एकाग्रता क्यों नहीं बनती? || आचार्य प्रशांत (2017)

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प्रश्न: आचार्य जी, मेरा प्रश्न बच्चों के बारे में है। बच्चे ऐसा नहीं है कि सुनते नहीं हैं, पर उनका सुनना बड़ा सेलेक्टिव (चयनात्मक) होता है। मुझे अपने बच्चे के साथ भी यही परेशानी होती है। जितना फ़ोकस मेरा बच्चा खेलकूद में देता है, उतना ये पढ़ाई में नहीं देता है। इसका मतलब इसमें फ़ोकस की प्रतिभा तो है, पर फिर वो सिर्फ़ उन्हीं चीज़ों पर फ़ोकस करता है जो उसको अच्छी लगती हैं।

कई बार हमें ऐसी चीज़ों पर भी फ़ोकस करना पड़ता है जो हमें तत्काल आकर्षक नहीं भी लग रही हैं। तो ‘डिलेड ग्रैटिफिकेशन’ (विलम्बित परितोषण) आना चाहिए। लेकिन मुझे समझ में नहीं आता कि मैं अपने बच्चे को कैसे समझाऊँ।

ऐसे में मैं क्या करूँ?

आचार्य प्रशांत: ‘डिलेड ग्रैटिफिकेशन’ (विलम्बित परितोषण) किस क्षेत्र का? आप कोई हार्दिक ध्येय पकड़ें, और उसमें आपको तुरन्त परिणाम न मिले, तो अच्छी बात है कि आप कह रहे हैं कि, “मुझे बहुत जल्दी ग्रैटिफिकेशन नहीं चाहिए, मैं प्रतीक्षा करने को तैयार हूँ। मुझमें धैर्य है।” लेकिन सबसे पहले तो, जो आप कर रहे हैं, वो हार्दिक होना चाहिए न। आप जो काम ही कर रहे हो, उसमें दिल नहीं हो, वो हार्दिक नहीं है…. ।

प्रश्नकर्ता १: लेकिन आचार्य जी, अगर बच्चे स्कूल जाते हैं, तो उनको पास होने के लिए हर विषय में कुछ न्यूनतम अंक तो लाने ही होंगे। और अगर बच्चे के मन में ये बात है कि जो चीज़ अच्छी नहीं लगती है, उसे बिलकुल भी नहीं छूएँगे …… ।

आचार्य प्रशांत: तो वो पास तब भी हो जाएगा। न्यूनतम अंक बहुत ज़्यादा नहीं होते।

ये फ़ोकस की बात नहीं है; फ़ोकस तो ज़बरदस्ती कराया जा सकता है। आप उसके साथ ऐसे तरीक़े आज़मा सकती हैं, जिसके बाद वो फ़ोकस करने लग जाएगा। लेकिन उसका मन संकुचित हो जाएगा। बहुत बच्चे हैं जो बहुत कंसन्ट्रेट करना जानते हैं, और दसवीं-बाहरवीं तक आपको उनको देखकर लगेगा कि – वाह, वाह! और ज़िंदगी में वो बिलकुल फ़िसड्डी निकलते हैं। फ़ोकस या कंसन्ट्रेशन, ध्यान रखिए, कि कोई बहुत उम्दा गुण नहीं है। ‘फ़ोकस’ कोई बहुत अच्छा गुण नहीं है, कंसन्ट्रेशन कोई बहुत अच्छी क्वालिटी (विशेषता) नहीं है।

प्रश्नकर्ता १: लेकिन अगर बच्चा ऐसा है कि खेलकूद में तो उसकी एकाग्रता बहुत अच्छी है, लेकिन पढ़ाई के समय वो भटक जाता है, मन नहीं लगा पाता है, तो ऐसे में क्या करें?

आचार्य प्रशांत: हर आदमी का जो व्यक्तित्व होता है, उसके अनुरूप हर चीज़ नहीं होती है। आप उसका जो सदियों का कार्मिक ढाँचा है, वो आप थोड़े ही बदल पाओगे। वो बहुत सारा कर्मफल लेकर पैदा हुआ है न!

