विद्यार्थी जीवन, पढ़ाई, और मौज || आचार्य प्रशांत (2018)

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प्रश्न: आचार्य जी मैं पढ़ नहीं पा रहा हूँ, और हमेशा बेचैन रहता हूँ। क्या नहीं पढ़ना ही मेरी बेचैनी का कारण है? या कोई और कारण है जिसे मैं समझ नहीं पा रहा हूँ ?

आचार्य प्रशांत: पढ़ाई तो आप करते ही नहीं आए हो न। और आप इंजीनियरिंग में पहुँच गए, वो भी किसी उम्मीद के साथ। कोई बहुत अच्छा कॉलेज तो होगा नहीं, और बहुत अच्छे तुम छात्र भी नहीं। तो घुसे हो, और सालभर में बात समझ में आ गई कि जो उम्मीदें लेकर आए हो वो यूँहीं थीं, दिवास्वप्न, पूरी होनी भी नहीं हैं। पढ़ने में तुम्हारी रुचि पहले भी बहुत नहीं थी, और अब उम्मीद टूटी है तो बिलकुल ही नहीं बचेगी।

तो ये है कहानी। इसमें तुम मुझे समझा क्या नहीं पा रहे थे ?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं लेकिन पढ़ना चाहता हूँ अभी। मैं पुस्तकों के साथ मौज मारना चाहता हूँ।

आचार्य प्रशांत: मौज तो तभी मनती है जब पहले उनमें घुसते हो, जब उनके साथ समय बिताते हो। और आप उनके साथ समय नहीं बिताओगे, अगर समय बिताने के पीछे कोई कारण है। कारण लगेगा अभी है, और कारण लगेगा अभी सिद्ध नहीं हो सकता, तो तुम्हारी रुचि ख़त्म हो जाएगी।

कारणवश, प्रयोजनवश जो भी काम करोगे उसमें बहुत जान थोड़े ही होगी। उसके लिए तभी तक प्रेरित रहोगे जब लगेगा कि तुम्हारी आशा पूरी हो सकती है। जैसे ही ये एहसास होगा कि यहाँ दाल नहीं गलने वाली, वैसे ही सारी प्रेरणा छूमंतर हो जाएगी। कोई ऊर्जा नहीं बचेगी, काम करने का मन नहीं करेगा।

पुस्तकों के साथ मौज मनाना तो उसके लिए है न जो अकारण पढ़ता हो, निष्प्रयोजन पढ़ता हो। तुम भी निष्प्रयोजन हो जाओ, तुम भी मौज मनाओगे। ये उम्मीद मन से बिलकुल निकाल दो कि पढ़ाई नौकरी की ख़ातिर होती है, फिर पढ़ने लग जाओगे।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपको ऐसा कहते पहले भी सुना है, मैं फिर भी पढ़ नहीं पाता हूँ।

आचार्य प्रशांत: क्योंकि तुम पढ़ते तो कभी भी नहीं थे। पढ़ते तो तुम कभी भी नहीं थे। मेरी बातें सुनने भर से तुम निष्प्रयोजन थोड़े ही हो गए हो।(सामने रखे एक पोस्टर पर लिखी उक्ति की ओर इंगित करते हुए) ये क्या लिखा है इस पोस्टर पर?

प्रश्नकर्ता: ओपिनियंस आर नॉट ट्रुथ (अभिमत सत्य नहीं होता)।

आचार्य प्रशांत: जो एक वाक्य पढ़ सकता है, वो पूरा अध्याय भी पढ़ सकता है। इतना पढ़ लिया तो और क्यों नहीं पढ़ सकते? वाट्सएप्प मैसेज पढ़ते हो या नहीं? होर्डिंग (पट विज्ञापन) पढ़ते हो या नहीं? बाज़ार में निकलते हो तो बैनर पढ़ते हो या नहीं? जब ये सब पढ़ सकते हो तो एक अध्याय क्यों नहीं पढ़ सकते? छोड़ो एक अध्याय, क़िताब का एक पैराग्राफ (अनुच्छेद खंड) क्यों नहीं पढ़ सकते? या नहीं पढ़ सकते?

