आकाश का देवता नहीं, माटी का महात्मा || आचार्य प्रशांत, महात्मा गाँधी पर (2019)

आकाश का देवता नहीं,

माटी का महात्मा

 

~ वो दिखने में अति औसत, बल्कि अनाकर्षक थे।

कद के छोटे, कृषकाय, ढाँचे-सा शरीर, श्यामवर्णी साधारण चेहरा, चेहरे के अनुपात में बड़े-बड़े कान।

न चौड़े कंधे, न चौड़ी छाती।

पिछली कई शताब्दियों में उनकी छवि से ज़्यादा भारत ने किसी की छवि को निहारा नहीं।

उनकी प्रतिमाओं से ज़्यादा किसी की प्रतिमाएँ लगाईं नहीं।

उनके चेहरे से ज़्यादा किसी चेहरे को छापा नहीं।

~ उनकी आवाज़ में न कोई मादकता थी, न गरज।

किसी अनजान भीड़ में कुछ बोलते तो न कोई सुन पाता, न ध्यान देता।

उनकी एक आवाज़ पर हिन्दुस्तान उठ खड़ा होता था।

उनकी आवाज़ आकाशवाणी की तरह देश के चप्पे-चप्पे तक पहुँचती थी, और दूर-दराज़ का ग्रामीण भी सत्याग्रही हो जाता था।

~ एक वैष्णव वणिक परिवार से होते हुए भी उन्होंने एक बार उत्सुकतावश माँसभक्षण किया, और खूब पछताए।

उनके आश्रम में आकर हज़ारों लोग शाकाहारी हो गए।

उनके नाम के साथ शाकाहार और पशुप्रेम सदा के लिए जुड़ गए।

~ धर्म को लेकर आरम्भ में संशय में रहे। धर्म-परिवतन का भी विचार किया।

युवावस्था में भारतीय दर्शन पर कोई विशेष आस्था न रख पाए।

‘महात्मा’ कहलाए, और साबरमती के संत।

भगवद्गीता को माँ माना और रामराज्य को असली स्वाधीनता।

पूरा आन्दोलन ही धर्म की बुनियाद पर रहा, कहा कि धर्म के बिना राजनीति भयानक हो जाएगी।

~ एक बार बड़े भाई के पैसों की चोरी की, फिर जाकर पिता को पत्र में सब बता दिया।

एक गरीब देश ने पैंतीस वर्षों तक उन पर चंदे और संसाधनों की आस्थापूर्वक भेंट चढ़ाई।

उद्योगपतिओं ने तो विश्वास से दिया ही, गरीब किसान भी दो पैसा दो रूपया जितना हो सकता चढ़ा देते। उनको धन समर्पित करने का अर्थ था आज़ादी के पावन यज्ञ में आहुति देना।

~ युवावस्था में भीरु थे। भीड़ के सामने बोल न पाएँ। बैरिस्टर हुए तो अदालत में जिरह से घबराकर अर्ज़ियाँ लिखने का काम शुरू कर दिया।

ब्रिटिश सरकार, जिसमें सूरज कभी नहीं डूबता था, उनके नाम से थर्राई।

जिन्होंने दो विश्व युद्ध जीत लिए, जर्मनों और जापानियों को परास्त कर दिया, उनका ज़ोर लाठी टेकते एक नंगे संत पर नहीं चला।

~ लोगों से मिलने-जुलने में घबराते थे। अंतर्मुखी और एकान्तप्रिय थे।

आजीवन हज़ारों जनसभाएँ संबोधित कीं। लोगों के बीच ही चले, उठे-बैठे।

करोड़ों लोगों से सभाओं और पदयात्राओं में मुलाक़ात करते रहे।

जो उनसे मिलता, बिना प्रभावित हुए न लौटता।

~ एक समय में उनकी कामवासना उद्दाम थी। पिता के अंतिम समय में भी वासना ने पिता के सिराहने से दूर कर दिया।

ब्रह्मचर्य के पारंपरिक व्रत को व्यापक अर्थों के साथ अपनाया।

कहा कि ब्रह्मचर्य मात्र शारीरिक सहवास का निरोध नहीं है। मन की तमाम विकारों से मुक्ति के बिना ब्रह्मचर्य अर्थहीन है।

अड़तीस की उम्र में ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया।

~ पुरुष-श्रेष्ठता के पुराने संस्कारों के चलते पत्नी पर कई बार अपनी इच्छा थोपने का प्रयास किया।

