उद्धरण – जून’१९ में प्रकाशित लेखों से

1.

जीव पैदा हुए हैं न हम। और अकेले नहीं पैदा हुए हैं। इंसान को तो पैदा होने के लिये भी दो चाहिये। इंसान जब भी होगा, अपने आसपास और इंसानों को पाएगा। एक कुटुंब हैं हम। एक कुनबा हैं हम। और जितने हैं हमारे आसपास, सब हमारे ही जैसे हैं।

दो बातें कहीं हमने। पहला, हम अकेले नहीं। दूसरा, जितने भी हमारे आसपास हैं, सब हमारे ही जैसे हैं। देखिये मृत्यु को, और देखिये कि आप ही भर नहीं डरी हुई, और उदास हैं। आप ही को नहीं कचोट गयी। आप ही को नहीं भेद गयी। ये पूरी दुनिया जी ही रही है मृत्यु के दुःख और डर में।

इस डर को अपनी ऊर्जा बना लीजिये, इस गहरी उदासी को अपनी प्रेरणा बना लीजिये। मत कहिये कि मेरे भीतर से उदासी मिट जाये। वही उदासी जब दूसरों का भला करने के काम आती है, तो ‘करुणा’ कहलाती है।

2.

बुद्ध ज्ञानी मात्र नहीं हैं।
बुद्ध सजीव करुणा हैं।

3.

कुछ झूठा नहीं है। और यदि सब झूठा ही झूठा है, तो किसके लिये रचे गये ग्रन्थ? झूठ को समझाने के लिये? क्यों बुद्धों ने किया इतना श्रम? झूठ को बचाने के लिये? हमारे-आपके लिये ही तो वो सब बातें कही गयीं न? और हम सब अगर झूठे ही हैं, तो झूठों से क्या इतना लेना-देना?

4.

नहीं! होगा झूठ।
पर करुणा की यही बात है, करुणा की यही मिठास है।
वो भली -भांति जानती है कि आत्यंतिक रूप से तुम्हारे सारे भाव झूठे हैं।
आत्यंतिक रूप से तो तुम्हारा होना भी झूठ है, लेकिन अभी तो तुम्हें दुःख है ही।

5.

हम जैसा जीवन जी रहे हैं, जिन स्थितियों में हमने जन्म लिया है, और तदोपरांत जैसी हमने ज़िंदगी चुनी है, दुःख उसकी अनिवार्यता है।

एक ही तरह का जन्म लेते हैं, और एक ही तरह का जीवन जीते हैं।

तुम जी रहे हो सुख की आकांक्षा में, इसीलिये दुःख और भी बुरा लगता है। उम्मीद किसकी थी? सुख की। फिर जब दुःख आता है, तो और लगता है ।

सुख की उम्मीद तुम करते ही इसीलिये हो, कि और ज़्यादा हो, क्योंकि तुम दुखी हो।

6.

वास्तव में, बिना वेदना के, कोई ज्ञान दिया भी नहीं जा सकता। जिसका दिल खुद न टूटा हो, वो किसी दूसरे को कुछ समझा नहीं सकता। कोई विद्या नहीं दे सकता। वेदना, संवेदना, विद्या, और वेद। ‘वेदना’ माने – कष्ट, ‘संवेदना’ माने – करुणा, ‘विद्या’ – जानते ही हो, और ‘वेद’ – समझते ही हो। ये सब एक ही मूल से आ रहे हैं। और इन सब में बड़ा गहरा नाता है।

7.

तुम्हारा अपना दिल जब तक टूटा नहीं, तुम दूसरों के क्या काम आओगे।
वेदना का अनुभव होना चाहिये।
तुम्हारी अपनी वेदना को संवेदना बन जाना चाहिये।
और जिसके हृदय में संवेदना उठने लगी, समस्त विद्या उसको उपलब्ध हो जाती है।
अब वो ज्ञानी हुआ।

8.

आदमी क्यों अपनी छवि के प्रति सतर्क रहता है, जानते हो? क्योंकि छवि का भी सीधा-सीधा सम्बन्ध तुम्हारी भौतिक सुख-सुविधाओं से है। कुत्ता बुरा नहीं मानेगा, अगर तुम उसे गाली दे दो। पर कुत्ता बुरा मानेगा न अगर तुम उसकी रोटी छीन लो? तुम्हारी भी छवि से, तुम्हारी रोटी बंधी हुई है, इसलिये डरते हो। तुमने अपनी रोटी क्यों दूसरों के हाथ में दे रखी है?

9.

जिस दिन तुम देखना कि छवि का कोई सम्बन्ध तुम्हारी रोटी से नहीं है, उस दिन तुम कहोगे, “छवि गयी भाड़ में”।

जब तुम ऐसी जगह पहुँच जाते हो, जहाँ पर तुम्हारी छवि बने या बिगड़े, तुम्हारी सुख-सुविधाओं, सहूलियतों पर कोई फर्क नहीं पड़ता, उस दिन तुम छवि की परवाह करना छोड़ देते हो।

10.

तो छवि भी ऐसी कोई सूक्ष्म चीज़ नहीं है।
छवि भी ऐसी कोई मानसिक चीज़ नहीं है।
छवि भी बड़ी भौतिक बात है।
छवि का भी सीधा-सीधा मतलब माल -मसाले से है।

11.

शरीर को याद है, कि बहुत-बहुत बार तुम मरे हो भूख से। वो पूरी चीज़ तुम्हारे जींस (वंशाणु) को याद है।

तुम्हारी अर्थव्यवस्था बहुत तेजी से तरक्की कर गयी। तुम्हारे विज्ञान, तुम्हारी तकनीक ने, प्रौद्योगिकी ने, बहुत तेजी से तरक्की कर ली, ये शरीर उतनी तेज़ी से आगे नहीं बढ़ा है। तुम गौर से देखो, अभी में, और पिछले पाँच हज़ार सालों में दुनिया कितनी बदल गयी है। बदल गयी न? पर आदमी का जिस्म बदला है क्या?

तुम पाँच हज़ार पहले के आदमी को लाकर यहाँ खड़ा कर दो, और उसे आज के परिधान पहना दो, वो बिलकुल कैसा लगेगा?

आज के आदमी जैसा।

लेकिन पाँच हज़ार सालों में दुनिया कितनी बदल गयी है? बहुत बदल गयी है। लेकिन तुम्हारे शरीर को स्मृति अभी भी पाँच हज़ार साल पहले की ही नहीं, पाँच लाख साल, पचास लाख साल पहले की है। तो इसीलिये तुम्हारा शरीर, जहाँ शक़्कर पाता है, खाना चाहता है। तभी तो तुम्हें शक्कर इतनी अच्छी लगती है न।  क्योंकि रोटी के लिये मर रहा है।

इसको अभी भी बस एक ही चिंता है – ‘कहीं मर न जाऊँ भूख से’। तो इसीलिये रोटी के लिये मरा रहता है। इसीलिये जैसे ही तुमको तेल मसाला मिलता है, चर्बी मिलती है, शक्कर मिलती है, तुम खा लेते हो, क्योंकि ये चीज़ें तुम्हें ज़िंदा रहने में मदद करेंगी।

12.

जो अपने होने को लेकर बहुत शंकित हो, वो निन्यानवे अच्छी घटनाओं को भुला देता है,
और एक बुरी घटना को याद रखता है।

13.

जिसका काम ही यही हो, कि बस एक उद्देश्य की पूर्ति करे। क्या उद्देश्य? ‘मैं बचा रहूँ’, वो उन सब घटनाओं को नज़रअंदाज़ करता रहेगा, जो घटनायें ठीक थीं। जहाँ कोई खतरा नहीं था। पर अगर एक घटना ऐसी घट गयी, जो गड़बड़ थी, तो वो उस घटना को सदा के लिये स्मृति में अंकित कर लेगा।

14.

धन अकस्मात नहीं आ जाता। हाथ का मैल नहीं होता वो, भले ही हमारा प्रचलित मुहावरा ऐसा कहता हो।
धन आता है, उसके पास, जो दुनिया को समझता है।
धन कमाना एक कला है, जो माँग करती है कि आपने जगत के दाँव-पेंचों की समझ हो।
जो दुनिया को नहीं जानता, वो दुनिया में धन नहीं कमा सकता।
और ‘दुनिया को जानने’ का अर्थ होता है – मन को जानना।

15.

एक अच्छा व्यापारी, एक चतुर व्यापारी, बड़ी सहजता से अध्यात्म में प्रवेश कर जायेगा, क्योंकि उसने मन को जाना है। वो जानता है कि ग्राहक कैसे रीझता है। वो जानता है ‘मुनाफे’ का अर्थ। वो जानता है कि माल कहाँ से आता है, माल कहाँ को जाता है। वो जानता है कि हर चीज़ कहाँ से उठती है, और हर चीज़ का क्या अंजाम होता है। उसे पता है कि आदमी की दृष्टि किस चीज़ को मूल्य देती है, और किस चीज़ के पीछे पैसा खर्चने को तैयार हो जाती है।

16.