प्रश्नकर्ता १: तो क्या हमें उसको, एक अभिभावक के तौर पर, एक दिशा नहीं देनी चाहिए?

आचार्य प्रशांत: आप को बस ये देखना चाहिए कि वो बस इधर- उधर की दिशाओं में न चला जाए। दिशा तो देखिए सबकी एक ही होती है – इस बात को समझिएगा। दिशा सबकी एक ही होती है, अगर ऊपर से देखा जाए। क्या होती है?

श्रोतागण: शांति।

आचार्य प्रशांत: शांति की ओर आना। जिसे कहते हैं – केन्द्र की ओर आना, सत्य की ओर आना। हाँ, लेकिन ये है कि व्यक्तित्व सबके अलग-अलग होते हैं।

अब जैसे ये बीच में एक कैमरा रखा हुआ है। ये कैमरा मान लीजिए केन्द्र है। अनमोल (एक श्रोता) को अगर इसकी ओर आना है, तो कैसे आएगा? और सागर (दूसरे श्रोता) को अगर इसकी ओर आना है, तो कैसे आएगा?

प्रश्नकर्ता १: दोनों अपनी-अपनी जगह के अनुसार दिशा लेंगे।

आचार्य प्रशांत: तो अगर आप नासमझी में देखेंगे, तो आपको लगेगा कि दोनों अलग-अलग काम कर रहे हैं। दोनों अलग-अलग काम नहीं कर रहे हैं, दोनों एक ही काम कर रहे हैं। लेकिन क्योंकि दोनों की स्थितियाँ अलग-अलग हैं – स्थिति को ही ‘व्यक्तित्व’ कहते हैं। हमारा व्यक्तित्व, हमारे मन के समूचे विस्तार में, हमारी स्थिति का ही नाम होता है।

‘मन’ का मतलब होता है – अनंत सम्भावनाएँ। और उसमें आपका एक तरह का व्यक्तित्व होता है। या कह लीजिए कि व्यक्तित्वों का एक दायरा होता है, एक गेंद जैसा, कि जैसे एक बहुत बड़ा क्षेत्र है, और उसमें एक बड़ी गेंद पड़ी हुई है। वो जो गेंद है, वो आपका व्यक्तित्व है। उस व्यक्तित्व के भीतर भी थोड़े-बहुत परिवर्तन हैं।

तो सबको अपने-अपने व्यक्तित्व के अनुसार ही आना होता है केन्द्र की ओर। एक रास्ता जो एक के लिए ठीक है, वो दूसरे के लिए नहीं ठीक हो सकता।

एक चित्रकार है, एक क्रिकेटर है, दोनों कोशिश एक ही कर रहे हैं। क्या कोशिश कर रहे हैं?

श्रोतागण: जो चाहिए वो मिल जाए।

आचार्य प्रशांत: लेकिन क्योंकि अब उसको क्रिकेट के रास्ते से आना है, तो उसका तरीक़ा बड़ा अलग दिखाई देगा। वास्तव में दोनों एक ही काम कर रहे हैं। तो अब आपका बच्चा जिस भी तरह के जैविक सामग्री के साथ पैदा हुआ है, उसको उसी के अनुसार आगे बढ़ना है। आप ये मत देखिए कि उसकी दिशा दूसरों की तुलना में कैसी है, आपको ये देखना होगा कि उसकी दिशा उसे, उसके केन्द्र की ओर ले जा रही है या नहीं ले जा रही है।

आप एक चित्रकार की एक क्रिकेटर के साथ थोड़े ही तुलना कर सकते हो। उसको उससे तोलिए न, उसको उसके प्रति तोलिए। और आप जो चाह रहे हो, वो बहुत आसान है। आप उसको ज़रा-सा लालच दे दो, डरा दो, वो एकाग्र होना शुरू कर देगा।

