कॉलेजी शिक्षा ज़्यादा ज़रूरी, कि आध्यात्मिक शिक्षा? || आचार्य प्रशांत (2019)

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प्रश्न: आचार्य जी प्रणाम! मैंने स्कूल और कॉलेज जाकर शिक्षा प्राप्त नहीं की है, लेकिन कम उम्र से ही साहित्य और शास्त्रों के संपर्क में रहा हूँ। उपनिषद् इत्यादि पढ़ने का सौभाग्य रहा है। हमेशा से ही मन में बात रहती है कि औरों की तरह स्कूल-कॉलेज नहीं जा पाया, और इसी कारण थोड़ा परेशान भी रहता हूँ।

आपसे जानना चाहता हूँ कि औपचारिक शिक्षा का अभाव क्या मेरे जीवन में मुक्ति पाने में बाधा बन सकता है?

आचार्य प्रशांत: हाँ भी और नहीं भी। जिसको तुम औपचारिक शिक्षा कहते हो, वर्तमान समय में वो ज़्यादातर रोटी और रोज़गार सम्बन्धित ज्ञान है। उसकी पूरी दिशा ही यही है कि तुम किसी तरह से दुनिया में गुज़र-बसर करने लायक बन जाओ। उसका उद्देश्य वैसे भी तुमको मुक्ति दिलाना तो है ही नहीं।

ज़रा बताना मुझे कि – बी.ए. एल.एल.बी. में मुक्ति के कितने कोर्स होते हैं? बी.एस.सी. में, बी.टेक. में, बी.बी.ए में? सब यहाँ बैठे हैं, यहाँ ग्रेजुएट (स्नातक) भी हैं, पोस्ट-ग्रेजुएट (स्नातकोत्तर) भी हैं, उससे आगे के भी लोग बैठे हुए हैं। बताईएगा, औपचारिक शिक्षा जिन्होंने ली हुई है – मुक्ति वाले कितने कोर्स थे आपके पाठ्यक्रम में?

औपचारिक शिक्षा का उद्देश्य वैसे भी नहीं है तुमको अहम् से मुक्ति दिलाना, आधिदैविक दुखों से मुक्ति दिलाना। औपचारिक शिक्षा है क्या, ये तुम साफ़-साफ़ समझो। वो तुमको दुनियादारी बताती है। वो व्यर्थ नहीं है। उसका भी अपना एक प्रयोजन है।

वो तुमको दुनिया के बारे में बता देगी। वो बता देगी कि दुनिया के नियम-कानून क्या हैं, वो तुमको विज्ञान के नियम बता देगी। वो तुमको तकनीक सिखा देगी, तुम मैकेनिकल इंजीनियर बन जाओगे। वो तुमको समाज शास्त्र बता देगी, राजनीति शास्त्र समझा देगी, तुम जान जाओगे कि ऐसे-ऐसे होता है। वो तुमको इतिहास पढ़ा देगी। मानव-शरीर के बारे में बता देगी, तुम डॉक्टर बन जाओगे। इन सब में मुक्ति वैसे भी न निहित है, न नियत है। चाहा ही नहीं जा रहा कि ये सब करके छात्र को मुक्ति दी जाए। जो चाहा जा रहा है, वो ठीक है। मुझे उससे कोई आपत्ति नहीं।

दुनिया को चिकित्सक चाहिए, दुनिया को भूगोल-विद चाहिए। दुनिया को वैज्ञानिक चाहिए, दुनिया को गणितज्ञ चाहिए। दुनिया को दार्शनिक चाहिए। ये सब हमारे विद्यालयों, विश्वविद्यालयों से पैदा होते हैं। होते हैं न? तो ये ठीक है। पर मैंने आरम्भ में ही क्या कहा, जब तुमने पूछा, “औपचारिक शिक्षा नहीं है, तो क्या मुक्ति में बाधा पड़ेगी?” मैंने कहा, “हाँ भी, और नहीं भी।” नहीं क्यों कहा, वो मैंने समझा दिया।

औपचारिक शिक्षा जब मुक्ति की दिशा में रचित ही नहीं है, उद्देश्य ही नहीं रखती, तो उसके होने, न होने से मुक्ति पर क्या प्रभाव पड़ना? लेकिन फिर भी प्रभाव पड़ना है। प्रभाव ऐसे पड़ना है कि – अगर  तुम को दुनियादारी का ही कुछ पता नहीं, तो तुम दुनियादारी से आज़ाद कैसे हो जाओगे?

