उद्धरण – जुलाई’१९ में प्रकाशित लेखों से

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1.

बहुत लोग हैं, जो खाली समय से बहुत घबराते हैं। खाली समय मिला नहीं कि कुछ-न-कुछ करने लग जाते है, इधर-उधर भागते हैं। अकेलेपन से उन्हें बहुत दहशत रहती है। क्योंकि अकेलेपन में समाज, संसार थोड़ा पीछे हट जाता है। मन को कुछ दबी-पुरानी मद्धम आवाज़ें सुनाई देने लगती हैं, जो संसार के शोर में नहीं सुनाई देती हैं, आमतौर पर।

2.

‘अहम्’ केंद्र है, ‘मन’ अहम् की छाया है।

3.

‘अहम्’ दृष्टा है, ‘मन’ दृश्य है।
‘अहम्’ मैं है, ‘मन’ संसार है।

4.

आप वो हैं, ‘जिसको’ दिखाई देता है। आप जो कुछ भी देख रहे हैं, वो यूँही नहीं देख रहे हैं। वो आपकी दुनिया है, आप इसीलिये उसको ऐसा देख रहे हैं। आपका उससे सम्बन्ध है, इसीलिये आप उसको देख रहे हैं। आपका उससे सम्बन्ध न होता, तो आप उसको देख भी नहीं रहे होते।

5.

सही-गलत सिर्फ़ तुम्हारी मंज़िल होती है।
तुम जैसे हो, तुम्हारी मंज़िल वैसी होगी।
और क्या मंज़िल बना ली है तुमने, इससे तुम्हारा, और तुम्हारे जीवन का निर्धारण हो जाता है।

6.

लोग ये तो बताते हैं कि – ‘मुझे ये परेशानी है। मुझे ये समस्या है’। ये नहीं बताते कि वो परेशानी किसकी ख़ातिर है। सच्चाई की खातिर, मुक्ति की खातिर, प्रेम की खातिर, तुम परेशानियाँ झेल रहे हो, क्या बात है! बहुत बढ़िया! और स्वार्थ की खातिर, ईर्ष्या की खातिर, द्वेष की खातिर, लोभ की खातिर, तुम परेशानियाँ झेल रहे हो, तो धिक्कार है।

7.

सत्य की राह में दुःख मिले, तो प्रसाद जैसा।
झूठ की राह में सुख मिले, तो ज़हर जैसा।

8.

मुक्ति की ओर जा रहे हो, तो रास्ते में जो कुछ मिले, सब ठीक है। बंधन अच्छे-बुरे नहीं होते। बंधनों के पीछे देखने की मंशा देखनी होती है। क्यों स्वीकार किया है ये बंधन, ये देखना पड़ता है।
ये भी एक बंधन ही है तुम्हारे लिये कि अनुशासन के साथ बैठना है। इतने बजे बैठना है, इतने बजे उठना है। शिविर में भी तो कई तरह के बंधन हैं। बंधन न अच्छे होते हैं, न बुरे होते हैं।

बंधन किस दिशा में हैं? – ये पूछना होता है।

9.

जिसको दायित्व नहीं उठाना है, वास्तविक अर्थ में, प्रेमपूर्ण अर्थ में, तो नहीं ही उठायेगा। चाहे वो शादीशुदा हो, चाहे गैर-शादीशुदा हो। शादीशुदा आदमी भी अगर विलग हो चूका है, उसके भी अगर स्वार्थ पूरे हो चुके हैं, रिश्ते से उसका मन उठ चुका है, तो वो शादीशुदा रहते हुए भी कटा-कटा रहेगा, और काटने के तरीके ढूँढ लेगा।

और जहाँ तक आध्यात्मिक मन की बात है, वो इस बात की परवाह नहीं करता कि रिश्ते पर सामाजिक ठप्पा लगा है या नहीं लगा है। वो अपनी ज़िम्मेदारी जानता है।

10.

कोई ये सोचे अगर कि शादी अच्छा तरीका है किसी को ज़िम्मेदार बनाने का, तो वो ग़लतफ़हमी में है।
जिस व्यक्ति के भीतर आत्मज्ञान नहीं, प्रेम नहीं, तुम क्या सोच रहे हो, तुम उसकी शादी कर दोगे किसी से, तो वो अपने साथी के प्रति अचानक ज़िम्मेदारी और प्रेम से भर जायेगा?
कर दो शादी, कोई फ़र्क नहीं पड़ता। वो जैसा है, वैसा ही रहेगा।
शादी बाहर का ठप्पा है, वो तुम्हारा अंतस थोड़े ही बदल देता है।

11.

संत अनजाने को भी देखता है तो उसे अपना मानता है, और अपना मानकर उसके प्रति अपना धर्म, अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करता है।
संत और संसारी में यही अंतर है। संत, अनजाने अपरिचित व्यक्ति को भी अपना जानता है, और उसके प्रति अपनी ज़िम्मेदारी निभाता है।
और संसारी, जिस घर में रहता है, जिनके साथ रहता है, वो उनके प्रति भी स्वार्थ से ही भरा होता है, और कोई ज़िम्मेदारी नहीं जानता।
भले ही बाहर-बाहर ज़िम्मेदारी निभा रहा हो, कि रुपया दे दिया, पैसा दे दिया। पर सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी तो प्रेम होती है।
प्रेम नहीं होगा उसके पास। प्रेम नहीं होगा, समझ नहीं होगी।

12.

जब आपके पास बोध ही नहीं, तो आप अपने बच्चों के प्रति ज़िम्मेदारी निभा दोगे?
नासमझ हो, तो आप अपने बच्चों को क्या दे दोगे।

13.

जिस व्यक्ति का मन अभी प्रकाशित नहीं हुआ, उससे तुम शादी कर भी लोगी, तो और दुःख झेलोगी।
और जिसका मन प्रकाशित है, उससे शादी चाहे करो, चाहे नहीं करो, वो तुम्हारे प्रति प्रेमपूर्ण रहेगा, और अपनी वास्तविक ज़िम्मेदारी जानेगा भी, और निभायेगा भी।

14.

रिश्ता उससे बनाने की कोशिश मत करो जो झटपट शादी के लिये तैयार हो।
रिश्ता उससे बनाने की कोशिश करो, जिसके मन में प्रेम हो, प्रकाश हो।

15.

शादीशुदा पति भी कोई ज़िम्मेदारी नहीं निभाने वाला। लेकिन आध्यात्मिक रूप से जागृत है अगर तुम्हारा साथी, तो बिना शादी के ही तुम्हारे साथ बहुत दूर तक जायेगा। सैंकड़ों करोड़ शादीशुदा जोड़े हैं दुनिया में। ये कौन-सी ज़िम्मेदारियाँ निभा रहे हैं एक दूसरे के लिये भाई? देख लो ये दुनिया कैसी है।
तुम्हें लगता है ये ज़िम्मेदार लोगों की करतूत है?