लेकिन एक बात याद रखिएगा – जिसने एक बार डरकर काम करना शुरू कर दिया, वो अब हर काम डरकर ही करेगा। आप उसको डराओगे नहीं, तो वो काम भी नहीं करेगा। जिसने एक बार लालच में आकर काम करना शुरू कर दिया, अब वो हर काम में लालच माँगेगा।

एक साहब थे, वो अपने कुत्ते को गेंद उठाना सिखा रहे थे। अब कुत्ते को गेंद से कोई बहुत आकर्षण नहीं। और है भी, तो उसका गेंद उठाकर भागने का कोई इरादा नहीं कि गेंद उठाकर मालिक के पास ले जाए। ये तो मालिक का शौक़ है। अब कुत्ते को गेंद से क्या! उसे गेंद के पास जाना भी है, तो थोड़ा इधर -उधर लात मारनी है, मुँह हिलाना है, बात ख़त्म।

तो मालिक ने क्या किया, उन्होंने गेंद के पास हड्डी रखनी शुरू कर दी। एक हड्डी वो रखें गेंद के पास, और दूसरी हड्डी वो रखें अपने पैरों के पास। तो कुत्ता जाए जब पहली हड्डी के पास, तो वहाँ गेंद पाए। वो हड्डी को चूसे। फिर उसको प्रेरित किया जाए कि -” गेंद उठाओ, गेंद उठाओ।” फिर वो गेंद उठाए, और दूसरी हड्डी मालिक के पास देखे तो वहाँ तक जाए। तो इस तरह वो सीख गया कि गेंद उठानी है और मालिक के पास लेकर जानी है। मालिक एक दिन हड्डी रखना भूल गए। अब वो हड्डी खोज रहा है, उसे गेंद से क्या लेना-देना।

तो जिसको आपने एक बार हड्डी के लालच में काम करना सिखा दिया, वो अब हर बार क्या माँगेगा?

प्रश्नकर्ता १: हड्डी।

आचार्य प्रशांत: हड्डी माँगेगा। तो बेहतर है कि थोड़ा-सा लम्बा रास्ता लिया जाए। उसे देखने दीजिए कि क्या करना है।

प्रश्नकर्ता २: आचार्य जी, आपने जैसे अभी उल्लेख किया था ‘पिछले कर्म’ का। ऐसा कुछ होता है क्या?

आचार्य प्रशांत: तुम्हारी नाक वैसी क्यों है जैसी है? तुम्हारी आवाज़ वैसी क्यों है जैसी है? तुम दो ही आँख लेकर क्यों पैदा हुए हो? ये सब कहाँ से निर्धारित हो रहा है? इसी को कहा जाता है …….

प्रश्नकर्ता २: ये तो पेरेंट्स(अभिभावक) से आया है।

आचार्य प्रशांत: ‘पेरेंट्स’ माने? पीछे। …… चले गए न पीछे।

इसी को कहा जाता है – अतीत का कर्मफल, कि तुम जो हो उसके पीछे-पीछे-पीछे अनंत कारणों की श्रृंखला है। और वो सब तुम लेकर अपने साथ पैदा हुए हो। कोई भी बच्चा खाली नहीं पैदा होता। ये बहुत बड़ा भ्रम है कि बच्चा खाली स्लेट की तरह पैदा होता है और फिर पैदा होने के बाद उसमें संस्कार पड़ते हैं। हर बच्चा अपने साथ संस्कारों का पूरा एक पोटला लेकर पैदा होता है।

पहला संस्कार तो यही होता है कि पैदा होओ और रोओ। दूसरा संस्कार ये होता है कि पैदा होओ, हाथ-पाँव पटको कि – “दूध चाहिए।” तीसरा होता है कि मल-मूत्र त्याग कर दिया है, तो लोगों का ध्यान खींचो, फिर शोर मचाओ, रोओ।