मान लो कि तुम बिलकुल ही पढ़े-लिखे नहीं हो, तुम्हें ये ही नहीं पता कि पदार्थ क्या है, तुम्हें ये ही नहीं पता कि देह क्या है, तुम ये ही नहीं पता कि गाड़ी का इंजन कैसे काम करता है। तुम्हें ये ही नहीं पता कि तुम्हारे हाथ में जो फोन है, वो बला क्या है। तुम कुछ नहीं जानते, क्योंकि तुमने पढ़ाई बिलकुल ही नहीं की है। तो नतीजा ये निकलेगा कि विश्व ही तुम्हारे लिए अज्ञात रहेगा। और जब विश्व अज्ञात रहता है तो एक बड़ी सामान्य भूल है जो हो जाती है।

जानते हो क्या?

सत्य अज्ञेय है। अज्ञेय भी अज्ञात तो होता ही है। अज्ञेय – जो जाना नहीं जा सकता। जो जाना नहीं जा सकता, वो जाना गया भी नहीं है। तो अज्ञात भी है। जब पढ़े-लिखे न होने के कारण विश्व ही तुम्हारे लिए अज्ञात हो जाता है, तो कई बार तुम सांसारिक चीज़ों को ही पराभौतिक समझ लेते हो। तुमको ऐसा लगता है कि संसार में ही ऐसा बहुत कुछ है जो सत्य की ओर इशारा कर रहा है।

साँप का उदाहरण ले लो।

अब अगर तुम पढ़े-लिखे नहीं हो, या तुम ऐसी संगत में पड़ गए हो जहाँ तुम्हारा गुरु पढ़ा-लिखा नहीं है, तो वो साँप को लेकर बड़ी पराभौतिक कहानियाँ सुना देगा। कहेगा, “बड़ा रहस्यमयी जीव है साँप। जाने कहाँ से आता है, जाने कहाँ को जाता है। कोई नहीं जानता इसका जन्म कैसे हुआ, कोई नहीं जानता इसकी मृत्यु कैसे होती है। कोई नहीं जानता बीन बजने पर ये नाचता कैसे है, कोई नहीं जानता ये नागपञ्चमी पर दूध  कैसे पी जाता है। कोई नहीं जानता कि इसके कान कितने हैं? कोई नहीं जानता कि देखता ज़्यादा है या सूँघता ज़्यादा है?”

जब कोई कुछ नहीं जानता, तो बात ज़ाहिर-सी है कि तुम्हें रहस्यमयी लगेगी। सबसे बड़ा रहस्य क्या है? सत्य स्वयं। तो नतीजा ये होगा कि तुम साँप को भी किससे जोड़कर देखने लगोगे?

प्रश्नकर्ता: सत्य से।

आचार्य प्रशांत: जो तुमको पता नहीं है, अक्सर वही तुम्हारे लिए ज़रा सत्य से सम्बन्धित हो जाता है। अब यही तुम ज़रा पढ़े-लिखे होते तो तुम्हें पता होता कि साँप वैसा ही है जैसे घर की छिपकली। तुम घर की छिपकली को कहते हो क्या,”अरे, मिस्टिकल, मिस्टीरियस (रहस्मयी)।” फिर तुम जान जाते कि साँप वैसा ही है जैसे तुम्हारे बाग़ में गिरगिट घूमता है।

पुराना आदमी दुनिया के ही बारे में कुछ नहीं जानता था। नतीजा क्या निकला था? नतीजा ये निकला था कि जो पहले देवता थे, जिनकी मनुष्य ने उपासना की, किसी भी संस्कृति में, भारत में, चाहे ईजिप्ट (मिस्र) में, चाहे ग्रीस (यूनान) में, वो सब प्राकृतिक शक्तियाँ थीं, या ग्रह-उपग्रह थे। अब चूँकि तुम पढ़े-लिखे नहीं हो, उस समय ज्ञान था ही नहीं, तो तुम पढ़ोगे-लिखोगे कैसे? अब पढ़े-लिखे नहीं हो, तो तुमको यही लग रहा है कि ‘अग्नि’ देवता है। क्यों? क्योंकि तुम जानते ही नहीं कि ‘अग्नि ‘चीज़ क्या है। न प्रयोगशाला है, न शोध है, न विज्ञान, न ज्ञान। तो तुम्हें लग रहा है कि ‘अग्नि’ ही कोई देवता है।