संतों का एक वचन है, “साईं मेरा बानिया, सहज करे व्यापार। बिन दांडी बिन पालड़ै, तोले सब संसार”।

जिसने पूरे संसार को ही तोल लिया, उस बनिये को वो ‘परमात्मा’ कहते हैं। हम छोटे-मोटे बनिये हैं। जिसकी व्यापार में रुचि, सो बनिया। व्यापारी तो हम सभी हैं, लेनदेन में लगे ही रहते हैं। कुछ भी देने से पहले, ये फ़िक्र करते हैं न, कि बदले में क्या मिल रहा है? तो हम सब व्यापारी हैं। जो ठीक-ठीक जान ले, कि क्या दिया और क्या लिया, उस महा-व्यापारी को ‘परमात्मा’ कहते हैं।

17.

हम ठीक-ठीक जान नहीं पाते। हम गलत सौदा कर जाते हैं। हमें चीज़ों का मूल्य नहीं पता, क्योंकि हमें अपना मूल्य नहीं पता। और किसी चीज़ का मूल्य लगाने के लिये, हमें पहले ये पता होना चाहिये कि वो चीज़ है क्या। अपना मूल्य लगाने के लिये पहले ये पता होना चाहिये कि – ‘मैं हूँ कौन’। दुनिया का मूल्य पता लगाने के लिये हमें पता होना चाहिये कि ‘दुनिया’ शय क्या है। हमें कुछ पता नहीं, तो हम उलटे-पुल्टे मूल्य लगाते हैं।

18.

परमात्मा का ही तो विस्तृत रूप है संसार।

जो संसार को जान गया, वो परमात्मा में प्रवेश कर गया।
उलझता तो संसार में वही है न, जो संसार को समझ नहीं पाया।

19.

गणित का सवाल होता है तुम्हारे सामने, उसमें कब उलझ जाते हो? जब हल न होता हो, जब समझ न आता हो। हमने बड़ा व्यर्थ चित्र बैठा लिया है मन में। हम कहते हैं कि – ‘जो दुकान पे बैठा, जो व्यापार में गया, वो संसार में उलझ गया’। न। आवश्यक नहीं है। जो दुकान को नहीं समझा, वो उलझ गया। जो व्यापार को नहीं समझा, वो उलझ गया। जो व्यापार को समझ गया, वो तो पार हो गया।जो दुकान को समझ गया, वो दुकान के पार हो गया।अब वो दुकान पे बैठा रहे। क्या अंतर पड़ता है? वो पार गया।

20.

ध्यान की ज़रुरत ही नहीं है, धन काफी है। बस तुम्हें पता होना चाहिये कि असली धन कौन-सा है। अब ध्यान का करोगे क्या? ध्यान तो होता है परमात्मा तक जाने के लिये। और परमात्मा ही असली धन है। जब धन ही मिल गया, तो अब ध्यान करोगे क्या? ध्यान तो मार्ग है धन्यता का। ध्यान मार्ग है, जो तुम्हें असली धन तक पहुँचाता है। जब वो असली धन ही मिल गया, तो ध्यान का क्या करोगे? धन ही काफी है।

“पायो जी मैंने, राम रतन धन पायो”

21.

कमाने निकलो, ज़रूर कमाने निकलो। दुनिया से जूझने निकलो। अर्जित करने निकलो। और इरादा पूरे का रखो। बुलंद रखो। ये न कहो कि थोड़ा-बहुत कमाकर संतुष्टि मिल जायेगी।

22.

तो भारी लाभ कौन-सा हुआ? जिसके बाद लाभ की आकांक्षा तृप्त-सी हो जाये, कि कुछ ‘और’ लाभ हो गया। ऐसा लाभ, कि सारे लाभ छोटे-मोटे लगते हैं । “पायो जी मैंने …….”। कुछ मिला। कुछ मिला। कुछ ऐसा मिला, उसको फिर ‘धन’  कहते हैं। वो धन, और सांसारिक धन, समझना इस बात को, कि बहुत दूर तक साथ-साथ चलते हैं। परमात्मा का धन, और संसार का धन, बहुत दूर-दूर तक साथ चलते हैं, क्योंकि संसार के भीतर ही तो गहरे प्रवेश करके परमात्मा तक पहुँचोगे।

कमाते-कमाते, एक दिन कमाने के पार निकल जाओगे। कमाना छूट जायेगा।

23.

कमाने के लिये जानते हो क्या चाहिये? कमाने के लिये पहले तुम्हारे पास ऐसा कुछ होना चाहिये जिसको दुनिया क़ीमत रखे। तुम जानते ही नहीं कि दुनिया किस चीज़ पर क़ीमत रखती है, तुम पैसा क्या कमाओगे।

बेच पाने के लिये आवश्यक है कि तुम ख़रीददार का मन पढ़ पाओ। दूसरे का मन पढ़ पाने के लिये ये आवश्यक है कि पहले अपने मन का कुछ पता हो।

24.

ग्राहक को समझा पाओ कि कोई चीज़ उसके लिये क्यों ज़रूरी है, उसके लिये तुम्हें पता तो होना चाहिये न कि किसके लिये क्या ज़रूरी है। तुम्हें आजतक यही नहीं पता कि तुम्हारे लिये क्या ज़रूरी है, तुम ग्राहक को क्या बता पाओगे कि तुम्हारे लिये क्या ज़रूरी है। जिनसे माल न बिकता हो, वो ये जान लें कि बड़े ही भोंदू हैं। वो अपने आप को इस सांत्वना में न रखें कि – “हम तो साहब संन्यासी हैं, कि पंडित हैं, और ये बेचना इत्यादि हमारे कद का काम थोड़े ही है”।  जो महा-पंडित होगा, वो महा-विक्रेता भी होगा। वो चुटकी में सामान बेचेगा।

25.

व्यापार में, और उस पार में, एक बड़ा गहरा नाता है।
दुनिया को जीतना सीखो।
हरन्ते, भगोड़े, इनके लिये नहीं है अध्यात्म।
परमात्मा अस्वस्थ, और पंगु, और अशक्त लोगों को कोई विशेष पसंद नहीं करता।

26.

“नायं आत्मा बलहीनेन लभ्यो”

बलहीन को आत्मा का लाभ नहीं होता। और कौन-सा बल होगा? मनोबल की ही बात हो रही है। और एक ही मनोबल है। क्या? बोध, समझदारी। दुनिया को जान गये अगर तुम, तो कोई अध्यात्म अब शेष नहीं रहा तुम्हारे लिये। संसार को जान लिया, यही तो सत्य है।

‘संसार’ माने – व्यापार का अड्डा। ‘संसार’ माने – जहाँ हर कोई अधूरा है, और इसीलिये लेनदेन में लगा हुआ है। संसार को जानना माने, संसार के व्यापार को जानना। व्यापार को जानना माने – धन के क्षेत्र में अनाड़ी न होना।

27.

धन संचित करने की बात नहीं कर। सामर्थ्य होनी चाहिये धन कमाने की, अर्जित करने की।

फिर छोड़ दो, तो अलग बात है।

28.

और अक्सर जो ऊपर से नीचे तक मैले होते हैं, क्योंकि साबुन ख़रीदने के पैसे नहीं होते, वही बताते हैं कि – “रुपया तो हाथ मैल है”। जिन्होंने कमाया होता है, वो जानते हैं कि ऐसे ही नहीं आ जाता। मेधा चाहिये, प्रतिभा चाहिये, ध्यान चाहिये, समर्पण चाहिये। तब दुनिया जीती जाती है।

29.

हमारा बड़ा स्वार्थ होता है ये कहानी बैठा लेने में कि जो गरीब है, वो इसीलिए गरीब है क्योंकि वो चालाक नहीं है, बेचारा ईमानदार है। और जो अमीर है, वो इसीलिये अमीर है, क्योंकि वो रक्त-पिपासु है, और उसने गरीबों का शोषण किया है।

हकीकत ऐसी नहीं है।

ज़्यादातर लोग जिनके पास धन है, उनके पास धन इसीलिये है क्योंकि उन्होंने उसके पीछे मेहनत की है। एकाग्र हुए हैं। और एकाग्रता, समाधि की दिशा में भी एक कदम होता है।

30.

अगर आप कमाने के लिये एकाग्र हो सकते हैं, तो आप परमात्मा को पाने के लिये भी एकाग्र हो सकते हैं।
जो एकाग्रता जानता ही नहीं, जो धन भी नहीं कमा पा रहा, वो परमात्मा को क्या पायेगा?
जो धन भी नहीं कमा पा रहा, वो परमात्मा को क्या कमा पायेगा, वो तो सबसे बड़ा धन है।

31.

