पढ़ाई के किसी विषय में रुचि न हो तो? || आचार्य प्रशांत (2019)

रुचि छोटी चीज़ होती है, सत्यता बड़ी चीज़ होती है।

अहंकार कहता है, “रुचि को प्रधानता दो।”

अध्यात्म कहता है, “धर्म प्रधान है।”

अध्यात्म का अर्थ ही है – रुचि की परवाह ही न करना और उस तरफ़ चलना जिस तरफ़ धर्म है, जिधर सत्य है।

दूसरों की गलती कितनी बर्दाश्त करें? || आचार्य प्रशांत (2018)

जिस चीज़ को तुम अपने में मूल्य देते हो, उसी चीज़ को तो तुम दूसरे में मूल्य दोगे न।

तुम्हें लगता है कि दूसरों को बुरा लग जाएगा अगर तुमने दोष निकाला, क्योंकि तुम्हें बुरा लग जाता है जब तुममें कोई दोष निकाला जाता है।

तुम ऐसे हो जाओ कि तुम्हें कुछ बुरा ही नहीं लगता, तो फ़िर तुम्हें ये भी बुरा नहीं लगेगा कि दूसरों को बुरा लगा।

शारीरिक आकर्षण इतना प्रबल क्यों? || आचार्य प्रशांत (2018)

स्त्री की देह पुरुष की देह माँगेगी, पुरुष की देह स्त्री की देह माँगेगी।

देख नहीं रहे हो कैसे प्लग और सॉकेट की तरह निर्माण है इन अंगों का।

वहाँ तो सबकुछ बनाया ही ऐसी तरह से गया है, कि एक चीज़ दूसरे की माँग करेगी ही।

तो बस वही खेल तुम खेल रहे हो।

पर आदमी को एक अजीब हठ है, एक ज़िद्द है, एक घमण्ड है कि उसमें कुछ दैवीय है, तो वो पूरे तरीक़े से अपने भौतिक कामों को भी दैवीय ठहराना चाहता है।

स्त्री-पुरुष के मध्य आकर्षण का कारण || आचार्य प्रशांत (2019)

ये दो अलग-अलग केंद्र होते हैं काम करने के।

तुम प्रकृति के चलाए भी चल सकते हो, और बोध के चलाए भी चल सकते हो।

प्रकृति के चलाए चलोगे तो  महापाप होगा, उसकी सज़ा मिलती ही मिलती है।

बोध के चलाए चलोगे तो मुक्ति पाओगे, जो जीवन का परम लक्ष्य है।

स्त्री शरीर का आकर्षण हावी क्यों? || आचार्य प्रशांत (2018)

वासना को तो विषय चाहिए।

और वासना को जब विषय चाहिए ही, तो क्यों न उसे ऐसा विषय दे दें जो वासना को ही शांत कर दे।

तुम्हें कुछ तो चाहिए ही पकड़ने के लिए, तो क्यों न तुम्हें कुछ ऐसा दे दें कि जिसको तुमने पकड़ा नहीं कि वो तुम्हें पकड़ ले।

जो इतना बड़ा हो, कि तुम्हारी पकड़ से बाहर का हो।

जिसको पकड़ने के लिए तुम्हें उसमें घुल जाना पड़े।

इसीलिए देने वालों ने तुमको ‘राम’ का नाम दिया, ‘राम’ का काम दिया।

वो नाम भी बहुत बड़ा है, वो काम भी बहुत बड़ा है।

चाँद से आगे ले गया भारत को चंद्रयान || आचार्य प्रशांत, चंद्रयान-2 पर (2019)

भारत की प्रगति की राह में मैं बहुत बड़ा रोड़ा मानता हूँ, विज्ञान के प्रति जो हमारी उपेक्षा और अशिक्षा है।

अशिक्षा भर होती तो कोई बात नहीं थी, सिर्फ़ अशिक्षा भर होती तो कोई बात नहीं थी।

हम उपेक्षा भी करते हैं।

तो चन्द्रयान का जो दूरगामी लाभ है भारत को, वो ये है कि भारत जगा है विज्ञान के प्रति।

और भारत का विज्ञान के प्रति जगना बहुत ज़रूरी है, नहीं तो  – अंधविश्वास, और अंधविश्वास, और अंधविश्वास!

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