आज तुम्हारे पास रसायन शास्त्र में पीरिऑडिक टेबल है जो तुम्हें बताता है कि सौ से ज़्यादा तत्त्व हैं, एलिमेंट हैं। पर तब कोई तरीक़ा नहीं था कि तुम जान पाओ कि ये जो हवा है, ये कोई एक तत्त्व नहीं है, ये कोई एक एलिमेंट नहीं है, इसमें कम-से-कम पचास एलिमेंट बैठे हुए हैं। तब कोई तरीक़ा ही नहीं था जानने का। तो कह दिया,”पाँच ही भूत होते हैं, जिसमें एक भूत है ‘वायु’।” अब आज के किसी वैज्ञानिक से पूछो, तो वो कहेगा, “वायु एक भूत नहीं है।” वायु में दस भूत हैं कम-से-कम – ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बन, हाइड्रोजन। और अगर ट्रेस एलिमेंट्स की बात करो, थोड़ा-थोड़ा-थोड़ा, तो पचास और तत्त्व मौजूद हैं वायु में।

पर तब नहीं पता था। तब वायु को ही मान लिया कि वायु एक तत्त्व है। वायु एक तत्त्व थोड़े ही है। और वायु भी जगह-जगह की अलग-अलग होती है। तब थोड़े ही वायु भी अपना रूप-रंग-गुण बदल देता है जगह के अनुसार। शहर की वायु एक होती है, गाँव की दूसरी होती है। ध्रुवों के पास जो देश हैं, वहाँ चले जाओ, स्वीडन चले जाओ, रूस चले जाओ, वहाँ की वायु एक होगी। और अफ्रीका के जो गर्म देश हैं, वहाँ चले जाओ, वहाँ की वायु भी दूसरी है।

लेकिन जब आदमी को दुनिया का ज्ञान नहीं होता, तो एक दिक़्क़त तो ये आती है कि भौतिक रूप से कमाने-खाने में, निर्वाह करने में दिक़्क़त पड़ती है। क्योंकि आप जानते ही नहीं, तो आप प्राकृतिक शक्तियों के फिर रहम-ओ-करम पर आ जाते हो।

यूरोप में जब प्लेग फैला, जो ब्लैक प्लेग हुआ था यूरोप में, तो उसने यूरोप की क़रीब-क़रीब एक तिहाई आबादी साफ़ कर दी थी। क्यों? क्योंकि किसी को पता ही नहीं था कि प्लेग फैलता कैसे है। उस समय के चिकित्सक कहते थे, “जो मरता है, उसकी आत्मा निकलती है, और आत्मा में प्लेग की जीवाणु होते हैं। और ये जो आत्मा निकलती है, वो जिस-जिस को छूती हुई जाती है, उसको प्लेग हो जाता है।” ये हाल चिकित्सकों का था।

तो दुनियादारी को तुम जब नहीं जानते, तो तुम ऐसे काम करते हो। फिर ज़ाहिर-सी बात है कि उस प्लेग को हटाने के लिए क्या किया गया? उस प्लेग को हटाने के लिए इस तरह की आत्माओं कि उपासना की जा रही है। कोई ताज्जुब नहीं कि यूरोप आधा साफ़ हो गया। एंटीबायोटिक्स का तो किसी को कुछ पता नहीं, पेनिसिलिन तब आई नहीं थी। कोई शोध की नहीं हुआ था।

जब तुमको दुनिया का पता नहीं होगा तो तुम दुनिया में ही मूर्ख बनते रह जाओगे। यही सोचते रह जाओगे कि भीतर से आत्मा निकलती है प्लेग के जीवाणु लेकर, और जिसको स्पर्श करती है, उसको प्लेग हो जाता है। कोई समझ ही नहीं पाया कि कहाँ से आया, कैसे हो जाता है। चलते-चलते लोग गिरते रहे, कुछ पता ही न चले।

तो दुनिया का इसीलिए पता होना चाहिए ताकि तुम दुनिया को दुनिया जानो, दुनिया में तुम कहीं सत्य या ब्रह्म को न खोजने लग जाओ।

ये ख़ूब चलता है – जिन्हें दुनिया का ही नहीं पता होता, वो दुनिया को ही लेकर ऐसे विस्मित और भौचक्के हो जाते हैं, कि दुनिया में जब वो कोई आश्चर्जनक चीज़ होती हुई देखते हैं, उन्हें लगता है कि भगवान आ गए, भगवान आ गए।