ये धारणा बिलकुल मन से निकाल दो कि जो फटेहाल घूम रहा है, वो बड़ा तत्व-ज्ञानी है। जो फटेहाल घूम रहा है, वो फटेहाल ही है। और भारत में ये भ्रम ज़रा गहरा चला गया है, कि जो ही दिख जाये बिलकुल उपेक्षित, तिरस्कृत, उसको ही मान लेना कि फ़कीर है,  संत है। जो ही किसी ‘काम का’ ना हो, उसे ही मान लेना कि परमात्मा के काम का है।

ऐसा थोड़े -ही होता है।

राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, ये सब राजवंश से थे। पढ़े- लिखे थे। कुलीन थे, विद्यावान थे, शौर्यवान थे। फटेहाल थोड़े ही घूम रहे थे। त्याज्य थोड़े ही थे।

32.

ईश्वर प्राप्ति को कोई अनुभव नहीं होता। अनुभव तो सारे किसी अनुभव करने वाले को होंगे न, अनुभोक्ता को होंगे न? वो अनुभोक्ता अपना काम करता रहता है, वो प्राकृतिक अनुभोक्ता है।

33.

जिसको तुम ‘मुक्ति’ या ‘मोक्ष’ कहते हो, उसके पूर्व भी, जो अनुभोक्ता है, वो अनुभव करता रहता है।
और उसके पश्चात भी, जो अनुभोक्ता है, वो अनुभव करता रहता है।

तो अंतर क्या पड़ता है?

अंतर ये पड़ता है कि – अहम् वृत्ति, बेचैन चेतना, पहले उन अनुभवों में शांति खोजती थी, पहले उन अनुभवों के सामने प्यासी घूमती थी, अब वो उन अनुभवों से बहुत नाता  नहीं रखती। देख लेती है कि अनुभव चल रहे हैं, वो तृप्त बैठी रहती है।

34.

अनुभवों को लेकर ज़्यादा आग्रह किसका रहता है?
जो बेचैन है, जो बंधन में है।
जो मुक्त हो गया, वो किससे मुक्त हो गया? वो अनुभवों से ही तो मुक्त हो गया।
अब वो अनुभवों का खेल चलने देता है।

35.

“पहले हम पानी तरफ तब भी चले जाते थे, जब हमारी अपूर्णता भेजती थी, क्योंकि हमें लगता था कि पानी का इस्तेमाल करके, हम अपनी आंतरिक अपूर्णता को भर लेंगे। अब पानी उतना ही पीते हैं, जितना हलक को चाहिये।
पहले पानी पीते थे, ताकि भीतर का खोखलापन भर जाये”।

पानी समझ रहे हो न? पानी समझ रहे हो न किसका प्रतीक है?

हर वो चीज़ जो तुम्हें चाहिये।

36.

‘मुक्ति’ के बाद भी चीज़ें चाहिये होती हैं।
किसको?
उसको जिसको चीज़ों की ‘ज़रुरत ‘होती है।

37.

ये अनुभव-अनुभोक्ता का खेल चल रहा है, इसमें हम कहीं नहीं हैं। ये ‘मुक्ति’ कहलाती है। अब तुम अनुभवों से मुक्त हो गये। यही ईश्वर प्राप्ति है, यही ‘मोक्ष’ है। खेल चल रहा है बाहर, तुम उससे कोई उम्मीद रखकर नहीं बैठे हो। तुम्हारी उम्मीदें, सब पूरी हुईं। तुम पूर्ण हो। चलता रहे खेल बाहर, हमें खेल बुरा भी नहीं लग रहा। पर हम उस खेल के सामने, भिखारी तरह नहीं खड़े हैं।

खेल सुंदर है, चले।

38.

ईश्वर प्राप्ति का कोई अनुभव नहीं होता।
ईश्वर प्राप्ति के बाद, आप सारे अनुभवों के प्रति समरस हो जाते हो।
‘ईश्वर प्राप्ति’ का अर्थ ही है – सारे अनुभवों के प्रति निरपेक्ष हो जाना ।

39.

सब अनुभव हो रहे हैं। ऐसा भी नहीं है कि अनुभव होने बंद हो गये। जब तक अनुभोक्ता बैठा हुआ है,  वो अनुभव तो करता ही रहेगा। हाँ, क्योंकि तुम अब एक विशेष प्रकार के अनुभवों का समर्थन नहीं कर रहे, साथ नहीं दे रहे, तो अनुभवों में भी एक सात्विकता आ जाती है।

पर अनुभव चलते तो रहते ही हैं ।

40.

तुम्हें क्या लगता है, मुक्त हो जाओगे, और सूरज चमकेगा, तो तुम्हें गर्मी नहीं लगेगी? तुम्हें क्या लगता है, मुक्त हो जाओगे, और जाड़े की रात होगी, तो ठिठुर कर रज़ाई की ओर नहीं भागोगे? भागोगे। देह को बुरा लग रहा है। देह रज़ाई  खोजेगी, मस्तिष्क की सहायता से। तो अभी-भी अच्छा-बुरा तो लगा न? रज़ाई कैसी लगी? अच्छी लगी। धूप कैसी लगी? बुरी लगी।

पर जिसको अच्छे लगने थे, उसे लगे। जिसको बुरे लगने थे, उसे बुरे लगे।

अनुभव का खेल जिनके लिये चलना था, उनके लिये चल रहा है। हमारे लिये नहीं चल रहा।

41.

बहकना सत्संग के मध्य नहीं होता, सत्संग की अनुपस्थिति में होता है।
तुम चुनते हो कि – मैं कहीं और पहुँच जाऊँ।
‘उप’- माने नज़दीक। और ‘स्थित’ माने – तुम्हारी स्थिति, तुम्हारी अवस्था।
कहाँ पर हो ।

42.

‘सत्संग’ का मतलब – उपस्थिति।
पास आओ, पास बैठो।

43.

तुम अगर चुन ही लो दूर जाने को, तो अब सत्संग है कहाँ?

तुम बहक जाते नहीं, स्वीकार करो, तुम बहकने का चुनाव करते हो।

ये पहली बात।

अब दूसरी बात पर आओ।

तुम बहकने का चुनाव क्यों करते हो? तुम बहकने का चुनाव इसलिये करते हो, क्योंकि तुम्हें लगता है कि बहककर कुछ ऐसा मिल जायेगा, जो सत्संग में भी नहीं मिल सकता।

44.

तुम बड़े बेईमान पखेरू हो।
तुम न यहाँ के हो, न वहाँ के हो।
ऐसा भी नहीं कि राम के प्रति तुम्हारी बेईमानी है, तो संसार के प्रति तुम्हारी ईमानदारी है।
तुम दुनिया के भी नहीं हो।

45.

तो तुमने अच्छा धंधा चला रखा है, न तो तुम यहाँ कुछ पाते हो, न तुम वहाँ से विरक्त होते हो। कभी सार, कभी संसार, यही कर रहे हो। किधर के तो हो जाओ, या तो इधर के, या उधर के। थोड़े दिनों के लिये ही सही, पूरी निष्ठा के साथ।

46.

आत्मा गुरु है, और मन चेला है ।
मन को आत्मा के निकट आना होता है।
ये है गुरु और शिष्य के प्रेम की बात।
शारीरिक उपस्थिति मददगार है, पर सिर्फ शारीरिक उपस्थिति से भी बात नहीं बनेगी।

47.

जब  ‘बोध ‘मात्र ध्येय हो, तब मन की हालत को  ‘ध्यान’ कहते हैं।

48.

कुछ भी मत करो, अगर वो तुम्हें तुम्हारे परम ध्येय की ओर नहीं ले जा रहा – ये ‘ध्यान’ है।
न खाओ, न पीयो, न उठो, न बैठो, न आओ, न जाओ।
और अगर आने-जाने से ‘वो’ मिलता हो, जिसकी वास्तव में तुम्हें चाह है, जो तुम्हारा परम लक्ष्य है, तो ज़रूर आओ, ज़रूर जाओ – ये ‘ध्यान’ है।

49.

जो भी करो, ‘एक’ ध्येय के साथ  करो – इसका नाम है ‘ध्यान’।
ध्यान का अर्थ ये नहीं है कि जो भी करो, उसी में रम जाओ।
‘ध्यान’ का अर्थ है – कुछ भी मत करो, अगर उससे ‘वो’ न मिलता हो।
सब व्यर्थ है, अगर उससे ‘वो’ नहीं मिल रहा।

50.

कोई भी काम करने लायक सिर्फ तब है, जब उससे तुम्हारी मूल बेचैनी का शमन होता हो।
नहीं तो मत करो।

51.

