अध्यात्म है दोनों से आज़ादी ||आचार्य प्रशांत, ज़ेन कोआन पर 2018

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ज़ेन कोआन: मोकुसेन का हाथ

मोकुसेन तांबे के घर में रहते थे। एक अनुयायी ने एक दिन मोकुसेन को अपनी पत्नी के कंजूस व्यवहार के बारे में बताया। मोकुसेन उस अनुयायी के घर गए और उसकी पत्नी को अपनी बंद मुट्ठी दिखाई।

अनुयायी की पत्नी ने आश्चर्य से पूछा: “इसका क्या अर्थ है?”
मोकुसेन: “अगर ये मुट्ठी इसी तरह बंद रहेगी तो इसको क्या कहोगी?”
स्त्री: “विकार है ये, दोष है। ग़लत है ये।”

मोकुसेन ने अपनी मुट्ठी खोली और पंजा दिखाया, और बोले: “अगर ये सदा ऐसे रहे तो?”
अनुयायी की पत्नी ने कहा: “दूसरी तरह का विकार। दूसरी तरह का दोष।”
तो मोकुसेन बोले: “अगर तुम इतना समझती हो, तो तुम एक अच्छी पत्नी हो।”

यह कहकर मोकुसेन वहाँ से चले गए। इस घटना के बाद अनुयायी की पत्नी बचत करने में भी मदद करने लगी, और बाँटने में भी।

प्रश्न: आचार्यजी , इस ज़ेन कोआन का क्या अर्थ  है ?

आचार्य प्रशांत: अध्यात्म दो सिरों में से किसी एक सिरे पर तम्बू गाड़ लेने का नाम नहीं है। (दोहराते हुए) अध्यात्म द्वैत के किसी एक सिरे पर तम्बू गाड़ लेने का नाम नहीं है।

अध्यात्म न दाएँ से आसक्त हो जाने का नाम है, और न बाएँ से।

अध्यात्म न बंद मुट्ठी का नाम है, और न ही खुली मुट्ठी का नाम है।

अध्यात्म का अर्थ है – बंद मुट्ठी से आज़ादी और खुली मुट्ठी से भी आज़ादी।

न मुट्ठी का बंद होना आवश्यक है, न मुट्ठी का खुला रहना आवश्यक है। आवश्यक मात्र……..

प्रश्नकर्ता:  संतुलन है, सम्यकता है।

आचार्य प्रशांत: आवश्यक मात्र……..आज़ादी है; बंद मुट्ठी से भी आज़ादी और खुली मुट्ठी से भी आज़ादी।

तो न तो बंद मुट्ठी रखना आवश्यक है, न खुला रहना आवश्यक है। आवश्यक मात्र आज़ादी है। इसी आज़ादी, इसी मुक्ति को ‘सम्यकता’ भी कहते हैं।

कोई होता है, तुम्हारे भीतर पर तुमसे ऊपर, तुम्हारा अपना पर तुमसे बहुत दूर का, जो बता देता है तुम्हें कि कब मुट्ठी खोलनी है और कब मुट्ठी बंद रखनी है। याद रखना – वो तुम्हारे भीतर है, पर तुमसे बहुत ऊपर का है। यही मत मान लेना कि मेरे भीतर है तो मेरे ही जैसा हो गया। भीतर है, वो तुम्हारे बहुत निकट है, पर फिर भी वो तुमसे बहुत दूर है, ऊँचा है।

और निकट है वो तुम्हारे, फिर भी है तुमसे बहुत ऊँचा; कहीं और का है। उसका अपमान मन कर लेना, नहीं तो वो बताना बंद कर देगा। नहीं जान पाओगे फिर कि कब मुट्ठी बंद रखनी है और कब खोलनी है।

यही दोष था बेचारी स्त्री का – उसकी मुट्ठी खुलती ही मुश्किल से थी। शिकायत क्या थी अनुयायी को? कि पत्नी कंजूस है, कृपण है।

तो क्या संत ने, गुरु ने, ऋषि ने ये समाधान दिया, कि – “सुन स्त्री तेरी मुट्ठी बंद थी, अब तू इसे खुली रख?” नहीं, उन्होंने ये समाधान नहीं दिया। उन्होंने कहा, “जैसे दोष है मुट्ठी का बंद होना, वैसे ही दोष है मुट्ठी का खुला होना।” बंद मुट्ठी भी दोष है और खुली मुट्ठी भी दोष है।