छोटे बच्चे को कभी ध्यान से देखो तो तुम्हें पता चल जाएगा कि पैदा होने का अर्थ क्या होता है। वो पूरे दस लाख पंक्तियों के एक कोड के साथ पैदा हो रहा है। उसे सब पता है, सारा हिसाब पता है उसे। तुम बच्चे के पास जाओ, और उसके सामने ज़रा मुँह बनाओ, देखो कि वो या तो तुरन्त हाथ मार देगा, या रोएगा। उसे कैसे पता कि तुमने जो मुँह बनाया उसमें कुछ ख़राब है? अगर बिलकुल अज्ञानी है, तो उसे ये ज्ञान कहाँ से आया कि अभी जो आपने मुँह बनाया है वो मुँह टेढ़ा है या भद्दा है? ये सब ज्ञान वो लेकर पैदा हुआ है।

छोटा बच्चा पैदा होते ही एचीवमेंट ओरिएन्टेड (उपलब्धि अभिविन्यस्त) है। उदाहरण देता हूँ। उसे कोई चीज़ पसन्द है, वो आप उसके एक हाथ की ओर ले जाओ। वो जब हाथ बढ़ाए, आप उसे दो मत। अब आप उस चीज़ को उसके दूसरे हाथ की ओर ले जाओ, और वो हाथ बढ़ाए तो आप उसे दो मत। फिर उसके पहले हाथ की ओर ले जाओ। वो हाथ बढ़ाए तो उसे दो मत। तीन-चार बार ऐसा करोगे, तो वो रोना शुरू कर देगा। ये जानते हो क्या हो रहा है? उसे उपलब्धि चाहिए थी, उसे नहीं मिली। सक्सेस (सफलता) और फेलियर (असफलता) वो लेकर पैदा हुआ है।

तो समाज आपकी कंडिशनिंग करता है, बेशक़। लेकिन वो वैसा ही है कि जैसे हार्डवेयर के ऊपर सॉफ्टवेयर चढ़ा दिया जाए। हार्डवेयर न हो तो सॉफ्टवेयर किसपर चढ़ाओगे? तो हार्डवेयर ही कंडिशन्ड (संस्कारित) पैदा हुआ है। समाज तो उसपर सिर्फ़ सॉफ्टवेयर चढ़ाता है। विण्डोज़ ऑपरेटिंग सिस्टम डाल दिया समाज ने। इतना बड़ा जो हार्डवेयर निकला है, उसका क्या बोलोगे? उसका डिज़ाइन किसने बनाया? इसीलिए पूरी मुक्ति बहुत मुश्किल काम है।

पूरी मुक्ति का मतलब ये होता है कि सॉफ्टवेयर तो हटाया ही, नया सॉफ्टवेयर चढ़ने भी नहीं दिया। और जो पुराने हार्डवेयर का खेल है, उससे भी बाहर आ गए। वो अति दुष्कर काम है।

तुम्हें अपने दाँत के ख़िलाफ़ जाना है, तुम्हें अपनी नाक के ख़िलाफ़ जाना है, तुम्हें अपनी मूँछ के ख़िलाफ़ जाना है, तुम्हें अपने हाथ के ख़िलाफ़ जाना है, तुम्हें अपने दिल के ख़िलाफ़ जाना है – इतना मुश्किल काम है। ये जो हैं सब – हाथ, पाँव, नाखून, नाक, शरीर के सारे अंग-प्रत्यंग – ये यूँही नहीं हैं, ये सब फ्रोज़न कंडिशनिंग (जमे हुए संस्कार) हैं। ये उंगली क्या है? कंडिशनिंग जम गई है। हाँ इसको देखने के तुम इतने अभ्यस्त हो गए हो, तो तुम कहते हो – “ये उंगली है।”

प्रश्न ३: आचार्य जी, आप कई बार ये कहते हैं कि – “मुक्त हो ही।” और अब आप कह रहे हैं कि – “मुक्ति दुष्कर काम है, इसमें समय और प्रक्रिया निहित है।” ये दोनों बातें विरोधी लग रही हैं।

आचार्य प्रशांत: ये इसके ऊपर है कि सुन कौन रहा है।

जब मैं कहता हूँ, “मुक्त हो ही,” तो ‘मुक्त’ से तो मैं बात करता ही नहीं। उसे बातचीत से कोई काम नहीं। ये तो जो अमुक्त है, उसको ज़रा प्रेरणा दी जाती है, कुछ याद दिलाया जाता है। जो पैदा हुआ है, वो क्या अपने आप को ‘मुक्त’ मानता है? और तुम वही हो जो तुम अपने आप को मानते हो। तुमने कब अपने आप को ‘मुक्त’ माना?