जो भी कुछ कर रहे हो, छोटा या बड़ा, पूछो अपने आप से, “ये करके ‘वो’ मिलेगा क्या? इसका ‘उससे’ कुछ सम्बन्ध है क्या? और अगर नहीं है, तो क्यों कर रहा हूँ?” – ये ‘ध्यान’ है।

52.

पद्धतियाँ हज़ारों हैं, लाखों हैं, जो तुम्हारी अवस्था है, उसके हिसाब से पद्धति है।
और ‘ध्यान’ की तुम्हारे लिये उचित पद्धति क्या है, ये तुम्हें ‘ध्यान’ ही बता सकता है।
या तो तुम्हारा ‘ध्यान’, या किसी और का ‘ध्यान’।

53.

मैं चाहता हूँ, कि ‘ध्यान’ तुम्हारा ऐसा रहे, कि जब वो टूटने लगे, तो तुम्हें पद्धति बता दे बचने की। ऑटो-रिपेयर(स्व-चालित सुधार) की उसमें सुविधा रहे। जैसे शरीर में होती है न, कि शरीर में चोट लगती है, तो शरीर खुद ही उसे ठीक कर लेता है।

तो ‘ध्यान’ में भी ऐसी जीवंतता रहे, कि ‘ध्यान’ टूटा नहीं, और ‘ध्यान’ खुद ही उपाय बता दे कि अब इसको ठीक कैसे करना है।

54.

जीवन में प्रतिपल बदलते  माहौल हैं। हर माहौल के लिये कोई तुम्हें विधि नहीं दे गया। जिन्होंने बड़ी करुणा के साथ तुम्हें विधियाँ दी भी हैं, वो बेचारे सौ, सवा सौ, चार सौ, पाँच सौ पे जाकर अटक गये। इससे ज़्यादा कौन अब बतायेगा। लेकिन जीवन में स्थितियाँ कितनी हैं, सौ, चार सौ, या करोड़ों? तो तुम्हें ध्यान की करोड़ों विधियाँ चाहियें। और ये बात तुम्हें किताब में नहीं मिलेगी। इसके लिये तो तुम्हें स्वयं ही सजग रहना पड़ेगा, कि इस माहौल में ध्यान का क्या अर्थ है।

55.

ध्यान’ को फिर अनवरत होना पड़ेगा, लगातार।
‘ध्यान’ अगर लगातार है, तो बाहर जो तुम कर्म करोगे, वो कर्म ही ‘ध्यान’ की विधि बन जायेगा।
‘ध्यान’ ही तुम्हें ध्यान की विधि दे रहा है।
अब तुम्हारे कर्म ऐसे हो रहे हैं, कि तुम्हारा ध्यान बचा रहे, और गहराये।
वो ‘ध्यान’ श्रेष्ठ है।

56.

लोग ‘ध्यान’ में बैठते हैं, फिर खड़े भी तो हो जाते हैं। मैं कहता हूँ कि इसमें कोई गलती नहीं कि तुम ‘ध्यान’ लगाने बैठे, सुबह सात बजे। पर उठ क्यों गये? ध्यान ‘करने’ में बुराई नहीं है। पर जो ध्यान ‘करना’ शुरु करे, वो फिर ध्यान तोड़े नहीं। तो ऐसी विधि मत आज़माओ, जिसका टूटना लाज़मी है।

57.

जो प्रचलित विधियाँ हैं, वो तुम्हें ये तो बताती ही हैं कि ‘ध्यान’ कैसे शुरु होगा, और फिर ये भी तो बता देती हैं कि उठ कब जाना है। और तुम उठे नहीं, कि तुम्हारे दिमाग में घर, दुकान, बाज़ार चक्कर काटने लगते हैं। होता है या नहीं? तुम उठते ही इसीलिये हो कि सात बजे बैठे थे, अब आठ बज गये हैं, अब तो दुकान जाने का समय हो गया। “थोड़ी देर में ऑफिस की बस आ रही है। ध्यान से उठो, बहुत हो गया ध्यान”। फिर तुम कहते हो कि अब मैंने एक दूसरा टोपा पहन लिया है। ये भी तो खूब चलता है। पहले ध्यान वाला टोपा था, अब दूसरा टोपा पहन लिया। तो ‘ध्यान’ टोपा बदलने का नाम नहीं होता।

58.

‘ध्यान’ ऐसा हो, कि फिर लगातार बना रहे – चौबीस घंटे, अटूट बना रहे।
और जैसे-ही उसपर टूटने का संकट आये, तो ‘ध्यान’ तुम्हें स्वयं बता दे, कि इस संकट का सामना कैसे करना है।
संकट का सामना करने के लिये जो कर्म किया जायेगा, वही ‘ध्यान’ की विधि है।

59.

प्रत्येक क्षण ही संकट आ ही रहे हैं, क्योंकि संसार ध्यान तोड़ने को, बहुत कुछ भेजता है। फिर तुम जो भी कुछ कर्म कर रहे हो, वो ध्यान की एक विधि है। वो ध्यान की एक नयी, ताज़ी, मौलिक विधि है। वो विधि तुम्हें किसी किताब में नहीं मिलेगी।

60.

किताबों में जो विधियाँ हैं, क्या उनका कोई अर्थ है? बिलकुल है, पर सीमित है। वो तुम्हें बहुत दूर तक नहीं ले जा पायेंगी। क्योंकि उन सारी विधियों का अंत है। वो सारी विधियाँ, समय-सापेक्ष हैं। उसमें से एक भी विधि ऐसी नहीं, जो निरंतर चल सके। और जो निरंतर चल सके, वो विधि एक ही होती है। वो फिर विधि नहीं, उसका नाम ही ‘ध्यान’ है। उसको ‘ध्यान की विधि’ कहना उचित नहीं होगा। फिर वो स्वयं ‘ध्यान’ है। क्योंकि ‘ध्यान’ ही अकेला है, जो निरंतर हो सकता है। आत्मा निरंतर है। आत्मा के अलावा क्या निरंतर है?

61.

तो ‘विधि’ की तो परिभाषा ही यही है – जो शुरु होती हो, और फिर जो ख़त्म भी होती हो। ये ख़त्म होना बड़ा गड़बड़ है। जो विधि कभी ख़त्म न हो, वो अब विधि नहीं रही। अब वो क्या हो गयी? अब वो ‘ध्यान’ ही हो गयी। वो फिर ठीक है। ऐसी विधि तलाशो, जो कभी चुकती न हो, कभी ख़त्म ही न होती हो।

62.

जब शांति की तरफ गहरा प्रेम होता है, तो अशांति हटाने के लिये, आदमी खुद ही विधियाँ खोज लेता है।
यही ‘ध्यान’ है।

63.

जब शांति के लिये गहरा प्रेम है, तो अशांति हटाने के लिये आदमी खुद ही उपाय खोज लेता है।

वही ‘ध्यान’ की विधियाँ हैं।

64.

‘निरंतर’ की निरंतर चाह रखो।

65.

बहुत ज़्यादा दूसरे से ताल्लुक रखना ही क्यों है? जितना ताल्लुक रखो, ऐसा रखो कि तुम्हारे लिये भी शुभ हो, दूसरे के लिये भी शुभ हो।

66.

अपना भी एकांत रखो, और दूसरे को भी उसके एकांत में रहने दो।
सम्बन्ध रखो तो इसीलिये रखो कि वो तुम्हारी मदद करे, तुम उसकी मदद कर पाओ।
तुम उसे शांति दे पाओ, तुम वो तुम्हें शांति दे पाये।
इससे ज़्यादा किसी की ज़िंदगी में हस्तक्षेप, इससे से ज़्यादा किसी के आंतरिक दायरे में प्रवेश, अतिक्रमण है।

67.

हमें मतलब रहता है। क्यों रहता है? क्योंकि हम अपने जीवन से संतुष्ट नहीं हैं।

क्योंकि हम अपने जीवन से संतुष्ट नहीं हैं, तो इसीलिये हमें जगह-जगह ताँक-झाँक करनी है।

68.

जब सब एक तरफ हो जायें, तो आप ‘उसकी’ तरफ हो जाइये। जीतेगा तो वही,  जो ‘उसकी’ तरफ है।
सामने पाँच लाख भी खड़े हों, तो भी कौन जीतेगा, ये बिलकुल पक्का रखिये।
कौन-सी?
‘उसकी’

69.

तुम्हारे जीवन में, जो भी कुछ सुन्दर है, वो ‘वहाँ’ से आया है। ये बात सुख के पलों में याद नहीं रह जाती। तब लगता है कि सुख तो किसी स्त्री से मिल रहा है, या पैसे से मिल रहा है, या किसी जगह से मिल रहा है। फिर इसीलिये आदमी रोता है, कलपता है, दिल टूटता है। सुख के समय पर याद रख लो कि – ये हर चीज़ किसकी मेहरबानी से है – तो फिर दुःख नहीं मिलेगा न।

70.

