लड़कियों से बात करने में झिझक || आचार्य प्रशांत (2018)

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प्रश्न: आचार्य जी, लड़कियों से बात करने में झिझक महसूस होती है। इस झिझक को कैसे दूर करूँ?

आचार्य प्रशांत जी: तुम हर समय लड़के बनकर क्यों घुमते हो?

तुम जितना ज़्यादा देह-भाव में जियोगे, उतना ज़्यादा अपने लिए परेशानियाँ खड़ी करोगे।

लड़कों के सामने कौन शरमाती है? लड़की। ‘लड़की’ माने क्या? लड़की का हाथ, लड़की का जिस्म, लड़की के अंग। कौन-सा अंग शरमाता है ज़रा बताना। लड़कियाँ लड़कों के सामने जाती हैं, तो क्या उनका शरीर मना कर देता है? गाल शरमाते हैं? होंठ शरमाते हैं? ऐसा तो कुछ होता नहीं। तो क्या होता है ऐसा लड़की में, जो लड़के के सामने जाने से घबराता है? वो मन जिसने अपनी पहचान बना रखी है कि – “मैं तो लड़की हूँ।” इस पहचान में मत जियो न।  

कोई भी पहचान जो तुम लेकर चलोगे, वो तुम्हारे लिए एक झूठी आशा ही सिद्ध होगी।

तुम कुछ भी बनते ही इसी उम्मीद में हो कि इससे शांति, तृप्ति मिल जाएगी।

वो नहीं मिलते।

हाँ वो ज़रूर मिल जाता है किसकी बात कर रहे हो।

घबराहट मिल जाती है।

होता क्या है कि विपरीत लिंगी को देखकर तुम्हारी जो अपनी लिंग-आधारित पहचान है, जेंडर-आइडेंटिटी है, वो दूनी सक्रिय हो जाती है। लड़कियाँ सामने आतीं हैं तो तुम और ज़्यादा लड़के बन जाते हो। जब पुरुष सामने आता है, तो स्त्रियाँ और ज़्यादा ‘स्त्री’ हो जाती हैं। इन झंझटों से बचने का सीधा तरीका है – या तो अपने आप को कुछ मत मानो, और अगर बहुत आग्रह ही है अपने आप को कोई नाम, पहचान देना का, तो कह दो, “विशुद्ध चैतन्य हूँ।” विशुद्ध चैतन्य का कोई लिंग नहीं होता।

या तो कह दो, “कुछ भी नहीं हूँ।” या कह दो, “शिवोहम, शून्योअहम।” बिलकुल ठीक।  निर्वाणषट्कम सुना है न? क्या कहता है?

श्रोतागण: मनोबुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहं।

आचार्य प्रशांत जी: मन, बुद्धि, चित्त अहंकार कुछ नहीं हूँ मैं।

न बच्चा हूँ, न बूढ़ा हूँ, न स्त्री हूँ, न पुरुष हूँ।  क्या हूँ मैं?

श्रोतागण: शिवोहम, शिवोहम ।

आचार्य प्रशांत जी: ठीक। अब शिव को लड़कियों से क्या घबराहट है? या शिव तत्त्व को लड़कों से क्या घबराहट है?  है?

न अमीर हूँ, न ग़रीब हूँ,  हूँ, न विदेशी हूँ। न यहाँ  का हूँ, न वहाँ का हूँ।  सब से शून्य हूँ मैं, शिव हूँ मैं।

पढ़ा लिखा हूँ मैं?

श्रोतागण: नहीं।

आचार्य प्रशांत जी: अनपढ़ हूँ मैं?

श्रोतागण: नहीं।

आचार्य प्रशांत जी: जानता हूँ मैं?

श्रोतागण: नहीं।

आचार्य प्रशांत जी: अनजान हूँ मैं?

श्रोतागण: नहीं।

आचार्य प्रशांत जी: हिन्दू हूँ मैं?

श्रोतागण: नहीं ।

आचार्य प्रशांत जी: मुसलमान हूँ मैं?