16.

ज़िम्मेदारी का वास्तविक अर्थ होता है – धर्म।
और धर्म का ताल्लुक होता है, सत्य से।

17.

‘लत’ ऐसी है कि एक घोड़े पर बैठ गए हो, और बेहद कमज़ोर आदमी हो। और घोड़ा है बलशाली और ज़िद्दी। और घोड़े को जहाँ तुम्हें ले जाना है, ले जा रहा है।
कोई दूर से देखेगा अनाड़ी, तो कहेगा, “ये जनाब घोड़े पर बैठकर जा रहे हैं”। कोई दूर से देखेगा, अनाड़ी होगा, समझ नहीं रहा होगा, तो उसे लगेगा कि आप घोड़े पर बैठकर जा रहे हैं।
हक़ीक़त क्या है? आप कहीं बैठ इत्यादि कर नहीं जा रहे, घोड़ा करीब-करीब आपको घसीटता हुआ, जहाँ चाहता है, वहाँ ले जा रहा है।
ये ‘लत’ है।

‘लत’ में ‘आप’ हैं ही नहीं। आप कमज़ोर हैं।

18.

‘लत’ माने – घोड़ा। वो आपको जहाँ चाह रही है, ले जा रही है। आप कमज़ोर हैं। आपके कोई सामर्थ्य ही नहीं है कि आप घोड़े को रोक सकें, या उतर सकें, या घोड़े को दिशा दे सकें।
ये ‘लत’ है – आदत।
आदत में ‘आदत’ प्रबल होती है, आप दुर्बल होते हो।

19.

‘वरीयता’ में वरण करने वाला, सबल होता है।
उसको चढ़ने का भी अधिकार होता है, और उतरने का भी अधिकार होता है।

20.

लत में न तुम्हें चढ़ने का अधिकार था, न उतरने का अधिकार है। न अपने घोड़े को, जो अब तुम्हारा घोड़ा है ही नहीं।
वो स्वच्छंद उन्मुक्त घोड़ा है, वो अपनी मर्ज़ी का घोड़ा है। न तुम्हें उस घोड़े को लगाम देने का कोई अधिकार होता है।

‘वरीयता’ में ‘तुम’ होते हो, चुनाव करने के लिये, वरण करने के लिये। ‘लत’ में ‘तुम’ होते ही नहीं।

21.

हमें ये प्रदर्शित करते बड़ा सुख मिलता है कि हम लत के गुलाम नहीं हैं, हम ‘लत’ का चयन कर रहे हैं।
“मैं दफ़्तर जा रहा हूँ”, वास्तव में ये कहने का अधिकार तुम्हारे पास सिर्फ़ तभी है, जब किसी भी पल दफ़्तर न जाने का विकल्प तुम्हें उपलब्ध हो।
जिसमें ये हिम्मत हो कि किसी भी पल कह देगा, “अब नहीं जाना”, सिर्फ़ उसे ही ये कहने का हक़ है कि – “जा रहा हूँ”।

22.

जो काम करना तुम्हारी विवशता हो, तुम उस काम के कर्ता कैसे हो गये? विवशता में करे काम का भी तुमने कर्त्तत्व श्रेय ले लिया। वहाँ भी तुमने कह दिया, “मैं कर्ता हूँ”।
काम हो रहा है मजबूरी में।

23.

नहीं, अगर कोई ये कह रहा है कि – “मैंने ये नहीं किया, कोई मुझसे करवा रहा है” – तो वो ठीक ही बोल रहा है। लेकिन वो कर्मफल का श्रेय भी न माँगे।
क्योंकि जो ये साफ़-साफ़ कह दे कि – “मैं करता नहीं हूँ” अब वो भोक्ता भी नहीं हो सकता।

24.

अगर ‘कर्ता’ नहीं हो, तो सदा नहीं हो। अगर ‘कर्ता’ हो, तो सदा हो।
फिर कड़वा फल आये, या मीठा फल आये, दोनों भुगतने के लिये तैयार रहो।
घपला नहीं चलेगा – कभी ‘हाँ’, कभी ‘न’।

25.

हर वो चीज़, जो तुमको तुम्हारे नियमित जगत से आगे की याद दिलाती हो, उपयोगी है।

26.

मन का बड़ा स्वार्थ है ये मानने में, कि जो दुनिया उसने अपने लिये रच ली है, वो दुनिया ही सत्य है।
आवश्यक होता है मन को निरंतर यह अहसास देते रहना, ज़रा चोट देते रहना कि – तुम्हारी दुनिया से आगे भी एक दुनिया है, और न सिर्फ़ तुम्हारी दुनिया से अलग है, बल्कि तुम्हारी दुनिया से ऊँची है, श्रेष्ठ है।

29.

निराकार ब्रह्म को कोई फ़र्क नहीं पड़ता। पर अध्यात्म इसीलिये थोड़े ही है कि निराकार ब्रह्म को कोई फ़र्क पड़े। अध्यात्म तो इसीलिये है ताकि तुम्हारा भला हो।
और तुम्हारी भलाई इसी में है कि – तुम अपनी दुनिया से आगे भी किसी को ख़ास मानो।
और अगर ख़ास मानोगे, तो उसके साथ ख़ास व्यवहार भी करोगे।
उस ख़ास व्यवहार में वस्त्र भी समाहित हैं। वस्त्रों का भी ख़याल रखना पड़ता है।

30.

वस्त्रों का अपने आप में कोई महत्त्व नहीं है।
लेकिन वस्त्र तुम्हें याद दिलाते हैं, कि जो करने जा रहे हो, वो महत्त्वपूर्ण है।
कभी वो वस्त्र गेरुए होते हैं, कभी काले होते हैं, कभी श्वेत होते हैं।
और सब प्रकार के रंगों का अपना महत्त्व होता है।

31.

हर रंग एक सन्देश होता है, हर रंग अपने पीछे एक कहानी रखता है। वो सन्देश आवश्यक है।
और वो सन्देश तुम्हें याद रह जाये, इसके लिये वो वस्त्र आवश्यक है।
जब तुम ऐसे हो जाओ, कि सुरति अहर्निश चलती रहे, सत्य की याद निरंतर बनी ही रहे, तब फिर किसी वस्त्र आदि के सहारे की ज़रुरत नहीं है।
पर जब तक वैसे नहीं हुए हो, तब तक प्रतीकों की, सहारों की, नियमों की आवश्यकता है, और उनका पालन भी किया जाना चाहिये।

32.