जब तक जीव हो, हस्ती है तुम्हारी, देह है तुम्हारी, मन है, तो तमाम तरह के छोटे-बड़े अनुभव लगातार अपनी उपस्थिति का अहसास दिलाते रहेंगे। हमें नहीं करनी है उनकी बात। वो आये, ठीक है। कुछ आया होगा, हम अपना काम कर रहे हैं।

71.

अब पीछे ये धारा बह रही है न? ये समझ लो, ये अनुभव की धारा है। ये बह भी रही है, और थोड़ा शोर भी कर रही है। अपने होने का अहसास करा रही है न? हमें पता है कि ये है। ऐसा नहीं है कि हम अनुभव-शून्य हैं। मन में इसकी संवेदना हो रही है। लेकिन हम उसका संज्ञान नहीं ले रहे, क्योंकि हम अभी कुछ और कर रहे हैं, जो बहुत ऊँचा है।

72.

जब कुरुक्षेत्र में हो ही, तो क्या बताते फिरोगे कि – यहाँ खरोंच आ गयी, और फलाना बाल टूट गया। जब संघर्ष में हो ही, तो खरोंच भी आयेगी, दर्द भी होगा, खून भी बहेगा। बाल क्या, हाथ भी टूटेगा। बार-बार क्या ज़िक्र करना? असली चीज़ का ज़िक्र करो न। लड़ाई कहाँ तक पहुँची।

73.

छोटे की बहुत बात करना, बड़े की उपेक्षा करने का बहाना बन जाता है।
एक बार जान लो कि कोई चीज़ छोटी है, फिर उसको छोटे जैसा ही व्यवहार दो।

74.

छोटी -सी चीज़ से भी अगर आसक्ति है, तो वो छोटी-सी चीज़ इतने बड़े सूरज पर भी भारी पड़ती है।
छोटी -सी आसक्ति भी सत्य पर भारी पड़ जाती है।
अपनी छोटी-सी आसक्ति के कारण, तुम सत्य को छोड़ने को तैयार हो जाते हो।

75.

अभी बोल रहे थे, “गुरु से बार-बार मिलने की ज़रुरत ही क्या है? हमें तो लगता है गुरु हर वक़्त साथ ही हैं”। अपनी कल्पनाओं के गुरु को लिये रहो। वो कल्पनाओं का ‘गुरु’ तुम्हारे ही जैसा है। तुम अगर मेरे सामने न बैठे न होते, तो अभी कौन तुम्हारा अँधेरा मिटाता? पर तुम्हारा तो कहना है कि हमें गुरु की ज़रुरत ही नहीं। गुरु तो हमारे साथ हैं सर्वदा।

वो जो तुम्हारे साथ गुरु है, वो मैं नहीं हूँ। वो तुम्हारी अपनी ही कल्पना है, जो तुम्हारे ही तल पर है। वो तुम्हारे काम नहीं आने की।

76.

तुम्हारे शरीर की जो गर्मी है, वो कहाँ से आ रही है? सूरज से। ये जो पानी बह रहा है, पानी को बहने के लिये ऊर्जा चाहिये न? ये जो पानी बह रहा है, ये किसकी ऊर्जा से बह रहा है? सूरज की ऊर्जा से बह रहा है।

तुम भूल जाते हो कि ये सब कुछ किसके दम से है?

कहा तो – मकान बड़ा हो जाता, सूरज छोटा हो जाता है।

77.

गुस्सा आना कोई बुरी बात नहीं है, गुस्से के पीछे कारण सही रखो।
जब लगता है कि कुछ मिल नहीं रहा है, जब लगता है कि कुछ खो रहा है, किसी लक्ष्य को चाहा था, और उसकी प्राप्ति नहीं हो रही, तो गुस्सा उठता है।
गुस्से की बात छोड़ो, गुस्से के नीचे वो लक्ष्य है, वो इच्छा, कामना है, जिससे जुड़े हुये हो।

लक्ष्य ठीक रखो।

जो ऊँचे से ऊँचा चाह सकते हो, उसको चाहो। फिर वो न मिले, और गुस्सा आ गया, तो कोई बात नहीं।
दिक्कत तब है जब व्यर्थ, छोटी चीज़ चाही, और फिर वो चीज़ नहीं मिली तो गुस्सा किया।

78.

कुछ ऐसा माँगो, जो तुम्हें अपने लिये संभव ही न लगता हो। फिर तुम्हें हार भी मिलेगी अपने प्रयत्न में, तो कोई बात नहीं। फिर तुम्हें आश्चर्य होगा कि – गुस्सा उठता क्यों नहीं? या उठता है, तो इतना क्षीण क्यों है? या उठता भी है, तो इतना सात्विक क्यों है?

79.

क्रोध-क्रोध में अंतर होता है।

धर्म की रक्षा हेतु तुम्हें क्रोध आ गया, तो वो क्रोध ‘सात्विक’ कहलाता है।
और नशा नहीं मिल रहा, और गुस्सा उबाल रहा है, तो ये क्रोध बड़ा निकृष्ट है।
तो बात क्रोध की नहीं है, बात कामना की है – तुम माँग क्या रहे हो?
मैं कह रहा हूँ – जो ऊँचे से ऊँचा है, जो बिलकुल ठीक है सही है, उसको माँगो।
फिर जो होगा, देखा जायेगा।

80.

कदम तो हमेशा छोटा ही होता है। बड़ा भी कदम रखोगे, तो वो भी है तो छोटा-सा ही। पहाड़ थोड़े-ही लाँघ जाओगे एक कदम में।

दृष्टि किधर को है? लक्ष्य कौन है? ध्येय क्या है? किसको पाने के लिये बढ़े जाते हो? किसका आसरा है? प्रेम किससे है? दिल में कौन बसा हुआ है? सवाल ये है। कदम तो हमेशा छोटा होगा। इस वक़्त तो चाहे तुम हो, चाहे मैं हूँ, जो करेंगे, वो छोटा होगा।

81.

बाहर की तो प्रत्येक गतिविधि छोटी ही होती है।
संसार में सब कुछ छोटा है तो, संसार में तुम जो कदम लोगे, वो भी छोटा ही होगा।
प्रश्न ये है कि – दिल में कुछ बड़ा है या नहीं? किसी बड़े की तरफ बढ़ रहे हो या नहीं?

82.

संसार में जो कुछ है, वो छोटा है। और बढ़ना बड़े की ओर है। किसी ऐसे की ओर बढ़ना है, जो संसार का हिस्सा नहीं, जो पदार्थ नहीं, जो इंद्रियगत नहीं। जिसका कोई मूल्य नहीं लगाया जा सकता, जिसे नापा-तौला नहीं जा सकता। उसकी ओर जब बढ़ रहे हो, तो निशाना तुमने किसी बड़े पर लगाया। और संसार पर अगर तुमने निशाना लगाया, तो वो चीज़ छोटी ही होगी। हाँ, अपेक्षाकृत बड़ी हो सकती है।

चट्टान ढेले से बड़ी होती है, बस तुलनात्मक रूप से। पर सीमित तो होती ही है न? और जो कुछ सीमित है, उसके साथ कुछ मज़ा नहीं।

83.

किसी बहुत बड़ी चीज़ के साथ व्यस्त हो जाओ। उसी को मैं कहता हूँ – अपनेआप को सत्य में डुबो दो। छोटी बातों का ख़याल आना अपनेआप बंद हो जायेगा। छोटी-छोटी बातें फिर स्मृति में कूदेंगीं-फाँदेंगीं नहीं। बड़ा-सा हाथी कोई घुस आये इस कमरे में, हम सब छोटे-छोटे लोग अपनेआप बाहर हो जायेंगे। तो जीवन में कोई हाथी घुसा लो, तो ये सब छोटे-मोटे उपद्रव अपनेआप मर जायेंगे, बाहर हो जायेंगे।

84.

परमात्मा सबसे बड़ी परेशानी है।
मिलता ही नहीं।
तो तुम उतनी बड़ी परेशानी उठा लो। उतनी बड़ी चुनौती।
फिर ये छोटी-मोटी चुनौतियाँ सब, अकारक लगेंगीं।
अप्रासंगिक हो जायेंगी।
और जिसके पास कुछ बड़ा नहीं होता, उसको छोटी-छोटी चीज़ें बड़ी लगने लगती हैं।

85.

तुम उसके साथ हो लो, जो आग से भी, अग्नि से भी, बहुत बड़ा है। जो अग्नि के भी प्राणों का अधिष्ठाता है।
फिर कुछ नहीं डरायेगा।

86.