सब पढ़ सकते हो न। बस इसको पढ़ने में कोई प्रेरणा नहीं है, इसको पढ़ने के पीछे कोई लोभ वगैरह है नहीं, तो आसानी से पढ़ लिया। क़िताब बोझ कि तरह लगती है क्योंकि क़िताब से पहले एक उम्मीद जोड़ी थी कि इससे सफल हो जाओगे। वो उम्मीद अब दिख रहा है कि नहीं पूरी होगी। तो इसीलिए तुम्हारा मन उठा हुआ है। (कक्ष में रखे पोस्टर्स की ओर इंगित करते हुए) यहाँ देखो कितनी चीज़ें लिखी हुई हैं, सब पढ़ डालो। देखो पढ़ ले रहे हो न?

कॉलेज में खेलने-कूदने की कुछ व्यवस्था है?

प्रश्नकर्ता: जी।

आचार्य प्रशांत: खेला-कूदा करो। कॉलेज में जितनी भी को-करीकुलर संबंधी गतिविधियों का साधन उपलब्ध हो, उनमें भाग लो। और भाग लो। तुम्हारा शरीर अभी बी. टेक. द्वितीय वर्षीय छात्र जैसा नहीं है। तुम अगर अभी कहते कि तुम दसवीं कक्षा में हो, तो मैं मान लेता। शरीर को और विकसित करो। और अब जब क़िताबों के पास जाओ तो ये मान कर जाओ कि इनके माध्यम से तो नौकरी नहीं लगनी है। उनको वैसे ही पढ़ो जैसे कोई पोस्टर पढ़ता है, जैसे कोई उपन्यास पढ़ता है। किस्से-कहानी की तरह पढ़ो क़िताबों को, फिर दिक़्क़त नहीं आएगी।

प्रश्नकर्ता: आचार्य की , क्या यही कारण है कि जीवन में मौज नहीं है, आनंद नहीं है?

आचार्य प्रशांत: मौज तुम्हारे लिए सिर्फ़ अभी एक नाम है, एक शब्द है, जो आकर्षक लग रहा है कि मौज होगी, मौज होगी। अभी तुम इसको हटाओ कि मौज होगी, अभी तुम देखो कि बिलकुल तुम्हारे समीप ऊब कहाँ है, बोरियत कहाँ है, अविकास कहाँ है। पहला अविकास तो शरीर के ही तल पर है, उसको दूर करो।

मौज कोई मस्ती तो होती नहीं कि सड़क पर घूम रहे हैं, और उछल-कूद मचा रहे हैं।

वो सब तो मौज होती नहीं।

मौज तो आदमी की सहज और स्वभावगत आदत होती है।

मौज को लाने जैसा कोई कार्यक्रम सफल नहीं हो सकता।

हाँ, जो चीज़ें तुमको अर्धविकसित, या ग्रंथिग्रस्त बनाए हुए हैं, जिनकी वजह से तुम छोटे हो, सीमित हो, संकुचित हो, उन चीज़ों को दूर कर दो।

ठीक है ?

तुम्हारी हालत अभी ऐसी है जैसे किसी ने जीवन में कुछ पाया न हो, कुछ कमाया न हो, पात्रता ही न अर्जित करी हो, और उसके बाद वो एक आशा रखे, और जल्दी ही ये सिद्ध हो जाए कि वो आशा पूरी होने वाली है नहीं। पात्रता है नहीं, तो आशा वैसे भी पूरी हो नहीं सकती है। तो वो और कुंठित और निराश हो जाए।

पात्रता बढ़ाओ, आशाएँ रखना बिलकुल छोड़ दो।

नौकरी चौथे वर्ष में लगती है, तुम अभी से कहाँ सोचने बैठ गए पहले साल में, दूसरे साल में कि मेरी नौकरी यहाँ लगेगी, वहाँ लगेगी।

प्रश्नकर्ता: क्या उत्कृष्टता की आशा रखना ग़लत है?