तात्विक दृष्टि से देखो, तो जब द्वैत ही नहीं, तो फिर गुरु कौन, और शिष्य कौन। खेल है बस। एक प्रकार का झूठ है।
लेकिन जब तुम ऐसे हो जाओ, कि अद्वैत में अडिग स्थापित हो गये, अब तुम्हें कहीं ‘दो’ दिखते ही नहीं, अब तुम्हें अपने में और सामने वाले पेड़ में अंतर नज़र आता ही नहीं,
तब तुम ऐसे भी हो जाना, कि अब हम न शिष्य हैं, न गुरु हैं।
पर जब तक ऐसे नहीं हुए हो, तब तक आवश्यक है कि शिष्य धर्म का पालन करो।

और उसमें भी वस्त्रों का महत्त्व है।

33.

सिखाने वालों ने सिखाया है कि गुरु के सामने, कुछ भी पहनकर नहीं पहुँच जाते। देखते ही होंगे, कि चाहे मंदिर हो, चाहे मज़ार हो, चाहे गुरुद्वारे, कहा जाता है कि अपना परिधान ज़रा शालीन रखो।
अक्सर ज़ोर दिया जाता है कि सिर को ढककर आओ।

34.

कुछ तुम्हें याद दिलाया जाता है। अन्यथा सिर ढकने में वास्तव में कोई कीमत नहीं है। किसके सामने सिर ढक रहे हो – ‘उसी’ के सामने जिसने सिर दिया है? क्या करोगे पर्दा करके? बाल भी ‘उसी’ के हैं, और खाल भी ‘उसी’ की है। ‘उससे’ क्या पर्दा करना है। और ‘उसके’ सामने क्या पर्दा किया जा सकता है? नहीं किया जा सकता।

पर ये बात तात्विक हो गयी। ये बात आख़िरी हो गयी। तुम्हारे लिये ये अभी ज़रूरी है कि ये तुम्हें याद रहे कि जिसके सामने तुम जा रहे हो, वो अति-विशेष है।

35.

जा रहे हो, तो दान भी देना। जा रहे हो, तो मन को कुत्सित विचारों से मुक्त रखना। जा रहे हो, तो तन की स्वच्छता रखना। तन, मन, धन – सब ठीक रखना। ‘उसके’ सामने जा रहे हो। क्योंकि ‘वो’ ख़ास है, क्योंकि ‘वो’ किसी और दुनिया का है।

और अगर तुमने उसका सम्मान नहीं किया, तो तुमने अपनेआप को ये सन्देश दे दिया, कि दूसरी दुनिया या तो है नहीं, या अगर है भी, तो ख़ास नहीं है। और अगर दुनिया दूसरी है नहीं, और अगर है भी, तो ख़ास नहीं, तो फिर तुम दूसरी दुनिया तक पहुँचोगे कैसे?

फिर तो तुम इसी दुनिया में फँसकर रह जाओगे न?

36.

तुम्हारे भीतर भवसागर पार करने की प्रेरणा उठे, इसके लिये आवश्यक है न कि उस दूसरे किनारे की महिमा का भी तो तुम्हें कुछ पता हो।

तुम इस किनारे से, उस किनारे पहुँच सको, उसके लिये आवश्यक है न कि इस किनारे के प्रति तुममें कुछ प्रेम हो, कुछ सम्मान हो।

37.

साधना में कुछ नियम-क़ायदे होते हैं, ताकि तुम्हें ये बारबार-बारबार याद दिलाया जा सके कि वो जो दूसरा किनारा है, उसकी महिमा न्यारी है। क्या गौरव है उसका! ताकि तुम्हें आकर्षित किया जा सके। ताकि तुम्हारा सिर झुका रहे, और तुम उस दूसरे को, अपने से ऊपर मानते रहो।

अपने से ऊपर मानोगे, तभी तो उस तक पहुँचना चाहोगे न !

38.

प्रकृति ने सबको कुछ-न-कुछ दिया है थोड़ा अलग-अलग दिया है। किसी को संयम दिया है, किसी को क्रोध दिया है। किसी को बुद्धि दी है, किसी को स्मृति दी है। किसी को ये, किसी को वो। किसी को धन दिया है, किसी को निर्धनता दी है। जिसको जो कुछ भी मिला है, वो उसी का उपयोग करे, अपने लक्ष्य के प्रति।

39.

अधिकाँश लोग क्रोध करते हैं, जब उनके निजी स्वार्थ पर चोट पड़ती है। और एक क्रोध वो भी होता है, जो श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में दर्शाया था। रथ का चक्का उठाकर भीष्म की ओर दौड़ पड़े थे। वो भी क्रोध ही था।

40.

तो कहाँ से आ रहा है तुम्हारा क्रोध – स्वयं की रक्षा के लिये आ रहा है, या धर्म की रक्षा के लिये आ रहा है?
और धर्म की तुमने परिभाषा क्या बना ली  है?
धर्म माने – अपनी धारणाओं और अपने स्वार्थों की परिपूर्ति?
या, धर्म माने – अहम का विसर्जन?

41.

अभी आपकी समस्या ये नहीं है कि आपको स्पष्टता नहीं है। आपको बुरा तब लगता है, जब कोई प्रश्न करता है, और आप कोई जवाब नहीं दे पातीं। मतलब कि आप महत्त्व देती हैं, दूसरे व्यक्ति को। मतलब कि आप महत्त्व देती हैं दूसरे व्यक्ति को, समझाने को।

जब आप जो कर रही हैं, पढ़ रही हैं, उससे प्रेम ही हो जाता है, तो सारा महत्त्व उस करने को, और पढ़ने को, दे दिया जाता है। अब दूसरे को समझा पाये, तो ठीक। नहीं समझा पाये, तो ठीक। वैसे तो बात बहुत समझाने-बुझाने की होती नहीं है।

कौन किसको समझा सकता है कि उसको प्रेम क्यों है? कैसे समझाओगे?

42.

तो कमी क्लैरिटी, स्पष्टता की नहीं है, कमी प्रेम की है।
प्रेम बढ़ाईये, ये दाएँ-बाएँ वाले सभी, खुद ही विलुप्त हो जायेंगे।

43.

शरीर भी संसाधन है, धन भी संसाधन है, समय भी संसाधन है, वस्त्र भी संसाधन हैं। भोजन भी संसाधन है। ‘संसाधन’ माने – वो जिसका उपयोग किया जाये। किसी लक्ष्य की प्राप्ति हेतु आप जिसका उपयोग कर सको, वो ‘संसाधन’ है।

आपने इन्हीं तीन-चार चीज़ों की बात की है। भोजन – संसाधन है न, जिससे ऊर्जा मिलती है। वस्त्र खरीदती हैं, तो धन से खरीदती होंगी । तो वस्त्र क्या है? संसाधन। कपड़ा भी संसाधन है। उसको पहन करके, किसी काम के लिये तैयार हो पाते हो। समय भी संसाधन है, चाहे खाने-पीने की तैयारी करो, और चाहे कपड़ों की ख़रीददारी करो, समय तो उसमें लगता है।

प्रश्न यह है कि –  इन संसाधनों का प्रयोग, किसकी सेवा में कर रही हैं? इन संसाधनों का प्रयोग, किसकी सेवा में कर रहीं हैं ? संसाधन लग रहे हैं, ये बात अधूरी है। प्रश्न ये है कि – किसके लिये लग रहे हैं?