ये दोनों चीज़ें साथ-साथ चलनी चाहिये। अपनी मदद और दूसरों की मदद। जो लोग कहते हैं, “सिर्फ अपनी मदद करनी है”, उनकी बहुत ज़्यादा मदद हो नहीं पायेगी। क्योंकि उनकी मुक्ति का अभियान भी स्वार्थ से भरा हुआ है। वो पचास तरीकों से अपनी मुक्ति चाहते हैं, लकिन ‘अपनी’ ही मुक्ति चाहते हैं। ‘अपनेपन’ से उनको मुक्ति नहीं चाहिये। ‘मैं’ भाव से उनको मुक्ति नहीं चाहिये।

87.

अधिकाँश मददगार लोग, इसी कोटि के होते हैं।
खुद होश है नहीं, दूसरों का नशा उतारने चले हैं।
खुद बहके हुए हैं, दूसरों का हाथ थामने चले हैं।

88.

अपनी मदद और दूसरों की मदद एक ही चीज़ है, और वो साथ-साथ चलेगी।
दूसरों की जितनी मदद करोगे, तुम्हारी उतनी मदद होती रहेगी।
और तुम अपनी जितनी मदद करोगे, दूसरों की मदद करने के उतने काबिल बनोगे।

89.

दूसरों के लिये जब कुछ करते हो न, तो बड़ी शक्ति उतरती है। अपने लिये जब कुछ करते हो, तो अपने व्यक्तिगत सामर्थ्य जितना ही करोगे। जब दस और के लिये करने निकलते हो, तो तुम्हारी व्यक्तिगत ऊर्जा और सामर्थ्य के अलावा भी तुम्हें ताकत मिल जाती है। वो ताकत कहीं और से आती है।

दूसरों की सहायता करने में तुम्हारी सहायता हो जाती है।

90.

जब किसी के साथ हो, तो तुम्हें पता चलता है कि तुम्हारे मन की क्या दशा होती है, जब कोई सामने आता है। परख हो जाती है न। नहीं तो तुम अपने बारे में कल्पनाएँ ही करते रहते हो। पर जब कोई सामने आता है तो हाथ कंगन को आरसी क्या? सारे भेद खुल जाते हैं।

91.

अपने आप को आप कमरे में बंद कर लें, एकांत की बात करके, तो उसका एक दुष्प्रभाव ये होता है कि – आपकी स्वरचित, स्वकल्पित मान्यताओं को चुनौती देने वाला कोई यथार्थ नहीं होता।

92.

तो इसीलिये समझाने वाले कहते हैं कि – तुम वास्तव में क्या हो, तुम्हारे मन की हालत वास्तव में क्या है, ये तो तुम्हें, दुनिया के सामने आने पर, किसी चीज़ से सम्बन्धित होने पर ही पता चलेगा।

93.

जब हकीकत से वास्ता पड़ता है, तभी तो हकीकत का पता चलता है।

94.

एकांत भी ज़रूरी है, क्योंकि एकांत में तुम्हें पता चलता है कि मन अपने साथ कैसा है।

95.

अर्जुन सब होते हैं। अर्जुन सब इस अर्थ में होते हैं कि – कुरुक्षेत्र में सब मौजूद हैं। लेकिन कुछ अर्जुन होते हैं, जो कृष्ण को सारथी चुनते हैं। और कुछ अर्जुन होते हैं जो यूँ ही होते हैं। जो पैदा हुआ है, वो संघर्षों में ही पैदा हुआ है। सब कुक्षेत्र में ही पैदा होते हैं। सब पैदा ही कुरुक्षेत्र में होते हैं। बस ये है कि कुछ अपने अनुसार गदा घुमाते हैं। वो कहते हैं, “हम ही होशियार हैं। इसे मार देंगे, उससे संधि कर लेंगे। युद्ध जीत लेंगे, गद्दी हासिल कर लेंगे”।

और कोई एक होता है जो कृष्ण की सुनता है। उसका नाम ‘अर्जुन’।

96.

युद्ध में तो तुम हो ही।
कृष्ण की सुनने लग जाओ, तो ‘अर्जुन’ कहलाओगे।
कृष्ण की नहीं सुनोगे, तो मारे जाओगे।

97.

तो पहली बात तो, कि कृष्ण को चुनो।
और चुनना ही काफी नहीं है, फिर उनको सुनो।
दोनों ही तलों पर भूल हो सकती है।

98.

बल चाहिये होता है।
लेकिन वो बल किसी बाहर वाले के खिलाफ नहीं चाहिये।
वो बल अपने ही खिलाफ चाहिये।

99.

संकल्पी होना अच्छी बात है, सहज होना और भी अच्छी बात है।

100.

जब वृत्ति उठती है, तो अकसर उसमें इतना आवेग रहता है कि वो आपको विचार का मौका ही नहीं देती। वो ख़याल से, विचार से, और ज़्यादा नीचे के तहखाने में छुपी होती है। विचार से तो पता चल जाता है कि – “मैं ऐसा विचार कर रहा हूँ”। आप कहते हैं न, “अभी-अभी मुझे ये ख़याल आया”? या, “मैं पिछले एक घंटे से सोच रहा हूँ”। वृत्ति का पता भी नहीं चलता। वो नीचे-नीचे चुपके-चुपके अपना काम कर जाती है।

मैंने कहा कि वृत्ति का पता चलता है जब परिणाम आते हैं।

तब आदमी कहता है, “अरे ! ये मैं क्या कर गया”!

101.

लड़कियों के लिये, स्त्रियों के लिये, विशेषतया ज़रूरी है कि वो ज़िन्दगी के किसी भी मुकाम पर, आर्थिक रूप से परनिर्भर न हो जाएँ। और प्रकृति का खेल कुछ ऐसा है, आर्थिक रूप से सबसे ज़्यादा पराश्रित स्त्रियों को होना पड़ता है।

102.

और एक बार घर पर बैठ जाओ, कुछ महीने, या कुछ साल, तो उसके बाद अपनी जो तीक्ष्णता होती है, या शार्पनेस(धार) होती है, वो भी कुंद हो जाती है। तलवार को जंग लग जाता है। फिर बाहर निकलने का खुद ही मन नहीं करता। एक बार तुम्हारा गृहिणी बनने में मन लग गया, उसके बाद तुम चाहोगई नहीं कि मैं बाहर निकलूँ। और अपना आराम से, घर में गृहिणी बनकर, पराश्रित बनकर, पड़ी रहोगी।

103.

बाहर निकलो, ढूँढो। शुरू करने के लिये कोई काम छोटा नहीं होता। और तुलना मत करना, मैं फिर कह रहा हूँ कि पति इतनी बड़ी नौकरी करते हैं, तो मैं कोई छोटी नौकरी कैसे कर लूँ। बात तुलना की नहीं है। बात आत्म-निर्भरता की है। तू पाँच हज़ार, दस हज़ार, जितना न्यूनतम कमा सकती हो, उतने से ही शुरु कर लो। बाद में बढ़ता रहेगा। अभी शुरुआत तो करो।

104.

ऐसे नहीं, बाहर निकलो।
पूरा व्यक्तित्व बदल जायेगा।
घर में घुसे-घुसे व्यक्तित्व कुंठित हो जाता है।

105.

मैं घर के काम को छोटा नहीं कह रहा। उस काम का प्रकार कुछ ऐसा है, कि वो तुम्हारे विकास में बाधा बनता है। मैं सिर्फ ये कह रहा हूँ कि – जो घर में कैद है, उसे दुनिया का कुछ पता ही नहीं चलेगा। वही काम तुम निरंतर करते रहते हो न। तुम बाहर निकलते हो, विकास की पचास सम्भावनायें होती हैं।

106.

हम बारबार कहते हैं कि – तथ्य, सत्य का द्वार है। उसे तथ्यों का ही नहीं पता चलता। जब तक तुम दुनिया में निकल नहीं रहे, सड़कों की धुल नहीं फाँक रहे , बाज़ारों से रु-बी-रु नहीं हो रहे, तुम्हें क्या पता चलेगा?

107.

मैं घर के काम को छोटा नहीं मानता। घर अपना है, घर के सारे काम अपने हैं। किसी और का घर थोड़े ही है। अपना ही तो घर है, तो उनको मैं छोटा नहीं कह रहा। पर घर के काम की सीमाओं को समझना आवश्यक है।

108.

पढ़ाई नहीं करनी है, तो गौर से देख लो कि क्या आवश्यक है जीवन में।
अगर रोटी आवश्यक है, तो देख लो कि पढ़ाई के बिना भी कैसे कमा सकते हो। कोई ज़रूरी थोड़ी ही है कि पढ़-लिख कर ही रोटी कमाई जाये। और भी तरीके हैं, उनसे कमा लो।
और पाओ कि रोटी आवश्यक नहीं है, घरवाले ज़बरदस्ती धक्का दे रहे हैं, तो मना कर दो हाथ जोड़कर कि नहीं पढ़ना। और पाओ कि रोटी के लिये ही सही, लेकिन पढ़ना ज़रूरी है, तो पढ़ो बैठकर।

109.