कस्तूरबा शांतिपूर्वक उनकी अनुचित इच्छाओं का विरोध करें, व सहयोग से इनकार करें।

धीरे-धीरे पत्नी के समक्ष नमित होने लगे व अहिंसात्मक असहयोग का पाठ पढ़ने लगे।

कहा कि पत्नी इस मायने में उनकी गुरु हुईं।

~ दूसरों के आगे दृढ़ न रह पाएँ। कई बार दबाव में आकर दूसरों की इच्छा के सामने झुक जाएँ।

उनसे ज्यादा ज़िद्दी आदमी कोई दूसरा शायद ही हो।

उनके सामने चर्चिल को पसीने आ जाएँ। जवाहरलाल हठ करने से घबराएँ।

असहयोग आन्दोलन हो कि सविनय अवज्ञा, अपने निर्णय पर शुरू करें, और किसी चौरीचौरा के होने पर स्वयं ही अंत।

उनकी बात न सुनी जाए तो अनिश्चितकालीन अनशन।

~ अंग्रेज़ों के सामने हीनभावना से ग्रस्त थे। पढ़ाई के लिए ब्रिटेन गए तो अंग्रेज़ों जैसा दिखने की कोशिश में समय और धन व्यय किये।

पूरी ब्रिटिश सत्ता ने उन्हें ससम्मान हैरत की नज़र से देखा,

और लाखों यूरोपिअनों और अमेरिकनों के वो पूजनीय व प्रेरणास्पद आदर्श बने।

~ जातिगत संस्कार माहौल और परिवार से उन्हें विरासत में मिले थे। पत्नी भी वर्ण व्यवस्था में विश्वास रखती थीं।

हरिजनों को आश्रम में सप्रेम स्वीकार करने पर उनका कड़ा विरोध हुआ।

आश्रम को मिलने वाली आर्थिक सहायता बंद हो गयी। पत्नी, बहन, आश्रमवासी सब अवज्ञा में खड़े हो गए।

उन्होंने दृढ़ता से अपनी ही सगी बहन को आश्रम से निकाल दिया, और पत्नी को सीख देने के लिए एक हरिजन बच्ची को गोद ले लिया।

~ ब्रिटेन में शिक्षा ली और दक्षिण अफ्रीका में वकालत करी। दशकों तक विदेश में रहे। विदेशी कपड़े और परिवेश उनकी आदतों में समाविष्ट हो गए थे।

विदेशी वस्त्र तो त्यागे ही त्यागे, आम आदमी का परिधान भी त्याग दिया।

लंगोटीधारी फ़कीर हो लिए।

खादी को ग्राम स्वराज्य का प्रतीक, और चरखे को हथियार बना लिया।

~ अंग्रेज़ी भाषा पर ज़बरदस्त पकड़ थी। उनके जैसी अंग्रेज़ी कहने और लिखने वाले कम लोग थे।

कांग्रेस को अंग्रेज़ी में काम करने पर धिक्कारा।

हिंदी तथा क्षेत्रीय भाषाओं का अधिक से अधिक प्रयोग किया।

देश के ह्रदय को जगाने में हिंदी की केन्द्रीयता पर बहुत ज़ोर दिया।

~ चीनी उन्हें जीता-जागता बुद्ध मानें, ईसाई उनमें जीसस की छवि देखें, भारतीयों के लिए तो वो आज के समय के सबसे बड़े महात्मा थे ही।

मीराबेन (मेडेलीन स्लेड) जब आश्रम रहने आईं, तो बोले, “गुरु होने जैसी पूर्णता मुझमें नहीं, बस मित्रवत पथप्रदर्शन कर सकता हूँ।”

सदा स्वयं को ज़मीन पर रखा और कभी अपने विषय में दैवीयता की धारणा प्रोत्साहित नहीं की।

***

आकाश से नहीं उतरे थे।

ज़मीन से उठे थे।

उनकी बात में देवपुष्पों की मादक सुगंध नहीं, गाँव की मिट्टी का सोंधापन था।

मनुष्य से महात्मा तक की श्रमसाध्य व लम्बी यात्रा की थी।

ठीक कहते थे: उनका जीवन ही उनका सन्देश है। जो उनके लिए संभव हो पाया, सबके लिए संभव है।

जब कोई अपने अतीत, अपनी वृत्तियों, और अपनी सीमाओं को चुनौती देता हुआ श्रद्धापूर्वक आगे बढ़ता है, तब उसकी उपस्थिति पूरे जगत में एक अपूर्व चेतना का संचार करती है।

प्रणाम।

~ आचार्य प्रशांत


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