श्रोतागण: नहीं ।

आचार्य प्रशांत जी: तुम ये सब न कह पाओ छोटी बातें – “अमीर हूँ, गरीब हूँ, हिन्दू हूँ, मुसलमान हूँ”, इसीलिए देने वालों ने तुम्हें बहुत सारे नाम दे दिए, वो सब झुनझुने हैं। कभी कह दिया, “मैं निरामय हूँ”, कभी कह दिया, “मैं विशुद्ध हूँ।” कभी कह दिया, “मैं आत्मा हूँ।” कभी कहा, “मैं ब्रह्म हूँ।” कभी कहा, “मैं पूर्ण हूँ।” कभी कहा, “निर्विकार हूँ,” कभी कहा, “शिव हूँ,” कभी कहा, “शून्य हूँ।”  ये सब इसीलिए दिए ताकि तुम ये न कहो कि – “मैं अजितेश (प्रश्नकर्ता का नाम) हूँ । “

‘पूर्ण’ कह दो अपने आप को, ‘शुद्ध’ कह दो अपनेआप को, ‘मुक्त’ कह दो अपने आप को।

‘निरामय’ कह दो अपने आप को, ‘चैतन्य’ कह दो अपने आप को, ‘अनंत’ कह दो अपने आप को।

वो मत कहना अपने आप को, जो तुम्हें दुनिया कहती है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कुछ धारणाएँ होतीं हैं जो बहुत ज़्यादा जकड़ी होती हैं, जैसे – “मैं सुन्दर हूँ”, “मैं समझदार हूँ”। कुछ भी कर लें, इसमें बह ही जाते हैं ।

आचार्य प्रशांत जी: अभी तुम्हारी सुन्दरता बात कर रही है?

तो जैसे अभी हो ऐसे अन्यथा भी तो रह सकते हो न। अभी सुन्दर होकर तो नहीं बात कर रहे। शिक्षित, अशिक्षित, अमीर, ग़रीब  होकर तो नहीं बात कर रहे। कुछ लोग बीच-बीच में ज़रूर तार तोड़ देते होंगे, नहीं तो ध्यान की धार है बिलकुल। है न? जिसमें तुम्हारी हस्ती ही नहीं होती, तो कोई पहचान क्या होगी। कोई होगा, तो उसकी पहचान होगी।

यहाँ पर अगर बिना पहचान के मस्त काम चल रहा है, तो अन्यत्र भी तो चल सकता है, सर्वदा भी तो चल सकता है। एक मौहाल है यहाँ पर, और उस माहौल के तत्त्वों को तुमने जान ही लिया होगा। जहाँ ऐसे तत्त्व न पाओ, वहाँ मत जाओ। और जहाँ इसके विपरीत तत्त्व पाओ, वहाँ से तो दौड़ लगाओ। यहाँ बात चेतना की हो रही है। तो ऐसी लोगों के माहौल से बचना जहाँ तुम्हारे शरीर की बात करते हों।

अगर ऐसे लोगों की संगति है तुम्हारी जो तुम्हें बार-बार यही याद दिलाते हैं कि तुम्हारी उम्र क्या है, तुम्हारा क़द क्या है, तुम्हारा रूप-रंग क्या है, तो ऐसों की संगति से बचो।

कोई भी पहचान तुम्हारी तो होती नहीं ।  

दुनिया तुम्हारे ऊपर पहचान थोपती है।  

तो जो लोग, जो माहौल, जो संगति तुम्हारे ऊपर कोई भी पहचान थोपती हो, उस संगति से बचो ।

कष्ट होता है न उसमें?

प्रश्नकर्ता: जी ।

आचार्य प्रशांत जी: पहचान लेकर चलने में भी तो कष्ट होता है।  तो सही कष्ट चुनो ।

 पहचानों को हटाने में भी कष्ट है, और पहचान लेकर चलने में भी कष्ट है।

सही कष्ट चुनो।

एक इशारा दिए देता हूँ।

पहचानों को हटाने में जो कष्ट है वो अंततः तुम्हें कष्ट से मुक्ति दिला देगा।

और पहचान लिए-लिए चलने में जो कष्ट है, वो कष्ट कभी ख़त्म नहीं होगा, बढ़ता ही जाएगा।  

तो वो कष्ट चुनो न जो आगे जाकर ख़त्म हो जाए।

वो कष्ट क्यों चुनते हो जो आज भी है और कल भी रहेगा, और कल आज से दुगुना रहेगा ।

हाँ, मैं कोई झूठा दिलासा नहीं देना चाहता। अध्यात्म के रास्ते पर भी कष्ट तो है ।

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शब्द-योग सत्र से उद्धरित। स्पष्टता हेतु सम्पादित।

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