प्रश्नकर्ता ३: आचार्य जी, कभी-कभी ऐसा भी होता है कि गुरुजन, जैसे आप भी बोलते हैं कि – “ये प्रक्रिया सम्भव है, ऐसा हो सकता है।” लेकिन हमारा जो मन है, वो कहता है कि – “ये झूठ है, ऐसा सम्भव नहीं हो सकता।” तो इससे श्रद्धा कमज़ोर होती है। श्रद्धा को मज़बूत कैसे किया जाए?

आचार्य प्रशांत: जो मन पगला है, और श्रद्धा को क़ीमत नहीं देता, वो अपने पागल होने के कारण ही, बेवकूफ़ होने के कारण ही, अपने से बड़ी किसी ताक़त के झाँसे में भी आ जाता है, फिर फँस जाता है। जब फँस जाता है, तो फिर चाहते – न चाहते, केन्द्र की ओर जाना ही पड़ता है।

सत्य मन को फँसाता ही तो है। और मन क्यों फँस जाता है? क्योंकि सत्य की चालाकियाँ समझ नहीं पाता। होशियारी किसके पास है – मन के पास, या आत्मा के पास?

प्रश्नकर्ता ३: मन के पास।

आचार्य प्रशांत: असली होशियारी?

श्रोता: आत्मा के पास।

आचार्य प्रशांत: तो फिर आत्मा जब चाहती है, मन को फँसा लेती है। मन तो बुद्धू है। मन बुद्धू न होता, तो आत्मा का विरोध क्यों करता? सच्चाई का विरोध क्यों करता? दोनों बातें एक साथ इसीलिए तो होती हैं।

मन बुद्धू है, इसीलिए आत्मा का विरोध करता है। मन बुद्धू है, इसीलिए आत्मा का विरोध करता है। और मन बुद्धू है, इसीलिए आत्मा उसे फिर फँसा भी लेती है।

प्रश्न ४: आत्मा है क्या?

आचार्य प्रशांत: मन बुद्धू है, उसे थोड़े ही समझ में आएगा। कौन पूछ रहा है? मन होशियार ही हो जाएगा, तो फिर थोड़े ही पूछेगा कि आत्मा क्या है।

जिसे ‘शांति’ कह रहे थे, वही है आत्मा।

शांत मन को ही ‘आत्मा’ कहते हैं।

(एक श्रोता, जो एक आठ वर्षीय बच्ची है, की ओर इंगित करते हुए) अब जैसे अक्षरा है, उसके मन को नहीं कुछ समझ में आ रहा है, लेकिन फिर भी उसे सब समझ में आ रहा है। अभी उससे पूछो कि मैं क्या बता रहा हूँ, तो वो कुछ बता थोड़े ही पाएगी। लेकिन फिर भी सब समझ रही है।

कोई होता है भीतर, जो समझदार होता है मन के सहयोग बिना, मन के ज्ञान बिना।

उसको ‘आत्मा’ कहते हैं।

कोई होता है भीतर जिसे सब पता होता है बिना कभी पता किए।

उसको ‘आत्मा’ कहते हैं।

और ‘पता होता है’ का ये मतलब नहीं होता है कि तुम उससे पूछो कि यहाँ से होशंगाबाद जाना है, तो वो तुम्हें रास्ता बता देगा तुरन्त। ‘पता होता है’ का मतलब है कि – जो असली बात है, वो पता होती है। असली बात क्या है? असली बात है कि जब कुछ पता चल जाता है, तो कैसे हो जाते हो? जब तक पता नहीं होता है, तब तक कैसे रहते हो?

