प्रेम हो तो स्पष्टता आ जाती है || आचार्य प्रशांत (2019)

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प्रेम हो तो स्पष्टता आ जाती है

प्रश्न: आध्यात्मिक साधना की प्रक्रिया में, कई बार घरवालों के, मित्रजनों के कई प्रश्नों का सामना करना पड़ रहा है। मुझे पाँच वर्ष हो गये, पर अभी तक मुझमें इतनी स्पष्टता नहीं आयी है, कि मैं उनके प्रश्नों का उत्तर दे सकूँ।

आचार्य जी, कृपया आप इसमें मेरी मदद करें ।

आचार्य प्रशांत जी: स्पष्टता नहीं चाहिये, प्रेम चाहिये। जो कर रहे हो, अगर वो आपको दिलोजान से प्यारा हो, तो तकलीफ़ क्या होगी, किसी को नहीं भी समझा पाये तो?

अभी आपकी समस्या ये नहीं है कि आपको स्पष्टता नहीं है। आपको बुरा तब लगता है, जब कोई प्रश्न करता है, और आप कोई जवाब नहीं दे पातीं। मतलब कि आप महत्त्व देती हैं, दूसरे व्यक्ति को। मतलब कि आप महत्त्व देती हैं दूसरे व्यक्ति को, समझाने को।

जब आप जो कर रही हैं, पढ़ रही हैं, उससे प्रेम ही हो जाता है, तो सारा महत्त्व उस करने को, और पढ़ने को, दे दिया जाता है। अब दूसरे को समझा पाये, तो ठीक। नहीं समझा पाये, तो ठीक। वैसे तो बात बहुत समझाने-बुझाने की होती नहीं है।

कौन किसको समझा सकता है कि उसको प्रेम क्यों है? कैसे समझाओगे?

आप जो कर रही हैं, उसमें कहीं-न-कहीं गहरायी की कमी है अभी। इसीलिये जल्दी विचलित हो जाती हैं, जब कोई आकर के टोकता है, सवाल करता है, आक्षेप लगाता है। नहीं तो आप मग्न हैं, साधना में, शास्त्रों में, कोई आकर के दो -चार अच्छी-बुरी बातें कुछ जली-कटी बोल भी गया, तो आप तो मग्न हैं। आप तो आनन्द में हैं, आप तो अपने में डूबी हुई हैं। आप तो ऋषियों और संतों के साथ हैं।

और वहाँ तो बड़ी मौज है।

“कोई आया होगा, कुछ बोल गया। हाँ, कुछ बोल तो रहा था। क्या बोल रहा था?”

“बाबा, सुनो! ज़रा दोबारा बताकर जाना, क्या बोले”।

और जबतक वो दोबारा बताया, आप फिर खो गयीं। जो बोलने आया था, वही झल्लाकर लौट गया।

“कुछ भी बोलते रहो, ये तो न जाने कहाँ खोयी रहती है”।

आपने कल भी जो प्रश्न पूछा था, और आज भी, दोनों में साझी बात ये है कि आप पर दुनिया की बातों का असर बहुत होता है। चाहे वो पशुओं के सन्दर्भ में हो, चाहे वो ऋषियों के सन्दर्भ में हो। आप पशु के साथ होती है, कोई आकर टोक देता है, आप विचलित हो जाती हैं। आप ऋषि के साथ होती हैं, कोई आकर टोक देता है,आप हिल जाती हैं। जिसके भी साथ रहिये, फिर गले ही लगा लीजिये। फिर ये जो टोका-टोकी करने वाले हैं, दूर से ही लौट जाएँ।

ये भी सही शिकार देखकर ही वार करते हैं। इन्हें जहाँ पता होता है, कमज़ोरी है, ये वहीं चोट करते हैं। आपकी हस्ती देखकर ही उन्हें अगर समझ में आ जाये, कि इसपर चोट करके अब लाभ होगा नहीं, तो फिर ये अपने पैतरे कहीं और आज़मायेंगे। आपको ये अकेला छोड़ देंगे।

वो कहेंगे, “आलस है, साधना नहीं है”, आप कहेंगे, “हौ”।

(हँसी)

“है आलस, तो। कोई कर्ज़ उतारना है? तुमसे कुछ ले रखा है हमने? आलस है तो है।  हाँ, है आलस”।

“रोज़मर्रा की ज़िंदगी, के ही काम करिये आप”।

“जी, मेरी रोज़मर्रा की ज़िंदगी यही है। वही कर रही हूँ। बैठिये, चाय पिलाती हूँ”।

जब तक चाय आयी, महाशय नदारद हैं। आलस वाली चाय है न। दुल्हा-दुल्हन मिल गये, फीकी पड़ी बारात।

“मैं, मेरी ज़िंदगी, तुम हो कौन? शुभेक्षु बनकर आओ, बात अलग है, स्वागत है तुम्हारा। प्रेमी बनकर आओ, प्रार्थी बनकर आओ, तो भी स्वागत है। पर मेरे और मेरे प्रेम के बीच बाधा बनकर आओगे, तो आलस वाली चाय पाओगे”।

तो कमी क्लैरिटी, स्पष्टता की नहीं है, कमी प्रेम की है।

प्रेम बढ़ाईये, ये दाएँ-बाएँ वाले सभी, खुद ही विलुप्त हो जायेंगे।

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शब्द-योग सत्र से उद्धरित। स्पष्टता हेतु सम्पादित।

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