आचार्य प्रशांत: उत्कृष्टता बनानी पड़ती है, आशा से थोड़े ही आ जाती है। अभी तो कह रहे हो, “कर नहीं पाता हूँ,” फिर बात कर रहे हो, “उत्कृष्टता की आशा रखनी है।” ये तुम एक सिरे से दूसरे सिरे तक कूद लगा रहे हो बस। किसी ने साठ-सत्तर प्रतिशत कुछ कर रखा हो, और फिर वो कहे, “मुझे उत्कृष्टता चाहिए नब्बे प्रतिशत वाली,” तो उसकी बात समझ में आती है। जो कह रहा हो, “मैं तो क़िताब पढ़ना शुरू ही नहीं करता,” वो बात करे उत्कृष्टता की, फिर तो ये बात ही व्यर्थ है न।

हम जो ये बातें करते हैं, इन बातें का हमारी ज़िंदगी से बहुत कम सम्बन्ध होता है।

हम बस बातें करते हैं।

हम ये देखते ही नहीं हैं कि हम कौन हैं और हम खड़े कहाँ पर हैं।

हमारा ऐसा होता है कि जैसे हम थार के रेगिस्तान में खड़े हैं और बातें कर रहे हैं हिमालय के जंगलों की। तुम कौन हो, तुम्हारी हालत क्या है, कहाँ खड़े हो, थोड़ा तो देख लो। तुम अभी नौकरी इत्यादि भूलो। तुम अभी अपने शारीरिक, मानसिक विकास पर ध्यान दो।

खेला–कूदा करो, शरीर पर ध्यान दो। और जितना ज़्यादा पाठ्य-पुस्तकों के अलावा भी ज्ञान इकट्ठा कर सकते हो, करो। अपने आप को बनाओ, बढ़ाओ। क़िताबों से तुम्हारा स्नेह कभी नहीं रहा, मैं पाठ्यक्रम की पुस्तकों की बात कर रहा हूँ, तो उनको तुम उपन्यास की तरह ही पढ़ डालो। पास होने लायक नम्बर तो तुम ले ही आओगे, तो पास होते चलो। लेकिन साथ-ही-साथ अपना निर्माण करते चलो।

अपने आप को बनाओ थोड़ा।

दिमाग में ज्ञान होना चाहिए। अर्थव्यवस्थाएँ कैसे चलती हैं, दुनिया की राजनीति कैसे चल रही है, खेलों में क्या हो रहा है; किस देश में किस तरह की व्यवस्थाएँ चलतीं हैं, तमाम धर्म हैं ये सब क्या कहते हैं; देशों का, जातियों का, समुदायों का इतिहास क्या रहा है; विज्ञान में, तकनीक में नया क्या हो रहा है – ये सब ज्ञान रखो। इससे मन ज़रा तीव्र होता है। और दूसरी बात – अपने शरीर पर ध्यान दो। क़िताबें तुमसे नहीं पढ़ीं जातीं, तो तुम उनको ऐसे ही पढ़ लो, किस्सा है, कहानी है।

और बहुत ज़्यादा उन चीज़ों में गहराई मत देखो जहाँ गहराई है ही नहीं। कुछ मामले इतने गहरे नहीं होते कि उनका गहरा इलाज करना पड़े। माथे पर अगर मुहाँसा निकल आएगा, तो ब्रेन सर्जरी थोड़े ही कर देंगे। गड़बड़ हो जाएगी न? तुम्हारी समस्या इतनी गहन-गंभीर है ही नहीं जिसका कोई गंभीर इलाज हो। सीधी-सी बात है। कॉलेज में हो, इस समय का पूरा -पूरा सदुपयोग करो।

देखो अहंकार छोटा है, तो उसे सदा किसकी तलाश है? कि अपना छोटापन दूर कर सके। तो बड़ा मज़ा आता है अपनी समस्याओं को भी बड़ा बताने में, कि -“अरे साहब, तुम्हारी क्या समस्याएँ हैं, हम अपनी बताते हैं। तुम छोटे लोग, तुम्हारी छोटी समस्या, हमारी समस्याएँ बहुत बड़ी-बड़ी हैं।” देखा है लोगों को कितना अद्भुत आनंद पाते हैं अपनी समस्याएँ बताने में?

“मेरी समस्याएँ पूछिए। आपका कुत्ता भाग रहा है, मेरा बेटा भाग गया। आपकी कोई समस्या है?”

“आपकी चप्पल नहीं मिल रही, मेरी बीवी नहीं मिल रही। कोई समस्या है आपकी?”