अरे भगवान् नहीं आ गए।

साँप को देखा तो कहने लग गए, “भगवान आ गए, कोई तिलिस्मी बात है। कोई रहस्य्मयी बात है।” साँप है भाई, जीव है, जन्तु है, कीड़ा है। पर पढ़े-लिखे नहीं हैं, तो साँप-साँप, इधर-उधर की बात। चद्रग्रहण देखा तो कहने लगे, “अरे, वो राहु-केतु आ गए हैं। वो लिए जा रहे हैं, सूर्य को डालेंगे दाईं जेब में, चन्द्रमा को डालेंगे बाईं जेब में। ग्रहण लगा है, बाहर मत निकलना।” तुम जानते ही नहीं हो कि ग्रहण चीज़ क्या होती है, तो ग्रहण तुम्हारे लिए बहुत बड़ी बात हो गई। अब तुम कौन से सत्य की उपासना करोगे जब तुम्हारे लिए सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण ही इतनी बड़ी बात हो गए? तुम तो कह दोगे, “हमें ईश्वर मिल गया। जो चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण का कारक है, उसी का नाम ईश्वर है।”

दुनिया की समझ इसीलिए होनी चाहिए ताकि तुम दुनिया में ही फँसकर न रह जाओ।

ज्ञान आज़ादी देता है।

दुनिया का तुम्हें ज्ञान होगा, दुनिया से आज़ादी मिलेगी।

नहीं तो तुम्हें दुनिया में ही ऐसे-ऐसे अजूबे नज़र आएँगे, कि सत्य की तुम्हारी साधना वहीं रुक जाएगी।

जो लोग दुनिया को नहीं समझते, जानते हो कि धर्म के तल पर भी वो कैसे-कैसे मात खाते हैं? किस्सा कहा जाता, मैं जानता नहीं, मैं तो उस समय था नहीं। किस्सा कहा जाता कि ईसाई मिशनरी जब हिन्दुस्तान आए, तो जो बेचारे अनपढ़-ग़रीब लोग थे, ख़ासतौर पर कबिलियाई, उनको प्रभावित करने के लिए वो उनको कई बातें बोलते। वो बातें उन लोगों की समझ में न आतीं, तो फिर वो तरह-तरह के चमत्कार दिखाते।

ईसाई मिशनरी गाँव में जीप लेकर जाते। फिर वो कबीले वालों से कहते, “अपने देवता का नाम लो,” वो लेते। फिर पूछते, “कुछ हुआ?” वहाँ कुछ नहीं होता। फिर वो कहते, “अब यीशु मसीह का नाम लो।” कबीले वाले जब यीशु मसीह का नाम लेते तो ईसाई मिशनरी पीछे से जीप का हॉर्न बजा देते। फिर वो कहते, “देखो तुम्हारे देवता का नाम लेने पर कोई आवाज़ नहीं आई। और यीशु मसीह का नाम लेने पर ऊपर से आवाज़ आई।” कबीले वाले ये सुनकर चकित हो जाते, और फिर मिशनरी उन सबको अपने पीछे-पीछे चर्च ले जाते।

तो जो दुनिया को नहीं समझता वो धर्म के तल पर भी मात खाता है, उसको धार्मिक आधार पर भी बेवक़ूफ़ बना दिया जाता है। अब मुक्ति कैसे मिलेगी? तो दुनिया को समझना इसलिए ज़रूरी है।  

लेकिन मैं ये भी कह रहा हूँ कि ज़रूरी नहीं है कि औपचारिक शिक्षा से ही दुनिया को समझो। ये सब जो हमारे स्कूलों-कॉलेजों-विश्वविद्यालयों से उत्पादित होकर निकल रहे हैं छात्रजन, ये दुनिया को क्या ख़ाक समझते हैं? दुनिया को समझने का बराबर का, बल्कि श्रेष्ठतर तरीका है कि तुम स्वाध्याय करो। ख़ूब पढ़ो-ख़ूब पढ़ो। आज इंटरनेट पर सब उपलब्ध है। पहले इनसाइक्लोपीडिया के लिए तुम्हें जाना पड़ता था, किसी लाइब्रेरी में, आज विकिपीडिया है, और गूगल है।

ये मोबाइल फोन है तुम्हारे हाथ में, जिसके माध्यम से तुमने सवाल भेजा था, वही मोबाइल फोन तुम्हारी मुक्ति का भी साधन बन सकता है। इस्तेमाल करना सीखो। उस मोबाइल फोन पर चाहो तो अश्लील सामग्री देखते रहो, या ज्ञान बढ़ाओ, गूगल करो, तमाम तरह के ऑनलाइन कोर्स कर सकते हो। विकिपीडिया तो है ही। उसी मोबाइल फोन का इस्तेमाल तुम अपनी मुक्ति के लिए कर सकते हो। पर दुनिया को जानो ज़रूर। औपचारिक शिक्षा दुनिया के बारे में तुम्हें कुछ बताती है। जितना बताती है, उतना पर्याप्त भी नहीं है। तुम औपचारिक शिक्षा से ज़्यादा जानो।

