इंजीनियरिंग की पढ़ाई, और मन में दुविधाएँ || आचार्य प्रशांत (2019)

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प्रश्न: आचार्य जी, मै इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रहा हूँ। पढ़ने में अच्छा हूँ, अंक अच्छे आते हैं, पर पढ़ने में मन नहीं लगता क्योंकि पता ही नहीं है कि क्यों पढ़ रहा हूँ। अपने बारे में कुछ भी नहीं जानता, और दुनिया के बारे में जानने को मुझे कहा जा रहा है। समझ ही नहीं पाता कि क्या कर रहा हूँ और क्यों कर रहा हूँ।

कृपया मदद करें।

आचार्य प्रशांत: नहीं, ठीक कर रहे हो। दुनिया के बारे में अगर जान गए तो अपने बारे में बहुत दूर तक जान गए तुम। अविद्या का बहुत महत्त्व है। जिसको आप इंजीनियरिंग या व्यावसायिक शिक्षा कहते हैं, ये सब ‘अविद्या’ की श्रेणी में आती हैं। वास्तव में हमारे शिक्षण संस्थानों में जो भी पढ़ाया जा रहा है तो अधिकाँशतः अविद्या ही है। और उसका ख़ूब महत्त्व है। वो बेकार की चीज़ नहीं है।

अगर तुम ये जान लो कि तुम्हारे कार का इंजन कैसे काम करता है, तो तुम्हें मदद मिलेगी ये जान लेने में कि तुम्हारे दिमाग का इंजन कैसे काम करता है। दोनों में बहुत समानताएँ हैं। दोनों ख़ूब ईंधन पीते हैं, दोनों गर्म होते हैं, धुआँ मारते हैं; प्रक्रियाएँ भी दोनों की बहुत दूर-दूर की नहीं हैं।

इसी तरीक़े से, अगर तुम मेडिकल के छात्र हो, और तुम समझ ही लो कि मस्तिष्क कैसे काम करता है, कि पूरा जो ये स्नायु तंत्र है, और ये पूरी जो आंतरिक प्रणाली है, ये कैसे काम करती है, तो अपने बारे में बहुत सारे जो भ्रम हैं उनसे मुक्ति पा जाओगे।

इसी तरीक़े से चाहे गणित हो, चाहे समाज समाजशास्त्र हो, चाहे मनोविज्ञान हो, ये सब तुम्हें तुम्हारे बारे में बहुत कुछ बता रहे हैं। कोई ये न कहे कि – “मैं विश्वविद्यालय में पढ़ता हूँ जहाँ बाहर-बाहर शिक्षा दी जा रही है, मुझे मेरे बारे में तो कुछ बताया ही नहीं जा रहा है।” नहीं, वो अविद्या भी उपयोगी है, काफ़ी उपयोगी है। काफ़ी उपयोगी है, काफ़ी नहीं है। आवश्यक है, पूर्ण नहीं है। पूर्ण उसे करता है अध्यात्म।

अंतर समझ रहे हो?

तो उपनिषद् तुम्हें बताते हैं कि – “विद्या बहुत आवश्यक है, अविद्या भी बहुत आवश्यक है। जो विद्या की उपेक्षा करके अविद्या में पड़े रहते हैं, वो अंधे कुएँ में गिरते हैं।” और उपनिषद् उसके बाद चुटकी लेते हुए बोलते हैं, “जो लोग अविद्या की उपेक्षा करके विद्या भर में पड़े रहते हैं, वो और गहरे कुएँ में गिरते हैं।”

फिर आगे मर्म की बात बताते हैं। कहते हैं, “जो संसार को अमरतापूर्वक जीना चाहते हों, उन्हें अविद्या और विद्या दोनों आनी चाहिए। विद्या और अविद्या दोनों में प्रवेश होना चाहिए।” तो अभी जो तुम कर रहे हो वो अविद्या है। वो तुम्हें आनी चाहिए। मैंने  कहा कि वो काफ़ी ज़रूरी है, काफ़ी नहीं है। अविद्या के साथ-साथ चाहिए हमें अध्यात्म।

स्कूलों में पढ़ाई, कॉलेजों में पढ़ाई, इनमें जो हो रहा है वो ठीक हो रहा है। ठीक है, पर अधूरा है। उसको पूरा कौन करेगा? अध्यात्म। आध्यात्मिक शिक्षा की कमी है। लेकिन इसका ये अर्थ नहीं है कि तुम स्कूल और कॉलेज की शिक्षा छोड़कर अध्यात्म में आ जाओ। वहाँ पर जो बताया जा रहा है, वो भी जानना ज़रूरी है।