गौर करियेगा ।

44.

गुरु गुण लिखने के लिये, अगर सबकुछ भी तुम दाँव पर लगा दे रहे हो, सबकुछ फूँक डाला, तो भी कोई बात नहीं। तो बात ये नहीं है कि – फूँका या नहीं फूँका ? बात ये है कि – क्यों फूँका, किसके लिये फूँका?

45.

सही दिशा मिल गयी हो, औचित्य मिल गया हो, लक्ष्य मिल गया हो, तो सब फूँक दो।
कुछ बचाकर मत रखना।

46.

कपड़े पहनने में कोई बुराई नहीं, कपड़ों पर ख़र्च करने में कोई बुराई नहीं। अगर कपड़ों पर ख़र्च करके तुमको शांति मिल जाती हो, तो मैं कहता हूँ, अपना आख़िरी रुपया भी कपड़ों पर खर्च कर डालो।

अगर उससे ……..शांति मिलती हो।

47.

रुपया क्या? संसाधन ही तो है। और सारे संसाधन किसलिये? शांति के लिये। वरना क्या रुपया बाँधकर मरोगे? मृत्यु का तो मतलब ही यही है कि – समय भी ख़र्च हो जाना है, और रुपया साथ नहीं जाना है। तो ये सब इसीलिये हैं न कि इनका सदुपयोग हो सके। और एक ही सदुपयोग होता है।

क्या?

शांति मिल जाये, सत्य मिल जाये।  मुक्त हो जायें।

48.

तुम जहाँ भी समय लगा रहे हो, चलो लगा दो। बढ़िया लगाया। हम तो बस एक ही सवाल पूछेंगे, “वो समय जहाँ लगाया, उससे शांति मिली या नहीं मिली?

49.

शांति इतना बड़ा लक्ष्य है, फिर उसके सामने सारे संसाधन छोटे हैं। ये बात तुम्हें सुनने में अजीब लगेगी।  पर इस पूरे ब्रह्मांड को फूँककरके अगर एक व्यक्ति भी, वास्तव में तरता हो, तो फुँक जाये ये ब्रह्मांड। कोई हैसियत नहीं इसकी।

50.

न कुछ अच्छा है, न कुछ बुरा है।
मुक्ति अच्छी है, बाकि सब बुरा है।
जो कुछ मुक्ति की ओर ले जाता हो, वो बुरा हो नहीं सकता।
और वो अच्छी-से-अच्छी चीज़, जो तुम्हें मुक्ति न देती हो, बताओ वो अच्छी कैसे हुई?

51.

आध्यात्मिक मन भी कहीं पर पैसे लगाता है, क्योंकि संसाधन तो देह के यही सब होते हैं न – तन, मन, धन, समय।   आध्यात्मिक आदमी भी कहीं न कहीं इनका निवेश करता है। पर वो जहाँ निवेश करता है, वहाँ से बदला क्या आता है, ब्याज़ क्या आता है, ये वो किसी को समझा नहीं सकता।

52.

व्यापारी दुकान पर बैठेगा, साफ़ दिखायी देगा कि छः घंटे दुकान पर बैठे, इतना लाभ हुआ। और भक्त भजन पे बैठेगा, तो वो तुम्हें समझा नहीं पायेगा, कि छः घंटे भजन में लगाये, तो लाभ क्या हुआ। लाभ, वो जानता है, क्या हुआ। और कौन जाने, उसे व्यापारी से ज़्यादा लाभ हुआ हो।

53.

ऐसा धन रखो, जो चिता के पार ले जा सको। व्यापारी का धन, चिता के पार नहीं जाने वाला। जो भज रहा है, वो समय के ही पार चला जाता है, उसके लिये कौन-सी चिता बची।

तुम धन कमाते हो ताकि तुम फँसे रह जाओ। और हम अपने आप को ख़र्चते हैं, ताकि हम आज़ाद हो जाएँ। अपनी तुम जानो, हम अपनी जानते हैं।

54.

ये दोनों साथ-साथ चलते हैं।
स्वयं को जाने बिना, दूसरे को नहीं जा सकता।
जो दूसरे को जान रहा है, वो ‘आत्मज्ञानी’ ही होगा।

55.

दूसरे को जान पाने, देख पाने, समझ पाने में हमसे इसीलिये भूल हो जाती है न, क्योंकि हमें खुद का ही कुछ पता नहीं। दूसरे को देख पाने की यदि हममें योग्यता होती, तो हमने उसी योग्यता का उपयोग करके, पहले खुद को ही न देख लिया होता।

56.

मूलतः हम सब एक हैं। हैं न? तो दूसरे को जानना है, तो खुद को जान लो। अपने क्रोध को, अपने सुख को, दुःख को, आशा को, निराशा को। अगर तुम जान पाये, तो दूसरे को जानना मुश्किल नहीं। वो भी बिलकुल तुम्हारे ही जैसा है। ऊपर-ऊपर कुछ बातें अलग होती  हैं। शरीर अलग होते हैं, अनुभव अलग होते हैं। नाम अलग होते हैं, रंग अलग होते हैं। उम्र अलग होती है, वर्ण अलग होते हैं।

ये सब ऊपरी अंतर है।

जितना गहरे जाते जाओगे, उतना पाओगे कि भेद कम होते जा रहे हैं, और साझापन गहरा होता जा रहा है।

और अगर एकदम ही गहरे उतर गये, तो पूर्ण अभेद है वहाँ।

57.

किसी के घर में कुछ नहीं चल रहा, जो किसी और के घर की घटनाओं से भिन्न हो
किसी की पीड़ा, दूसरे की पीड़ा से भिन्न नहीं है।
मनुष्य तो मनुष्य, पशुओं की भी पीड़ा वही है, जो ऊँचे-से-ऊँचे मनुष्य की है।
जब ये तुम समझते हो, तो इसे ‘बोध’ कहते हैं।
इसी का फल करुणा है, इसी का फल अहिंसा है।

58.

बीमारी जब तक छुपी है, तब तक चैन है। इधर -उधर थोड़ा दर्द हो रहा होगा। पर अभी तक ज्ञान नहीं हुआ, कि तन में गहरी बीमारी आकर बैठ गयी है। और जिस दिन बीमारी का पता चलता है, रिपोर्ट आती है, उस दिन तोते उड़ जाते हैं, जैसे की रिपोर्ट ने बीमार कर दिया हो। जैसे की रिपोर्ट अपने ऊपर बीमारी बैठाकर लायी हो।

लेकिन गन्दगी का ज्ञान होना, बीमारी का ज्ञान होना, शुभ है।

बुरा लगता है, लेकिन शुभ है।

59.