अगर वास्तव में ये ललक उठ रही है कि जीवन को सार्थक करना है, जो पाने योग्य है उसे पाना है, तो फिर सवाल जवाब हटाकर के, सीधे-सीधे श्रम करो।

110.

अध्यात्म, जिसमें सामाजिक चेतना न हो, धोखा है, हिंसा है।

111.

आध्यात्मिक उन्नति होगी, तो तुम में करुणा उठेगी ही उठेगी। ये कौन-सा बोध है, जिसके साथ करुणा नहीं सन्निहित? ये कौन-सा अध्यात्म है जो कहता है कि अपना शरीर चमका लो, तमाम तरह की योगिक क्रियाएँ कर लो, हमें दुनिया से कोई मतलब नहीं?

112.

‘अध्यात्म’ माने – सेवा।
जहाँ सेवा नहीं है, जहाँ सर्विस नहीं है।
जहाँ एक समाज का हित चाहने वाली चेतना नहीं है, वहाँ कैसा अध्यात्म?

113.

संतों ने अगर कभी लोगों के लिये रोटी पानी का इंतज़ाम किया, तो इसीलिये किया ताकि जब उनका पेट भरा हो, तो वो ज़्यादा आसानी से अध्यात्म में, भजन-कीर्तन में, ग्रन्थ पाठ में, ज़्यादा आसानी से प्रवेश कर सकें। और वो गरीबों के लिये किया जाता था इंतज़ाम। उसका भी औचित्य ये था कि अलग-अलग जातियों के, वर्णों के लोग, साथ-साथ बैठकर खाएँगे, तो व्यर्थ की जो दीवारें हैं, वो गिरेंगी।

114.

आख़िरी चीज़ तो आदमी की आंतरिक आज़ादी है। आदमी की आंतरिक आज़ादी के रास्ते में अगर राजनैतिक आज़ादी का पड़ाव आता हो, तो उसको भी तो पार करना पड़ेगा न।

115.

दुनिया में जितने भी कुकृत्य हैं, पाप हैं, अध्यात्म सीधे उनकी जड़ काट देता है।
और जो भांति -भांति के सामाजिक आन्दोलन होते हैं, वो सिर्फ पत्ते नोचते हैं, टहनियाँ तोड़ते हैं।
सामाजिक आन्दोलन इसीलिये कभी विशेष सफल नहीं हो सकते।
अध्यात्म से आमूल चूल बदलाव आता है।

116.

सब हैं, पर वैसे ही हैं, जैसा ये युग है। अँधा ये युग है, अधर्म का ये युग है।
तो जितने अधर्मी हैं, वही सब रोल-मॉडल बने बैठे हैं।
और लोग उनको पूज रहे हैं।

117.

हाँ, पूरे अखबार में, और उन वेबसाइट में, तुम अष्टावक्र का नाम खोजकर दिखा दो। दो-दो कौड़ी के लोग, जिनके पास जिस्म के अलावा कोई औकात नहीं, वो राजा और आदर्श बनकर बैठे हुए हैं। या फिर वो, जो पूँजीपति हैं। रकम इकट्ठा कर ली है। या फिर वो जो, मूर्ख नेता हैं। उन्हीं के वृत्तांत पढ़ते रहो। उन्हीं को बारे में खूब लिखा जायेगा, उन्हीं को आदर्श बनाकर स्थापित कर दिया जायेगा।

118.

इस समय पर स्थिति ये  है कि जो इस व्यवस्था के, इस युग के विरोध में नहीं खड़ा है, वो इसके समर्थन में है।

तो अभी निष्पक्ष, या निरपेक्ष हो जाने का कोई विकल्प है नहीं। या तो आप इसके विरोध में हैं, या समर्थन में हैं। क्योंकि विरोध नहीं कर रहे, तो इसमें भागीदार हैं।

भगीदार तो हैं हीं। इन्हीं का खा रहे हैं, इन्हीं का पी रहे हैं, इन्हीं के बनाये तंत्र पर चल रहे हैं। तो भागीदार तो हैं हीं।

बिना कुछ किये ही भागीदार हैं।

विरोध करना है, तो कुछ अलग करना पड़ेगा।
विरोध करना है या नहीं करना है, या भागीदार रहना है, वो आप देखिये।

119.

सबकुछ ठीक ही होता, दुनिया में, समाज में, संसार में, तो मुझे क्या पड़ी थी कि मैं इस राह चलता, ये मिशन बनाता।
कुछ बहुत-बहुत घातक, और रुग्ण होता देखा है दुनिया में, इसीलिये ये काम कर रहा हूँ।
मोक्ष वगैरह के कारण ये राह नहीं पकड़ी है मैंने।
इस तबाही के कारण ये राह पकड़ी है मैंने।
ये जो बाहर महा-विनाश और अधर्म नाच रहा है, उसके कारण ये राह पकड़ी है मैंने।

120.

अखबार को उठाईये न, देख लीजिये कि किनका नाम छाया हुआ है। वही रोल-मॉडल हैं सब। कोई भी न्यूज़ वेबसाइट खोललीजिये, और देख लीजिये कि किनकी खबरें आ रही हैं, और किनकी तस्वीरें छप रही हैं। और क्या होगा उन ख़बरों को पढ़ने वालों का, और उन तस्वीरों को देखने वालों का।

थोड़ा विचार कर लीजिये।

121.

‘ब्रह्म को देखने’ से आशय है कि – तुम्हारी आँखें अब व्यर्थ चीज़ों को इतना काम मूल्य देती हैं, कि वो व्यर्थ चीज़ें दिखाई ही नहीं देतीं।

तुम्हारी आँखें अब व्यर्थ चीज़ों को इतना काम मूल्य देती हैं, कि वो व्यर्थ चीज़ें ,दिखाई देकर भी दिखाई नहीं देतीं।

ये है ‘ब्रह्म’ को देखना।

122.

‘ब्रह्म को देखने’ का मतलब है – बाकी सबकुछ जो दिखाई दे रहा है, उसको महत्वहीन जान लेना।

123.

बाकी सबकुछ दिखता तो है, पर ‘दिखता’ नहीं। बाकी सबकुछ दिखता तो है, पर उसको हम हैसियत नहीं देते, मूल्य नहीं देते। क्योंकि जो अमूल्य है, हम सीधे उसी की ओर बढ़े जा रहे हैं।

ये है ‘ब्रह्म’ को देखना।

कुछ ऐसा दिख गया है हमें, आँखों से नहीं, भीतर से।
कुछ ऐसा दिख गया है हमें, जिसके सामने बाकी दृश्य, सब नज़ारे, मूल्यहीन हैं।
उसको देखने के बाद, इधर -उधर देखने की इच्छा ही नहीं होती।
ये है ‘ब्रह्म’ को देखना।

124.

‘ब्रह्म को जानने’ से आशय है – दुनिया को जान लेना, और दुनिया को जानकर के, मिथ्या पा लेना।
जब दुनिया मिथ्या हो गयी, तो ‘ब्रह्म’ को जान लिया।

125.

‘ब्रह्म’ अज्ञेय है। ‘ब्रह्म’ को सीधे-सीधे नहीं जाना जा सकता। हाँ, दुनिया को जाना जा सकता है। तुम दुनिया को जान लो, तो समझ लो तुमने ‘ब्रह्म’ को जान लिया।

126.

जो दुनिया को जान ले, जो दुनिया की नेति-नेति कर ले, सो ‘ब्रह्मविद’ हुआ।

127.

ब्रह्म से एक हुए बिना, ब्रह्म की अनुकम्पा के बिना, तुम दुनिया को जान ही न पाते, दुनिया की नेति-नेति ही न कर पाते। तो जब भी कहा जाए कि – ‘ब्रह्म को जानो’, तो इसका अर्थ यही जानना कि दुनिया को समझना है। ये दुनिया चीज़ क्या है।

128.

‘ब्रह्म को प्राप्त’ करना है, अपनी सारी प्राप्तियों का यतार्थ जान लेना। प्राप्तियाँ तो तुम्हारे पास खूब हैं न? कोई है ऐसा जिसके पास कुछ भी न हो? जिसने कुछ भी कभी प्राप्त न किया हो? सबके पास बहुत कुछ है। तुम्हारे पास जो कुछ है, उसके यथार्थ को जानना ही है – ब्रह्म को प्राप्त करना।

129.