(हँसी)

बहुत छोटी-सी बात है, उसको विराट रूप मत दो। खेलो, और पढ़ो। और पाठ्यक्रम की क़िताबें उतनी ही पढ़ लो कि बस पास हो जाओ। और बहुत कुछ है दुनिया में पढ़ने लायक, उसको पढ़ो।

देखो पाठ्यक्रम की क़िताब पढ़कर तुम्हें वैसे भी कोई लाभ होना नहीं है। जैसा तुमने अभी तक पाठ्यक्रम के साथ न्याय किया है, और जैसा तुम्हारा कॉलेज है, मैं समझता हूँ बहुत ज़्यादा सिलेबस पढ़कर तुम्हारा कोई कल्याण हो जाने वाला नहीं है। तुम ले आओगे पिछत्तर-अस्सी प्रतिशत, तो क्या हो जाएगा? उससे अच्छा ये है कि तुम अपने व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास कर लो।

छोटे-मोटे कॉलेज में तो कोई टॉपर भी होता है, तो  उसे मिल क्या जाता है? तो क़िताबें रट-रटकर अपने डिपार्टमेंट के अग्रणी भी हो गए, नम्बर एक, टॉपर भी हो गए, तो करोगे क्या? डिग्री लटकाए घूमोगे। लेकिन पास होना, ये न हो कि स्मृति पर एक धब्बा लगा लिया कि पढ़ने गए थे और वहाँ से निकाले गए, क्योंकि फेल हो गए। आमतौर पर जो साधारण इंजीनियरिंग कॉलेज होते हैं, वहाँ कोई भी उत्कृष्ट नहीं होता। वहाँ सब ऐसे ही होते हैं – घुसते हैं, निकलते हैं। आते समय इतनी उम्र थी, जाते समय उससे चार साल ज़्यादा हो गई। कई बार पाँच या छः साल ज़्यादा होती है।

तो तुम किस बड़े अभियान में लग गए हो कि – “मैं कॉलेज में हूँ, लेकिन पढ़ नहीं पा रहा”? न तुमने कभी पढ़ाई की, न तुम्हारे पूरे डिपार्टमेंट में किसी ने पढ़ाई की, न उस कॉलेज में कोई पढ़ता है। तुम ये क्या विकराल समस्या लेकर आ गए हो कि पढ़ा नहीं जा रहा। छोटे कॉलेजों में ज़्यादा पढ़ना शुरू कर देते हैं लड़के, वो ख़तरा बन जाते हैं। शिक्षक को बड़ी असुविधा हो जाती है। वो पढ़ाने आए हैं, और उन्होंने ऊटपटाँग सवाल पूछ दिए। वो निकाल और दिए जाते हैं।

(हँसी)

मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि तुम अग्रणी हो जाओ पढ़ाई-लिखाई में। छोड़ो। वो वैसे भी तुमने कभी किया नहीं, न उसका तुम्हारा मन है। पास होने लायक कर लो, जब कॉलेज में घुसे ही हो। और कोई महत क्रांति तुमसे हो नहीं रही है। तुम बस एक डिग्री ले लो हाथ में, और इस समय का सदुपयोग कर लो।

कोई बहुत भारी लक्ष्य पा जाओ जीवन में तो मेरे पास आना, फिर मैं कहूँगा,”छोड़ो कॉलेज, आज़ादी की लड़ाई है, तुम भी क्रांति का झंडा फ़हराओ।” पर न कोई महत लक्ष्य है, न आज़ादी की लड़ाई है, न कोई महाक्रांति यहाँ हो रही है। कॉलेज है, कॉलेज की कैन्टीन के समोसे हैं, और यही ज़िंदगी है। इसमें मैं कौन-सा तुमसे कहूँ कि रणभेरी बजाओ और शंख फूँको। पास हो जाओ, यही बड़ी बात है।

वज़न कितना है तुम्हारा बेटा?

प्रश्नकर्ता: साठ किलो।

आचार्य प्रशांत: अगली बार आना तो पैंसठ किलो करके आना। मूँछें ज़रा घनी करके आना, और बाज़ू ज़रा और मोटे करके आना। बाकी सब अभी छोड़ो। वो ज़्यादा बड़ा सवाल है।


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