बीमारी का उद्घाटित होना, बीमारी के इलाज की शुरुआत है।

60.

जो जितना आपको, आपके दोषों से, आपकी रुग्णता से परिचित कराये, उसको उतना धन्यवाद दें।
और धन्यवाद के साथ, हो सके, तो कुछ दाम भी दे दें।

61.

यही रवैया जीवन में रखियेगा।
खीजियेगा मत।
खीज उठेगी, पर आप खीजियेगा मत।
जितना पता चले अपने दोषों को, उतना सौभाग्य मानियेगा।

62.

जैसे -जैसे पता चलता रहे, कि मन में घूम ही वही चीज़ें रही हैं, जो व्यर्थ हैं, वैसे-वैसे जानती रहिये कि अब इलाज का कार्यक्रम तैयार हो रहा है।

लम्बी लड़ाई है, लड़नी है।

63.

मैं कौन हूँ, ये तुमपर निर्भर करता है।
तुम मुझमें जो पाना चाहोगे, वही देखोगे।

64.

तुम्हारी नज़र निर्धारित करती है – मैं कौन हूँ। और अगर तुम्हें पार जाना है, भवसागर लाँघना है – तो दोस्त हूँ मैं तुम्हारा। जैसे मेरा इस्तेमाल करना चाहो, कर लो। ये पक्का है, तुम से भिन्न मैं कुछ भी हो नहीं सकता – ये मेरी मजबूरी है।

तुम जो नहीं हो, वो मैं हो नहीं सकता। और तुम बदलकर देखो, मैं तत्काल बदल जाऊँगा।

इतने लोग अभी यहाँ बैठे हैं, तुम्हें क्या लगता है – सब एक ही बात सुन रहे हैं? तुम वो सुन रहे हो, जो तुम हो। तुम मुझमें वो देख रहे हो, जो तुम हो।

65.

तुम जो हो, वो निर्धारित करता है कि – मैं कौन हूँ।
तुम तय करोगे मैं कब, क्या हूँ।

66.

मन यदि विर्विकल्प हो ही गया, तो अब किसी होश की ज़रुरत नहीं है। अब तो खेल ही ख़त्म। निर्विकल्पता ही उच्चतम समाधि है।

अपना अवलोकन जब भी करोगे, तो यही दिखाई देगा कि – ‘मैं’ तो बिना इससे जुड़े, या इससे जुड़े, रह ही नहीं सकता। ‘अहम’ अकेलापन बर्दाश्त नहीं कर सकता।

67.

जीव होने का अर्थ ही है – चुनाव। क्योंकि पहला चुनाव ही है – जीव होना। तुमने चुना न होता, तो तुम जीव क्यों होते।

68.

आत्म-अवलोकन करोगे तो दिखाई देगा कि मन संकल्पों-विकल्पों से निरंतर भरा हुआ है। और उन संकल्पों-विकल्पों के सामने तुम्हें अपनी शक्तिहीनता दिखाई देगी।

“मैं कितनी भी कोशिश कर लूँ, विकल्पों के पार नहीं जा पाता”। और फिर आता है समर्पण। “मैं कितनी भी कोशिश कर लूँ, मैं गाड़ी ठीक चला ही नहीं सकता, क्योंकि मेरा तो कभी इधर जाने का मन करता है, और कभी उधर जाने का मन करता है। कभी ये विकल्प अच्छा लगता है, कभी वो विकल्प बुलाता है। तो गाड़ी अगर सीधी चलानी है, तो वास्तव में किसी और के हाथ में सौंप देनी होगी।

69.

जिस अवेयरनेस(होश) की बात कृष्णमूर्ति कह रहे हैं, वो निजी नहीं है, वो व्यक्तिगत नहीं है, वो तुम्हारी नहीं है। तुम्हारा तो काम है ये देखना कि जब तक तुम ‘तुम’ हो, तुम सविकल्प चेतना में ही कैद हो। और चेतना, अवेयरनेस नहीं होती। कृष्णमूर्ति साहब की भाषा में कहें तो, ‘चेतना’ कॉन्शियसनेस है, और ‘बोध’ अवेयरनेस है।

70.

हम चेतना में जीते हैं, बोध में नहीं।
हम कॉन्शियसनेस में जीते हैं, अवेयरनेस में नहीं ।
इसीलिये हम चॉइस-फुलनेस((सविकल्पता) में जीते हैं, चॉइस-लेस्सनेस(निर्विकल्पता) में नहीं।
सविकल्पता से निर्विकल्पता में जाने का तरीका है – समर्पण।

71.

अपनी हालत को देखा और कहा, “हम तो ऐसे ही हैं, और इससे बेहतर हम स्वयं तो नहीं हो पायेंगे। तो कोशिश ही छोड़ते हैं, खुद कुछ बड़ा कर जाने की”। कोशिश के इस परित्याग का नाम ही – ‘सरेंडर’ भी है , ‘समर्पण’ भी है, ‘बोध’ भी है, ‘अवेयरनेस’ भी है।

लेकिन उस परित्याग के लिये, सबसे पहले ईमानदारी से, और कड़ाई से, और साधनापूर्वक तुमको ये देखना होगा कि तुम्हारा बड़े-से बड़ा, कड़े-से-कड़ा, महत-से-महत श्रम भी अपर्याप्त है। कि तुम कितनी भी कोशिश कर लो, तुम स्वयं निर्विकल्प होने की, तुम हो नहीं पा रहे।

तुम कितनी भी कोशिश कर लो स्वयं को सुधारने की, तुम एक सीमा पर जाकर अटक ही जाते हो। तुम एक सीमा पर जाकर अटक जाते हो, इसका अहसास तुम्हें तभी होगा, जब तुमने उस सीमा को लाँघने की सबसे पहले पूरी कोशिश की होगी।

72.

आदमी कितना हारा हुआ है, ये उसे ही पता चलता है, जिसने जीतने की पूरी कोशिश कर ली है।

जो जीतने की कोशिश ही नहीं कर रहा, जो साधना ही नहीं कर रहा, उसको सबसे बड़ा नुकसान यही होता है कि वो आजीवन इसी भ्रम में जीता है कि – “साहब अभी हमने कोशिश ही नहीं की है। जिस दिन हम मैदान में उतरेंगे, मैदान हमारा है”।

मैदान में उतरो न।

मैदान में उतरोगे, तभी तो अपनी गहरी शिकस्त का अहसास होगा।

73.

जब तक तुम ‘अहम’ बने बैठे हो, तब तक तुम सदा कुछ चुनोगे। क्या चुनोगे? जिसमें तुम्हें लगता है कि तुम्हारा हित है। तो चुनाव तो हो गया न।  हर जीव कुछ-न-कुछ ऐसा चुन रहा है, न जिसमें उसे लगता है उसका हित है, भलाई है? अब कहाँ से लाओगे ‘निर्विकल्पता’?