जो कुछ तुमने प्राप्त कर रखा है, उसके मूल में प्रवेश कर जाओ – ये क्या है? “मैं कौन हूँ जिसे ये प्राप्त करने की इच्छा उठी? और ये प्राप्त करके क्या मेरी इच्छा संतुष्ट सन्तुष्ट हुई?” – ये है ‘ब्रह्म की प्राप्ति’। क्योंकि जो कुछ तुमने प्राप्त कर रखा है, वो साफ़-साफ़ दिखाई ही तब देगा, उसका यथार्थ ही तब पता चलेगा, जब तुम ‘ब्रह्म को प्राप्त’ गये।

130.

‘ब्रह्म’ को तुम नहीं प्राप्त करते।
‘ब्रह्म’ को तुम प्राप्त हो जाते हो।

131.

तुम बहुत छोटे हो तृण बराबर, वो बहुत बड़ा है, अनंत। तुम उसे कैसे प्राप्त कर लोगे? रेत का कण, पर्वत को कैसे प्राप्त कर लेगा? बूँद सागर को कैसे प्राप्त कर लेगी? ‘तुम्हें’ प्राप्त होना होता है ब्रह्म को। ‘तुम्हें’ जाकर मिटना होता है। ‘ब्रह्म’ तुममें आकर नहीं मिट जायेगा। ‘ब्रह्म’ तुम्हारी छोटी-सी मुट्ठी में नहीं समा जायेगा। ‘तुम्हें’ मिटना होता है, उसे जीतना होता है।

132.

तुम ‘उसे’ प्राप्त हो जाओ।
इसी को ‘बोध’ कहते हैं, ‘समाधि’ कहते हैं, ‘भक्ति’ कहते हैं, ‘समर्पण’ कहते हैं।
तुम जाओ, और उसमें मिट जाओ, क्योंकि बेचैन तुम हो।
इसी में तुम्हारी भलाई है।

133.

वो क्या आयेगा तुम्हारे पास? अनंत है वो। इधर-उधर हिलेगा-डुलेगा भी कैसे, पूरा ही है। जब तुम कहते हो, “आओ मेरे पास”, कैसे आएगा? उसकी मजबूरी समझो। वो कहीं जाना चाहे, तो जा ही नहीं सकता। क्यों? क्योंकि हर जगह वो पहले ही मौजूद है। वो कहीं छुपना चाहे, तो छुप भी नहीं सकता। क्यों? क्योंकि वो कहीं से हट ही नहीं सकता। वो ही वो है।

134.

“मैंने अब अनिवार्य के आगे, अवश्यम्भावी के आगे घुटने टेक दिये”,
“मैं प्रस्तुत हूँ, मैं समर्पित हूँ”

– ये है ‘ब्रह्म को प्राप्त करना’।

135.

तो तुम्हारा मन किसी दिशा में भाग रहा है, तुम मन की दिशा को परिवर्तन देना चाहो, या उलट देना चाहो, इससे अगर तुमको लाभ होगा भी तो आंशिक होगा।
मात्र दर्शन, विशुद्ध अवलोकन, आंशिक लाभ से कहीं ज़्यादा लाभ देता है।

136.

‘कुविचार’ से ‘सुविचार’ की ओर जाना कोई बड़ी बात नहीं। असली घटना तब घटती है जब तुम ‘कुविचार’ के सिर्फ दृष्टा हो। थोड़ी छटपटाहट उठेगी। क्योंकि हम दृष्टा नहीं, कर्ता होना चाहते हैं। और कर्ता कहता है, “अगर कोई गलत चीज़ पता लगी है, तो उसको ठीक एक्रो न। देख क्या रहे हो?” कर्ता कहता है, “अगर कहीं कुछ गलत हो रहा है, तो उसको ताके क्या जा रहे हो, देखे क्या जा रहे हो, पकड़ के बदल दो, ठीक कर दो”।

137.

दृष्टा कहता है, “नहीं। बदलना मेरा काम नही। मेरा काम है – जानना। कर्तत्व स्वभाव नहीं है, बोध स्वभाव है। मेरा काम है जानना। मैंने जान लिया, अब जो बदलना होगा, स्वयमेव बदलेगा। मैंने जान लिया, अब जो बदलना होगा, स्वयमेव बदलेगा”।

श्रद्धा चाहिये। खतरा है। पता नहीं बदले, न बदले। और बदल भी गया, तो अब न जाने क्या बन जायेगा।

138.

जो गलत है, उससे हम इतना घबराते हैं, उसे बदलने  के इतने इच्छुक रहते हैं, कि उसको देखा नहीं की उसपर आघात किया।

139.

हम ‘करने’ को इतने उतावले रहते हैं, कि हम करे बिना जान ही नहीं पाते।
हमारे लिये ‘विशुद्ध बोध ‘जैसी कोई चीज़ होती नहीं है।
हमें तो कुछ खबर लगी नहीं, कि हमने क्रिया करी।
पता लगा नहीं, कि प्रतिक्रिया हुई।

140.

तुम बिना प्रतिक्रिया के, अगर संयमित रह सको। श्रद्धा और साहस से, बस जानते रह सको, कि ये सब हो क्या रहा है, तो फिर ये प्रतिक्रिया की ज़रुरत नहीं पड़ती, फिर सम्यक कर्म अपनेआप होता है। और वो इतना सुन्दर, इतना बेहतरीन कर्म होता है, जैसे की तुमने किया ही न हो। जैसे की करने वाला कोई और हो।

तुम खुद हैरान रह जाओगे। तुम कहोगे, “अगर मैं प्रतिक्रिया करता, अगर मैं सुधार कि दिशा में कोई कदम उठाता, तो थोड़ा बहुत ही कुछ कर पाता। और ये देखो, अपनेआप ही ये क्या हो गया”।

141.

अगर वास्तव में तुम आना ही चाहते हो भगवान की शरण में, तो तुम्हें बागडोर उन्हीं को सौंपनी पड़ेगी। मालकियत उन्हीं को देनी पड़ेगी। फिर वही फैसला करेंगे।

142.

अध्यात्म इसीलिये नहीं होता कि तुम्हारे अरमान पूरे हो जाएँ।
अध्यात्म इसलिए होता है कि अहंकार सत्य के सुपुर्द हो जाये।
अहंकार के अरमानों को पूरा करने के लिये नहीं है अध्यात्म , अहंकार के विसर्जन के लिये है।
ऊपर-ऊपर से लीपा-पोती करने के लिये नहीं है अध्यात्म।
मूल परिवर्तन करने के लिये है।

143.

अध्यात्म ये नहीं करता कि तुमने गलत नौकरी पकड़ रखी है, और तुम उस गलत नौकरी में ही बढ़िया कर्मचारी बन जाओ।

अध्यात्म इसीलिये होता है कि अगर गलत नौकरी है, तो उसे छोड़ ही दो,  दूसरी करो।
अध्यात्म गलत को सुचारू तरीके से चलाये रखने के लिये नहीं होता। वो गलत का त्याग ही करने के लिये होता है, ताकि तुम सही में प्रवेश कर सको।
अध्यात्म इसीलिये थोड़े ही होता है कि शराब भी पियो, और नशा भी न चढ़े। सिगरेट भी पीयो, कैंसर भी न हो।
अध्यात्म इसीलिये होता है ताकि सिगरेट, शराब छूट ही जाये।

144.

अध्यात्म इसीलिये नहीं है कि गलत जीवन का सही अंजाम तुम्हें मिलता रहे।
अध्यात्म इसीलिये है ताकि तुम गलत जीवन को त्याग कर सही जीवन में प्रवेश कर सको।

145.

शिव से शांति माँगो, सत्य माँगो, बोध माँगो – ये समझ में आता है।
क्योंकि शिव शांति स्वरूप हैं, सत्य स्वरूप हैं, बोध स्वरूप हैं।
जिन कामों का सत्य से कोई सम्बन्ध नहीं, उन कामों को अध्यात्म से क्यों जोड़ते हो?

146.

किसी एक क्षेत्र में जाओ, जहाँ प्रेम से पढ़ सको, काम कर सको, और फिर वहाँ पूरी सामर्थ्य से जुटो। अध्यात्म इसीलिये नहीं होता कि तुम्हारे गलत निर्णय के भी सही परिणाम लेआ दे ।

लोगों की अक्सर यही उम्मीद होते है कि – “काम तो हम सारे ही गलत कर रहे हैं, राम तू इसका अंजाम  दे दे”। ऐसा नहीं हो सकता। गलत काम का सही अंजाम राम भी नहीं देगा तुमको।
अध्यात्म इसीलिये होता है, ताकि तुम अपने गलत छोड़ दो।

147.

अध्यात्म इसीलिये नहीं है कि गलत निर्णय का सही परिणाम हो जाये।
अध्यात्म इसीलिये है ताकि तुम सही निर्णय कर सको।

148.

सब रास्ते खुले हैं।
पर जो करो, ज़रा होश और ईमानदारी से करो।