अध्यात्म कॉलेजी शिक्षा के बिना अधूरा है, और कॉलेज का पाठ्यक्रम अध्यात्म के बिना अधूरा है।

दोनों चाहिए।

प्रश्न २: आचार्य जी, हर क़दम पर इतने लोग समझाने के लिए तैयार हो जाते हैं कि समझ ही नहीं आता किसकी सुनूँ। और अगर इनको नज़रअंदाज़ करें तो अपने अंदर बहुत सारी आवाज़ें आने लगती हैं कि क्यों इनको नज़रअंदाज़ कर रहे हैं। फिर ग्लानि उठती है, डर उठता है। और यूट्यूब खोलें तो वहाँ भी भरमार है वक्ताओं की जो हमें समझा ही रहे हैं कि हमें क्या करना चाहिए। आपमें मेरी श्रद्धा बन पाई है पिछले छः महीनों में।

मैं आपसे ये जानना चाहता हूँ कि – अपने दिल की सुनूँ जो कभी-कभार ही कुछ कहता है, या सब की सुनूँ?

आचार्य प्रशांत: देखो, अंततः मालिक तुम हो। सुनोगे किसी की भी, मालकियत फिर भी तुम्हारी ही रहेगी। सुनने का निर्णय भी तुम्हें ही करना है, पालन करने का निर्णय भी तुम्हें ही करना है। हाँ सुनने में किन बातों का ध्यान रखा जा सकता है, वो मैं तुम्हें बता सकता हूँ; सुनने में, चुनने में।

पहली बात – जो कोई बोल रहा है, उसका थोड़ा अतीत-इतिहास देख लो। उसने ख़ुद क्या पाया है, क्या गँवाया है, ये देख लो।

दूसरी बात – उसका तुम्हारे ऊपर प्रभाव क्या हो रहा है ये बात साफ़-साफ़ देख लो। वो तुम्हें ऐसे विकल्प सुझा रहा है जो तुम्हें आराम दे देंगे, सुख दे देंगे, निश्चिन्त कर देंगे, या कुछ ऐसा बता रहा है जो तुमको श्रम और मेहनत करने पर मजबूर कर देगा।

चित्त आमतौर पर किसी का भी हो, ऐसा विकल्प तलाशता है जिसमें श्रम और ऊर्जा का व्यय कम-से-कम हो। श्रम का, ऊर्जा का, धन का, समय का व्यय कम-से-कम हो। और ये बात सबको पता है – तुम्हें भी पता है, मुझे भी पता है, दुनिया के सभी वक्ताओं को पता है। तो ऐसा विकल्प बताना हमेशा सुविधाजनक रहता है जो आरामदायक और आसान लगे। ऐसों से बचना जो तुम्हें आसान रास्ते दिखाते हैं। क्योंकि ये तो हमारी कमज़ोरी है ही कि हम आसान रास्तों के ही लालच में रहते हैं।

और ये भी हम अच्छी तरह से  जानते हैं कि कोई हमें कठिन रास्ता बताता है तो उससे हमें थोड़ी कोफ़्त होती है। और ये बात कठिन रास्ता बताने वाला भी जानता है कि अगर वो कठिन रास्ता बताएगा तो सुनने वाले को तकलीफ़ होगी। हो सकता है सुनने वाला सुनना बंद कर दे और उठ के चला जाए। तुम मुझसे पूछोगे तो मैं कहूँगा कि जहाँ आसानी दिख रही हो, उससे तो बचना ही।

धीरे-धीरे अगर तुम बोलने वाले के प्रभाव से ज़्यादा अपने अंदर होने वाले बदलाव को महत्त्व दोगे, तो तुम्हें साफ़ दिख जाएगा कि विवेक दिखाकर क्या चुनना है और क्या ठुकराना है।

प्रभावशाली को मत सुनो, चाहे वो कोई भी हो।

उसकी तरफ़ जाओ जो तुम्हारे जीवन में सार्थक, सुन्दर बदलाव वास्तव में ला रहा हो।

वादा ही भर न कर रहा हो, वास्तव में ला रहा हो।

काम बन जाएगा।


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