श्रोतागण: बैचैन।

आचार्य प्रशांत: और जब पता होता है, तो कैसे हो जाते हो?

श्रोतागण: शांत।

आचार्य प्रशांत: भीतर कोई है जो सदा शांत ही रहना चाहता है। इसी कारण कह रहा हूँ कि – उसे सबकुछ पता है। पता न होता, तो बैचैन होता। भीतर कोई है, जो कहता है, “ज्ञान हो न हो, शांति चाहिए।”

(सामने बहती हुई झील की ओर देखते हुए)

ये सामने झील है, मैं तुमसे इसकी हालत बयान करने को कहूँ, तो तुम इसकी हालत कैसे बयान कर रहे हो, इससे तुम्हारे बारे में पता चलता है। तुम अगर सतही आदमी हो, तो तुम इसकी सतह को देखोगे और कहोगे, “अशांत है। हवाएँ आ रही हैं और लहरें पैदा कर रही हैं।” तुम्हारी अगर आदत ही है सतह को देखने की, तो जब मैं पूछूँगा कि – “झील कैसी है?” तो तुम कहोगे, “झील अशांत है।” क्योंकि तुमने क्या देखा?

श्रोतागण: सतह।

आचार्य प्रशांत: और सतह पर तो बाहरी प्रभाव पड़ ही रहे हैं। हवा का प्रभाव पड़ रहा है, तो सतह पर क्या है? लहरें। पर तुम अगर ज़रा गहरे आदमी हो, तो तुम गहराई में देखोगे, और गहराई में कोई लहर नहीं है।

मन को ऊपर-ऊपर से देखो तो अशांत होता है, और गहराई में देखो तो शांत है। मन ऊपर-ऊपर से देखो तो ‘मन’ है, और गहराई में देखो तो ‘आत्मा’ है। अब दोनों एक साथ हैं या नहीं? लहरें भी हैं और स्थिरता भी है। और सागर जितना गहरा होता है, नीचे उसमें उतनी शांति होती है। और उसी में ज़रा ऊपर आ जाओ, तो लहरें भी चल रही हैं, और ये भी हो रहा है, और वो भी हो रहा है।

ऊपर-ऊपर से जिस भी चीज़ को देखोगे, उसमें इसी तरीक़े से कुछ-न-कुछ उतार-चढ़ाव दिखाई देंगे। और तुम्हारे लिए बहुत आसान होगा ये कह देना कि – “यहाँ शांति नहीं है।” और तुम्हें ऊपर-ऊपर से देखकर ही अगर चीज़ों को ठुकराना है, तो तुम हर चीज़ को ठुकरा सकते हो। शांति तो हमेशा ज़रा गहराई में मिलती है। और गहराई में जाओगे, तो सब कुछ शांत है।

गहराई में कभी हवाएँ पहुँचती हैं बाहर से? गहराई में कोई बाहर वाला प्रवेश कर सकता है? किसी की हिम्मत है कि जाकर गहराईयों में भूचाल ला दे?

तुम जितने उथले होओगे, उतनी आसानी से बाहर वाले तुम में कम्पन ला देंगे।

और तुम जितने गहरे होओगे, बाहर वालों के लिए उतना मुश्किल होगा तुम्हारी गहराइयों को विचलित कर देना।

हाँ, ऊपर-ऊपर से तुम्हें विचलित कर सकता है कोई भी। ऊपर-ऊपर से विचलित होना तो ठीक है। महासागर भी हो, उसपर भी तुम अगर ज़रा-सी फूँक मार दो, तो क्या होगा? महासागर है, और तुम सतह के पास जाकर उसपर अगर ज़रा-सी फूँक मार दो, तो क्या होगा?

श्रोतागण: प्रभाव पड़ेगा।

आचार्य प्रशांत: ज़रा-सा प्रभाव तो पड़ ही जाएगा। लेकिन गहराई की तो बात ही दूसरी है।


वीडियो सत्र: एकाग्रता क्यों नहीं बनती? || आचार्य प्रशांत (2017) । लेख स्पष्टता हेतु संशोधित है।


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