बहुत सारे घूम रहे हैं एम.एस सी. करके, और उनका चित्त नितांत अवैज्ञानिक है। कहने को उन्होंने स्नातक ही नहीं, स्नातकोत्तर शिक्षा ले रखी है विज्ञान में, पर बातें उनकी पूरी तरह अवैज्ञानिक हैं। चित्त वैज्ञानिक होना चाहिए। वैज्ञानिक दृष्टिकोण का मतलब होता है कि – “सामने जो कुछ भी है मैं उसके बारे में धारणा नहीं रखूँगा। मैं जाँचूँगा, परखूँगा, प्रयोग करूँगा, पता करूँगा।” ये काम होता है वैज्ञानिक का। वैज्ञानिक कहता है, “मैं कुछ नहीं जानता, प्रयोग से जो सिद्ध होगा मैं वही जानता हूँ बस। अन्यथा मैं कुछ नहीं जानता।”

बस दिक़्क़त ये होती है कि वैज्ञानिक ऐसी बात दुनिया के बारे में बोलता है, पदार्थ के बारे में बोलता है, अपने बारे में नहीं बोलता। पर फिर भी आध्यात्मिक साधक के लिए भी, कम-से-कम संसार के परिपेक्ष में वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखना बहुत ज़रूरी होता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण ज़रूरी नहीं है कि एम.एस सी. करने से आए। एम.एस सी. करने से आता भी नहीं है। एक-से-एक अंधविश्वासी घूम रहे हैं, बी.टेक., एम.टेक., बी.एस.सी. करे हुए,  इधर-उधर के टोने-टोटके भी कर लेते हैं, जादू-पाखण्ड भी कर लेते हैं। उनसे पूछो, “शिक्षा क्या ली है?” तो कहेंगे, “विज्ञान में ली है।” विज्ञान में शिक्षा ली है तो हरक़त क्या कर रहे हो। वो मुहुर्त निकलवाते फिरेंगे, वो ज्योतिष-पञ्चांग लेकर घूम रहे हैं।

तुम अपने भीतर सत्य को आधार बनाकर, सत्य को ही जानने की इच्छा प्रबल विकसित किए रहो। वो आग जलती रहे। और बिलकुल जानते रहो साफ़-साफ़ कि दुनिया में क्या चल रहा है।

हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ तुम्हें किसी बोर्ड का, किसी पाठ्यक्रम का, किसी विश्वविद्यालय का मोहताज होने की बिलकुल भी ज़रुरत नहीं है। अगर तुम वाकई जिज्ञासु हो, तो इंटरनेट पर ही बहुत कुछ मिल जाएगा। और  विश्वविद्यालय हैं जो ऑनलाइन कोर्सेज भी देते हैं। कर लो रजिस्टर, पढ़ लो। ज्ञान कोई दो वर्ष-चार वर्ष का कोर्स थोड़े ही होता है। वो जीवन भर अनवरत चलने वाली साधना है।

बिलकुल पता होना चाहिए तुम्हें कि दुनिया में क्या चल रहा है, हर क्षेत्र में क्या चल रहा है। राजनीति में क्या चल रहा है, विज्ञान में क्या चल रहा है, खेलों में क्या चल रहा है, चिकित्सा-शास्त्र में क्या चल रहा है। सब पता हो तुम्हें। ये सब कुछ तुम्हारी मुक्ति में सहायक बनेगा। तुम अगर ये समझते हो कि श्लोक भर पढ़ने से मुक्त हो जाओगे, तो ये बेकार की बात है। श्लोक किस बारे में कहे गए हैं, किस सन्दर्भ में कहे गए हैं, तुम्हें ये ही नहीं पता चलेगा।

सारी मुक्ति बंधनों के प्रति है न, बंधनों के विरुद्ध है न। तुम्हें ये ही नहीं पता कि बंधन क्या है, तो तुम मुक्ति कहाँ से पा जाओगे? तो ज्ञान इसलिए होता है ताकि तुम्हें बंधन पता चल सकें। बंधनों का ही तो ज्ञान होता है। बंधनों का ज्ञान लिए चलो।

और औपचारिक शिक्षा नहीं मिली, कोई बात नहीं। जितने अन्य तरीक़ों से तुम ज्ञान कमा सकते हो, कमाओ। बहुत तरीक़े हैं।


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