74.

‘हकलाना’ इतनी बड़ी बात, है ही क्यों? हकलाते हो, तो हकलाते हो। क्या हो गया? अष्टावक्र आठ जगह से टेढ़े थे, क्या हो गया? हकला नहीं भी रहे हो, तो उससे भला कौन-सा लाभ मिल जाना है? दुनिया की निन्यानवे प्रतिशत लोग शायद नहीं हकलाते, तो? ये मुद्दा ही छोटा है।

इस मुद्दे की अवहेलना करना सीखो।

75.

जैसा साजो-सामान मिला है, उसको लिये-लिये वैसा ही, मंज़िल की ओर, आगे बढ़ो। हकलाकर बोल रहे हो या नहीं, ये बात महत्त्व की नहीं है। जो बोल रहे हो, बात में दम होना चाहिये। बहुत लोग हैं, जो धाराप्रवाह बोलते हैं। लेकिन क्या बोलते हैं धाराप्रवाह? बकवास। व्यर्थ, गन्दगी।

76.

जीवन को एक सार्थक लक्ष्य दो।
बोलने लायक हो कुछ, तो ही बोलो। नहीं तो मौन, बहुत सुन्दर है।
और जब बोलो, तुम हमने कहा, शब्दों में दम होना चाहिये, वज़न होना चाहिये।

77.

हकलाने को, या इस प्रकार के किसी भी शारीरिक दोष को, बहुत महत्त्वपूर्ण मत बना लो।
जीवन का केंद्र ही मत बना लो।

78.

इससे पहले कि तुम्हें किसी दूसरे के सहारा न लेना पड़े, तुम्हें जो सही है, उसका सहारा लेना पड़ेगा।

79.

पहली बात तो ये कि हमें किसी का सहारा लेना पड़ता है। और दूसरी बात ये कि हम ऐसों का सहारा ले रहे हैं जो हमसे भी गये गुज़रे हैं। तो कौन-सा सहारा मिल जायेगा भई? तो इसीलिये तुम्हें दो चरणों में अपनी स्थिति से बाहर आना पड़ेगा।

80.

तो पहला चरण है – विवेक। जिनसे सहारा ले रही हो, गौर से देखो कि वो सहारा देने लायक भी हैं या तुम्हारे ही जैसे, या तुमसे भी बदतर हैं।

उचित सहारा ढूँढो।

81.

उचित सहारा कौन-सा है?
उचित सहारा वो होता है, जो शनैः शनैः तुम्हें ऐसा बना दे, कि तुम्हें फिर किसी सहारे की आवश्यकता न रहे।

82.

अनुचित, गड़बड़, सहारा कौन-सा होता है? जो लत बन जाये।

सिगरेट भी एक सहारा ही होती है। लत बन जाती है। तमाम प्रकार के रिश्ते, मनोरंजन, ये भी एक सहारा ही होते हैं। ये लत बन जाते हैं। और ये लत ऐसी बनते हैं कि पहले पाँच सिगरेट से सहारा मिल जाता था, अब पचास चाहिये, रोज़ाना।

83.

झूठे सहारों की यही पहचान है। वो तुम्हें और पंगु, और दुर्बल कर देते हैं।
वो तुम्हारे लिये और आवश्यक कर देते हैं तुम सहारे पर ही आश्रित रहो।
और सच्चे सहारे की पहचान ये है कि वो तुम्हें सम्हालता है, और धीरे-धीरे अपने आप को अनावश्यक बना देता है।
वो तुम्हें कभी अपनी लत नहीं लगने देता।

84.

अपनी ओर से तुम यही चाहोगे कि जो सच्चा सहारा हो, उसको भी पकड़ ही लो। और सच्चे सहारे का गुण यही है – तुम जितना भी चाहो, वो तुम्हारा अहित नहीं होने देगा। और तुम्हारा अहित इसी में होता है कि – तुम्हें सहारे की लत लग गयी।

85.

पहला चरण – सही सहारा पकड़ो।
दूसरा चरण – सहारा अगर सही पकड़ा होगा, तो फिर किसी भी सहारे की ज़रुरत नहीं पड़ेगी।

86.

हर चीज़ से मुक्ति मिल जाती है इस संसार में। बस होता ये है कि इंसान एक तरह की शराब छोड़कर, दूसरे तरह की शराब पीने लग जाता है। तो शराब से मुक्ति चाहिये, तो मिल जायेगी। ‘मुक्ति’ चाहिये क्या? ये दोनों बहुत अलग-अलग बातें हैं।

87.

‘मुक्ति’ मात्र अलग बात है। शराब से मुक्ति एक चीज़ है, और ‘मुक्ति’ मात्र अलग चीज़ है।
‘मुक्ति’ मात्र क्या है? ‘मुक्ति’ मात्र है – उसपर हँसने लग जाना, जो शराब माँगता है।

88.

‘मुक्ति’ तब है, जब ‘उसके’ बचकाने पन को, ‘उसकी’ व्यर्थता को, देख लो।
‘उसका’ पक्ष लेना छोड़ दो, ‘उसे’ गंभीरता से लेना छोड़ दो।
‘उसकी’ उपेक्षा करने लग जाओ।
कौन है ‘वो’ जिसकी हम बात कर रहे हैं?
वो, वो है, जिसे हम ‘मैं’ बोलते हैं।

89.

अभी-भी शराब को छोड़ना चाहते हो, शराब के प्रति तिरस्कार के, और क्रोध के, और अपमान के भाव से भरे हुए हो – “शराब गन्दी चीज़ है, शराब छोड़ दो”। पर ये जो छोड़ने का भाव है, इसके प्रति बड़ी गंभीरता है, बड़ा सम्मान है।  ‘मैं’ शराब छोड़ना चाहता हूँ” –  शराब बुरी है, ‘मैं’ अच्छा है।

ऐसे नहीं चलेगा।

ये जो इकाई है, ये जो ‘मैं’ है, ये जो इरादा कर रहा है शराब छोड़ने का, इसके इस नेक इरादे में भी बदनियती छुपी हुई है। इस पर हँसना सीखो। क्योंकि ये, कह तो रहा है कि शराब छोड़नी है, और ये, ये नहीं कह रहा, वो बात यह है कि – कुछ और पकड़ लेना है। इसके साथ आगे मत बढ़ो।

90.

