अगर बच्चों का मन पढ़ाई में नहीं लगता हो || आचार्य प्रशांत (2018)

तुम ऐसे तो बनो कि ज़रा प्रभावशाली लगो उनको।

उन्हें भी पिता की बातों में ज़रा दम लगे, पिता के व्यक्तित्व पर ज़रा फक्र हो।

फिर सीखेंगे।

पहले तुम सीखो।

पढ़ाई में मन क्यों नहीं लगता? || आचार्य प्रशांत (2016)

क़िताब डराती सिर्फ़ इसलिए है क्योंकि तुम क़िताब से वो माँग रहे हो जो कोई क़िताब तुम्हें नहीं दे सकती।

तुम क़िताब को सहज तरीक़े से नहीं पढ़ते।

तुम क़िताब को ऐसे पढ़ते हो कि पढ़ लिया, तो परिणाम आएगा, परिणाम आया तो ये मिलेगा, ये मिला तो जीवन बनेगा।

जीवन कोई बनाने की चीज़ है?

मन को मुक्ति की ओर कैसे बढ़ाएँ? || आचार्य प्रशांत, तत्वबोध पर (2019)

जब तुम अपनी वास्तविक इच्छा के प्रति ज़रा सजग, ज़रा संवेदनशील होते हो, तब तुम मुक्ति की ओर मुड़ते हो। 

दुःख से बड़ा मित्र तुम्हारा कोई नहीं।

भला हो कि तुममें दुःख के प्रति संवेदनशीलता बढ़े, तुम जान पाओ कि आम आदमी – तुम, मैं, सभी – कितने दुःख में जीते हैं।

जैसे-जैसे दुःख का एहसास सघन होता जाएगा,वैसे-वैसे मुक्ति की अभीप्सा प्रबल होती जाएगी।

अध्यात्म है दोनों से आज़ादी ||आचार्य प्रशांत, ज़ेन कोआन पर 2018

अध्यात्म न दाएँ से आसक्त हो जाने का नाम है, और न बाएँ से।

अध्यात्म न बंद मुट्ठी का नाम है, और न ही खुली मुट्ठी का नाम है।

अध्यात्म का अर्थ है – बंद मुट्ठी से आज़ादी और खुली मुट्ठी से भी आज़ादी।

शिव  भी, शंकर भी, शक्ति भी ….. शिव के सहस्रों नाम 

शिव अचिन्त्य हैं – जो शब्दों में आ न सकें, विचार में समा न सकें, चित्रों-मूर्तियों में जिन्हें दर्शा न सकें।

शंकर सरूप सगुण हैं, मन के निकट और बुद्धिग्राह्य हैं।

शक्ति माने ये समूची व्यवस्था, ये अस्तित्व, ये खेल, ये आना-जाना, ये ऊर्जा का प्रवाह।

जो कुछ हम जान सकते हैं, सब शक्ति है।

विद्या की गरिमा और सम्मान

विद्या को उसका उचित स्थान दें।

आध्यात्मिकता की ओर अधिक ध्यान, समय और संसाधनों का निवेश करें।

वेदांत जैसे उच्चतम दर्शनों के अध्ययन को संस्थागत रूप दें, संतों के सुंदर गीतों को मुख्यधारा की संस्कृति में प्रवेश करने के अवसर दें, समाज के सब वर्गों को एक समान जीवन के उच्च आयाम की खोज करने का अवसर दें।

केवल यही दृष्टि हमें बचा सकती है, और यही बसंत पंचमी का वास्तविक उत्सव होगा।

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