पढाई, संसार, और जीवन के निर्णय || आचार्य प्रशांत (2019)

सांसारिक-पारिवारिक कार्यों से मन नहीं उठ जाता अध्यात्म की वजह से।

अध्यात्म की वजह से बेवकूफ़ी से मन उठ जाता है।

अध्यात्म का बिलकुल विरोध नहीं है संसार-परिवार-समाज से।

अध्यात्म तो जीवन को सच्चाई और सौन्दर्य देने का विज्ञान है।

अध्यात्म का विरोध है तो बेवकूफ़ी से।

जहाँ कहीं भी मूर्खता होती है, विवेकहीनता होती है, छद्म षड़यंत्र होते हैं, छल और प्रपंच होते हैं, अज्ञान का अँधेरा होता है, अध्यात्म उनपर रोशनी डालता है। उन सबको ख़त्म कर देता है अध्यात्म। 

अध्यात्म का काम है सच्चाई को, निर्भीकता को, सुन्दरता को आगे बढ़ाना।

विद्यार्थी जीवन, पढ़ाई, और मौज || आचार्य प्रशांत (2018)

मौज कोई मस्ती तो होती नहीं कि सड़क पर घूम रहे हैं, और उछल-कूद मचा रहे हैं।

वो सब तो मौज होती नहीं।

मौज तो आदमी की सहज और स्वभावगत आदत होती है।

मौज को लाने जैसा कोई कार्यक्रम सफल नहीं हो सकता।

हाँ, जो चीज़ें तुमको अर्धविकसित, या ग्रंथिग्रस्त बनाए हुए हैं, जिनकी वजह से तुम छोटे हो, सीमित हो, संकुचित हो, उन चीज़ों को दूर कर दो।

इंजीनियरिंग की पढ़ाई, और मन में दुविधाएँ || आचार्य प्रशांत (2019)

प्रभावशाली को मत सुनो, चाहे वो कोई भी हो।

उसकी तरफ़ जाओ जो तुम्हारे जीवन में सार्थक, सुन्दर बदलाव वास्तव में ला रहा हो।

वादा ही भर न कर रहा हो, वास्तव में ला रहा हो।

काम बन जाएगा।

अगर बच्चों का मन पढ़ाई में नहीं लगता हो || आचार्य प्रशांत (2018)

तुम ऐसे तो बनो कि ज़रा प्रभावशाली लगो उनको।

उन्हें भी पिता की बातों में ज़रा दम लगे, पिता के व्यक्तित्व पर ज़रा फक्र हो।

फिर सीखेंगे।

पहले तुम सीखो।

पढ़ाई में मन क्यों नहीं लगता? || आचार्य प्रशांत (2016)

क़िताब डराती सिर्फ़ इसलिए है क्योंकि तुम क़िताब से वो माँग रहे हो जो कोई क़िताब तुम्हें नहीं दे सकती।

तुम क़िताब को सहज तरीक़े से नहीं पढ़ते।

तुम क़िताब को ऐसे पढ़ते हो कि पढ़ लिया, तो परिणाम आएगा, परिणाम आया तो ये मिलेगा, ये मिला तो जीवन बनेगा।

जीवन कोई बनाने की चीज़ है?

मन को मुक्ति की ओर कैसे बढ़ाएँ? || आचार्य प्रशांत, तत्वबोध पर (2019)

जब तुम अपनी वास्तविक इच्छा के प्रति ज़रा सजग, ज़रा संवेदनशील होते हो, तब तुम मुक्ति की ओर मुड़ते हो। 

दुःख से बड़ा मित्र तुम्हारा कोई नहीं।

भला हो कि तुममें दुःख के प्रति संवेदनशीलता बढ़े, तुम जान पाओ कि आम आदमी – तुम, मैं, सभी – कितने दुःख में जीते हैं।

जैसे-जैसे दुःख का एहसास सघन होता जाएगा,वैसे-वैसे मुक्ति की अभीप्सा प्रबल होती जाएगी।

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