सब करके भी कुछ नहीं करते || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2019)

निष्काम कर्म, अनासक्त कर्म, कबीर साहब को शोभा देता है, हमको नहीं।

हमारे लिये तो ज़रूरी है कि कर्म सोद्देश्य हो, कर्म सकाम हो।

और कर्म का बड़ा सीधा-सीधा उद्देश्य हो – बंधनों से मुक्ति, भ्रम का कटना, भय-मोह का मिटना।

क्या ज्योतिषी भविष्य बता सकते हैं? || आचार्य प्रशांत (2017)

तुम्हें बनाने वाला, परम मुक्त है, तो उसकी रचना भी तो मुक्त होगी न।

जो स्वयं मुक्त है, वो अपनी रचना को भविष्य के बंधन में क्यों रखेगा।

वो क्यों कहेगा, “तेरा भविष्य मैंने पहले ही बाँध दिया”?

हाँ, तुम अपना भविष्य पहले ही बाँध लेते हो।

वो तुमको मुक्ति देता है, तुम स्वयं को बंधन देते हो।

कैसी जिज्ञासा अच्छी? || आचार्य प्रशांत (2019)

हम जितने भी व्यर्थ के काम करते हैं, अपना समय खराब करते हैं, वो इसीलिये करते हैं न, कि अगर वो व्यर्थ के काम नहीं करें, तो कोई सार्थक काम करना पड़ेगा।

सार्थक काम करते रूह काँपती है।

तो कुछ भी फिर।

तुम्हारी मुक्ति से बड़ा कुछ नहीं || आचार्य प्रशांत (2019)

‘मुक्ति’ समझते हो क्या है?

कल्पना से मुक्ति।

ज्ञानमार्ग, भक्तिमार्ग और कर्ममार्ग – हमारे लिए कौन सा उचित है? || आचार्य प्रशांत (2019)

सूत्र ये है कि –

समाधान समस्या में ही छुपा होता है।

योग, वियोग में ही छिपा होता है।

ईमानदारी से अगर आप देख पायें कि आपके मन की संरचना, दशा और दिशा क्या है, तो कहाँ उसको शान्ति, और पूर्णता मिलेगी, ये भी आपको स्वतः ही स्पष्ट होने लगेगा।

उसी शान्ति और पूर्णता का दूसरा नाम ‘योग’ है।

घर बैठकर रोटी और बिस्तर तोड़ने की आदत || आचार्य प्रशांत (2019)

दो ही चीज़ें होती हैं देखो – या तो बोध का मार्ग, या योग का मार्ग।

भारत ने दोनों को ही आज़माया है, दोनों ही सफल रहे हैं। 

बोध का मार्ग कहता है – “जानो, और जानने के फलस्वरुप तुम्हारे कर्म और निर्णय बदलेंगे। भीतर प्रकाश उदित होगा, तो तुम्हारे जीवन में दिखाई देगा। तुम्हारे सब कर्मों में दिखाई देगा”।

ये ‘बोध’ का मार्ग है। 

योग का मार्ग दूसरा है।

वो कहता है – “ढर्रे मृत होते हैं। उनको अगर प्रकाश से तोड़ेंगे, तो बड़ा समय लगेगा”।

“तो उनको विधियों से तोड़ो”।  

1 2 3 4 5 246