मिला है, ज़रा उसको दूसरों को भी चख लेने दो।”

वही ‘अद्वैत’ है।

नफ़रत हटाने का सीधा उपाय || आचार्य प्रशांत (2018)

नफ़रत हटाने का सीधा उपाय यही है – जाओ बात कर लो।  

एक घण्टा बात कर लोगे, कोई बड़ी बात नहीं फूट-फूट कर रो पड़ो।

तुम भी रो रहे हो, वो भी रो रहा है।

जन्म-मृत्यु क्या हैं? || आचार्य प्रशांत (2019)

ये जो चीज़ों को लम्बा खींचने की उम्मीद है, समझो तो सही कि ये उम्मीद आ कहाँ से रही है।

ये उम्मीद आ रही है, आत्मा की स्मृति से।

‘अहम’ को वहाँ जाना है, अमरता वहीं पर है।

लेकिन उसकी जगह वो जुड़ जाता है – कभी पानी के साथ , कभी कपड़ों के साथ, कभी बादल के साथ, और कभी शरीर के साथ।  

और जिसी के साथ जुड़ता है, उसके साथ वो उम्मीद बाँधता है – नित्यता की, अमरता की।

1 4 5 6 7 8 250