दोष वास्तव में कहाँ है? दोष उसमें है जो कहता है, “मुट्ठी बंद रखो, सतत मुट्ठी बंद रखो।” और दोष उसमें है जो कहता है, “सतत मुट्ठी खुली रखो।” कभी वो तुमसे कहता है, “खुली मुट्ठी आदर्श है,” कभी वो तुमसे कहता है, “बंद मुट्ठी आदर्श है।” वो तुम्हें एक ढर्रा देता है, एक रिवाज़ देता है। क्यों ? क्योंकि वो नहीं जानता कि कब बंद रखना सही है, और कब खोलना सही है। तो वो तुमको एक परम्परा दे देता है, एक रूढ़ि दे देता है।  एक ढर्रा दे देता है ।

और ढर्रा ये भी हो सकता है कि – दान बड़ी बात है। और तुम लुटाए ही जा रहे हो। और ढर्रा ये भी हो सकता है कि – बचत बड़ी बात है। और तुम बचाए ही जा रहे हो। ये अंधेपन का, अज्ञान का लक्षण है। तुम समझ ही नहीं रहे हो कि कब बचाना है, कब लुटाना है।

आध्यात्मिक आदमी को तुम कभी किसी एक छवि में कैद नहीं कर पाओगे।

तुम कभी उसे बचाता पाओगे, और कभी उसे लुटाता पाओगे।

वो तुम्हारी हर धारणा को तोड़ने को तैयार खड़ा है।

तुम जब भी ये धारणा बनाओगे कि – आध्यात्मिक आदमी तो वो है जो बचाता भर है – तुम पाओगे कि वो तो लुटा रहा है। और तुम जब भी धारणा बनाओगे कि वो तो लुटाता ही रहता है, दानवीर होता है, वैसे ही तुम पाओगे कि वो तो बचाता भी है। उसका प्रयोजन तुम्हारी धारणाओं से है ही नहीं। उसका प्रयोजन तो है (आकाश की ओर इंगित करते हुए) ‘मालिक’ की आज्ञा से। मालिक ने कहा, “बचाओ,” तो बचा लिया।

वही सम्यक कर्म है।

“अपनी पर नहीं चलूँगा, इसलिए नहीं बचा रहा। इसी बात को ऐसे भी कह सकते हो, “मेरा स्वार्थ अब परमार्थ से जुड़  गया है। मेरे स्वार्थ ने परमार्थ की संगत कर ली है, सामंजस्य कर लिया है। मैं अपने लिए चाहता ही कुछ ऐसा हूँ जो पारमार्थिक हो। मैं अपने लिए जो कुछ भी चाहता हूँ, उसमें जगत का भी कल्याण होता है। ऐसा नहीं कि अपने लिए मैं कुछ चाहता नहीं, चाहता हूँ। पर अब ऐसा नहीं होता कि जिसमें मेरा भला, उसमें दूसरों का बुरा।”

“अब खेल कुछ ऐसा सध गया है जिसमें मेरी भलाई के साथ, दूसरों की भलाई जुड़ ही गई है। तो मैं तो आँख मूँदकर अपना ही भला कर लेता हूँ, क्योंकि मुझे पता है कि मेरा भला होगा तो दुनिया का भला भी हो ही जाएगा। या फिर मैं आँख मूँदकर दुनिया का ही भला कर देता हूँ, क्योंकि मुझे पता है कि दुनिया का भला होगा तो, मेरा भला हो ही जाएगा।”

बात समझ रहे हो?

“अब स्वार्थ से लेना -देना नहीं। अब अपनी इच्छा, अपने लाभ के लिए न मुट्ठी खोलूँगा, न मुट्ठी बंद करूँगा। अब बात आगे की है।”

तो कोई सूत्र अब नहीं दिया जा सकता, कोई तयशुदा बात नहीं है। अब बात आगे की है। जैसे परमात्मा – ब्रह्मा, विष्णु, महेश; कभी बनाया भी जा रहा है और कभी मिटाया भी जा रहा है। बनाया भी जा रहा है, चलाया भी जा रहा है, और फिर, मिटाया भी जा रहा है। अटक नहीं गए हैं बनाने में, कि ब्रह्मा जी बनाने में लगे हुए हैं और दोनों जन कुछ कर ही नहीं रहे हैं।

यहाँ प्रभव भी है और प्रलय भी;  विकास भी है और विध्वंस भी।

अटक मत जाना आदर्श इत्यादि पर। अटल खड़े मत हो जाना, कि आध्यात्मिकता का अर्थ तो फलाने आदर्श का पालन करना है।

आध्यात्मिकता में आदर्श नहीं होते।


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