अभी इसकी बात बड़ी भली, बड़ी उपयोगी लग रही है, क्योंकि बात ही ऐसी साफ़-सुथरी है कि – शराब छोड़नी है। उसे कहो, “न। तेरा तो काम ही यही है – एक कुँए से यदि निकालना, तो दूसरे कुएँ में डालने के लिये। तू छूट गया, तो दुनिया की सब शराबें छूट जायेंगी। और तू रह भी आया, तो शराब छोड़ने से कोई फायदा नहीं। कोई ज़्यादा घातक शराब फिर पकड़ लेगा तू। शराब नहीं छोड़ूँगा, तुझे छोड़ूँगा”। ‘उसको’ छोड़ो।

91.

कैसे छोड़ते हैं ‘उसको’?
मैंने कहा, ‘उसकी’ अवहेलना करके, ‘उसका’ समर्थन न करके।
धिक्कारोगे नहीं ‘उसे’।
‘उसे’ चुटकुला समझकर, हँसो उसपर।
फिर ‘वो’ छूट जायेगा।

92.

परेशानियों में अगर उलझना ही है, तो ज़रा ऊँची परेशानियाँ आमंत्रित करो।
बड़ी चुनौतियाँ उठाओ न।
ये लड़का-लड़की के खेल तो पशु भी खेल रहे हैं।
इंसान का जन्म यही करने के लिये थोड़े ही मिला है।
आगे बढ़ो!

93.

अचरज होता है मुझे जब लोग योग, ध्यान, भक्ति आदि की आरंभिक अवस्थाओं में जो मानसिक अनुभव होते हैं, उन्हीं पर अटक कर रह जाते हैं। ये वैसी ही बात है कि कोई रुद्रप्रयाग जाने के लिये चला है, और रुड़की में ही बैठ गया। ये ऐसी ही बात है कि कोई मसूरी के लिये निकला है, वो देहरादून से पहले ही, बैठ गया।

94.

सच्चे साधक के लिये, ये सुखद अनुभव प्रेरणा हैं दूनी गति से आगे बढ़ने के।
और जिसे आगे नहीं बढ़ना, उसके लिये ये जाल हैं।
वो रुक जायेगा।

वो कहेगा, “इतना ही काफी है। कौन जाये हिमशिखर पर? पहले जितना ताप था, मैदानों पर जितनी जलन थी, वो अपेक्षतया तो कम हो गयी न। थोड़ा सुकून मिला, इतना ही काफी है”।

95.

साधक और संसारी में यही अंतर होता है। संसारी को थोड़ा सुकून चाहिये। उसे पूर्ण-मुक्ति चाहिये ही नहीं। जब उसका दुःख बहुत बढ़ जाता है, तो वो कुछ समय के लिये अध्यात्म की शरण में जाता है कि – दुःख बढ़ गया है। थोड़ा-सा कम हो जाये। अपेक्षतया, रेलेटिवली, उसी थोड़ी शांति मिल जाये। और जैसे ही उसे थोड़ी-सी शांति मिलती है, वो फिर जाकर के संसार के कीचड़ में लोटने लगता है। उसे वास्तव में वो थोड़ी-सी शांति चाहिये ही इसीलिये है, ताकि वो तारो-ताज़ा होकर दोबारा भीड़ में, ताप में, जलन में लिप्त हो जाये।

96.

साधक का लक्ष्य ऊँचा होता है।
साधक ज़िद्दी होता है।
वो कहता है , “थोड़ा नहीं, पूरा चाहिये”।

97.

तो घूम फिरकर बात वहीं पर आ जाती है – हिमशिखर से प्रेम है क्या? अगर प्रेम होगा, तो रास्ते के सुख, और रास्ते के दुःख, दोनों आगे बढ़ने की ही प्रेरणा बनेंगे।  और अगर प्रेम नहीं होगा, तो रास्ते के सुख, और रास्ते के दुःख, दोनों वापस लौटने की ही कारण बनेंगे।

98.

तुम खेलो वो सर्वश्रेष्ठ कर सकने के लिये, जो तुम कर सकते हो।
और जो सर्वश्रेष्ठ तुम कर सकते हो, वो जीतने से ज़्यादा ऊपर की बात है।
जीत उसके सामने छोटी चीज़ है।
तुम अपना सर्वश्रेष्ठ करो, उसके बाद तुम जीते तो जीते, अगर हारे भी, तो वो हार एक तल पर जीत से बेहतर होगी।

99.

अगर सिर्फ तुम जीतने का उद्देश्य लेकर चल रहे हो, तो तुम्हारे दिमाग पर सामने वाला पक्ष ही हावी रहेगा। तुम यही देखते रहोगे कि दूसरा जैसा है, उससे बेहतर हो जाओ।

100.

दूसरे से होड़ मत करो, स्वयं से होड़ करो।
और फिर जो उन्नति होती है, फिर जो खिलाड़ी का खेल चमकता है, उसकी बात दूसरी होती है।
फिर जीत छोटी चीज़ हो जाती है।

उसके बाद मैंने कहा – हार में भी जीत होती है।

101.

हर व्यक्ति अच्छा होता है कि प्रतिद्वंदी और परिस्थियों को बहुत ज़्यादा ख़याल में न लेते हुए, लगातार अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करे। अगर आप कहेंगे कि सामने प्रतिद्वंदी थोड़ा हल्का है, इसीलिये उसके सामने आराम से खेला जा सकता है, अपने आप को बहुत खींचने की, अपने आप को बहुत परेशान करने की, बहुत पसीना बहाने की ज़रुरत नहीं है, तो ये आदत बन जायेगी।

इसीलिये, भले ही आपका मुकाबला सबसे कमज़ोर टीम से भी चाहे क्यों न हो, उसके सामने भी आपको अपने आप को पूरी तरह से चुनौती देते हुए, अपना शत-प्रतिशत ही देना चाहिये।

102.

उत्कृष्टता, जीने का एक तरीका होती है।

103.

आप ये नहीं कह सकते कि आप किन्हीं ख़ास मौकों पर, किन्हीं ख़ास मैचों में, एक्सीलेंस(उत्कृष्टता) दर्शायेंगे। और बाकी साधारण, आम अवसरों पर थोड़ा कमज़ोर टीमों के सामने आप औसत दर्जे का खेल दिखायेंगे। औसत दर्जे का खेल दिखाना, आपको लगता है कि आपका चुनाव है। और वो चुनाव आपको पता भी नहीं चलेगा, कब आपकी आदत, आपकी मजबूरी बन जायेगा।

104.

परिणाम की चिंता न करते हुए, प्रतिपक्षी की चिंता न करते हुए, जीवन के हर मैदान में, खिलाड़ी का धर्म है कि वो लगातार उत्कृष्टता की ही पूजा करे।

चाहे क्रिकेट का मैदान हो, चाहे जीवन का कोई भी क्षेत्र हो।

105.

साथ-ही-साथ ये भी कह रहे हो कि उन्होंने तुम्हारे लिये संघर्ष किया है। तुम्हें आत्मीयता दी है, संसाधन दिये हैं।

तो फिर तो रिश्ता प्रेम का होना चाहिये न।

गौर से देखो कि किस चीज़ ने तुम्हें वास्तव में बाँध रखा है। उससे स्वयं भी मुक्त हो, और माँ-बाप को भी मुक्त कराओ। यही प्रेम का तकाज़ा है। दोषारोपण करके बात नहीं बनेगी।

106.

सब बंधे हुए हैं, और सबको मुक्ति चाहिये।
मुक्ति मिलती इसीलिये नहीं है, क्योंकि हम अपने बंधनों को ही लेकर ईमानदार नहीं होते।
हम साफ़-साफ़ स्वीकारते ही नहीं हैं, कि बंधन वास्तव में क्या हैं, क्या नाम है उनका, क्या स्वरुप है।
जब हम बंधनों को लेकर ही स्वयं से झूठ बोलते रहते हैं, तो फिर हमें सच्चाई कहाँ से मिलेगी, मुक्ति कहाँ से मिलेगी।

107.

मैं चाहूँगा कि ध्यान से, सच्चाई से, अपनेआप से पूछो कि – क्या ‘माँ-बाप’ वास्तव में बंधन हैं? ‘बंधन’ की तरह मत देखो उनको। बंधन हैं तुम्हारे, पर वो बंधन दूसरे हैं।

108.

असली बंधनों को पहचानों, उन्हें काटो, और माँ-बाप की भी सहायता करो।
अगर उन्होंने दिया है तुम्हें कुछ, तो तुम भी उन्हें कुछ दो।
और किसी को अगर कुछ देना ही है, तो मुक्ति से बेहतर क्या हो सकता है।

109.

शैतान का घर, शैतान का घर होता है। ‘खाली दिमाग’ शैतान का घर नहीं होता। शैतान, शैतान के ही घर में प्रवेश करता है।  तुम्हारे घर में कौन आ रहा है, ये इस पर निर्भर करता है कि तुम कौन हो। तुम शैतान हो, तुम्हारे घर में शैतान आयेगा। तुम साधु हो, तुम्हारे घर में साधु आयेगा।

ये सब लोकोक्तियाँ हैं। इनके पीछे आवश्यक नहीं है कि बोध की गहरायी हो।

110.

मन के केंद्र पर कौन बैठा है, वो निर्धारित करता है कि मन की सामग्री कैसी होगी।
मन के केंद्र पर शैतान बैठा है, तो दुनिया भर के शैतानों को आमंत्रित करेगा वो।
मन के केंद्र पर साधु बैठा है, तो वहाँ साधुओं की भीड़ रहेगी।
तुम कौन हो? तुम जो हो, उसी अनुसार तुम्हारे मन में विचार चलेंगे।

111.

यहाँ बात खाली होने की, या भरे होने की नहीं है। यहाँ बात, केंद्र में कौन है, उसकी है। तुम क्या बने बैठे हो? ‘अहम’ की जो तुम्हारी परिभाषा होगी, मान्यता होगी, वो तुम्हारा संसार निर्धारित कर देगी।

112.

शैतान, शैतान के ही घर में आता है।

तुम्हारे मन में अगर शैतान घूम रहा है, तो शैतान को दोष मत दो। तुम शैतान हो, तब वो आया है। मजाल है शैतान की, कि साधु के घर में घुस जाये। और साधु को शैतान के घर से क्या लेना-देना? वो वहाँ नहीं घुसेगा।

113.

तुम जैसे हो, तुम अपने इर्द-गिर्द वैसा ही संसार रच लेते हो।

114.

साधु तो रमता है, क्योंकि इस धरती पर उसका घर नहीं हो सकता। यहाँ बस वो रमण-भ्रमण कर सकता है। घर तो उसका ‘वहाँ’ होना है। तो इसीलिये तुम सुनते हो न, “रमता जोगी”। वो रमता क्यों है? क्योंकि घर यहाँ क्या बनाना? घर तो ‘वहाँ’ है। तो साधु के घर में, साधुओं की भीड़ खड़ी भी हो गयी, तो क्या करेगी? वो सफ़ाई वगैरह करेगी, ठीक-ठाक करेगी, धूप-दिया करेगी, और रवाना हो जायेगी अपने असली घर की ओर।

115.

तो साधु का घर खाली रहेगा। न सिर्फ़ उसमें मेहमान नहीं रहेंगे, उसमें वो भी नहीं रहेगा, जिसका वो घर है। क्योंकि उसको भी ‘वहीं’ जाना है। ये होता है खाली दिमाग। वो संसार से भरा नहीं होता। पर खाली तुम्हारा दिमाग हो सके, उसके लिये आवश्यक है कि पहले तुम्हारा दिमाग साधुओं से भरे। साधु आयेंगे, तो तुम्हारे घर को खाली कर जायेंगे।

ऐसा नहीं कि कुछ लूट ले जायेंगे।

उन्हें टिकना नहीं है। वो चले जायेंगे।

116.

शैतान? शैतान वो है, जिसको इस दुनिया में ही अड्डा बनाना है। उसे यहीं रुकना है। उसे लगता है, यहीं सबकुछ है। शैतान आयेगा, वो अड्डा बनायेगा। वो चिपक जायेगा। जिसके दिमाग में शैतान है, जो स्वयं शैतान है, उसका दिमाग हमेशा भरा हुआ होगा।

117.

शैतान कहीं जाने वाला नहीं ।
उसे रुकना है, बैठना है।
साधु का काम है – आना, साफ़ करना, और रवाना हो जाना।

118.

संत भी – भीतर समाधिस्थ होता है, बाहर प्रकृतिस्थ होता है। उसे क्या विरोध है, हाथों से, कि कान से, कि दाढ़ी से, कि बाल से। बढ़ रहे हैं, तो बढ़ जाएँ। उसको चिकना बनकर थोड़े ही घूमना है। तुम बताओ – तुम्हें चिकना बनकर क्यों घूमना है? चिकना बनने की लालसा तो तुम्हारी है। तुम रोज़ सुबह-सुबह चेहरा घिसते हो। समय लगाते हो, श्रम करते हो। क्यों करते हो इतना श्रम?

119.

संत तो बस – जैसा है, वैसा है।
वो हाथी के कान जैसा है, वो शेर के मुँह जैसा है।
नदी जैसा है, पहाड़ जैसा है।

120.

ये संतत्व के अनिवार्य लक्षणों में नहीं है कि – कपड़ा ऐसा होगा, दाढ़ी ऐसी होगी, बाल ऐसे होंगे, बोलचाल ऐसी होगी। बाल बड़े भी हो सकते हैं, और सिर घुटा हुआ भी हो सकता है। या साधारण, जैसे बाकी लोग बाल कटाकर रखते हैं, वो वैसा भी हो सकता है।

ये कोई अनिवार्य बात नहीं है।

अनिवार्य तो एक ही होता है – जो अनिवार्य है।

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