पढ़ाई में मन नहीं लगता? || आचार्य प्रशांत (2019)

पढ़ाई में मन नहीं लगता

प्रश्न: आचार्य जी, मैं पढ़ना भी चाहता हूँ, लेकिन फिर भी मन नहीं लगता। ऐसा क्यों? क्या करना चाहिये कि पढ़ाई में मन लगे?

आचार्य प्रशांत जी: क्यों लगे मन?

प्रश्नकर्ता: परीक्षा पास करने के लिये ।

आचार्य जी: क्यों करनी है परीक्षा पास?

प्रश्नकर्ता: नौकरी के लिये।

आचार्य जी: क्यों करनी है नौकरी?

प्रश्नकर्ता: क्योंकि घरवाले ऐसा चाहते हैं।

आचार्य जी: उनकी चाहत क्यों पूरी करना चाहते हो?

प्रश्नकर्ता: ज़रूरतें भी होती हैं।

आचार्य जी: नहीं मैं नहीं समझा। उनकी चाहत क्यों पूरी करना चाहते हो?

प्रश्नकर्ता: क्योंकि घर में पैसों की ज़रुरत है।

आचार्य जी: पर पैसा कहीं और से आता दिख रहा है।

प्रश्नकर्ता: नहीं।

आचार्य जी: नहीं आता दिख रहा है, तो मत आने दो पैसा। जब तंगी होगी, तो खुद ही कुछ करोगे।

कोई मुझसे कहे, “मुझे प्यास बहुत लगी है, और मैं पानी उठाकर पी भी नहीं रहा”, तो वो मुझे ही बुद्धू बना रहा है। कोई मुझे कहे कि – “घर में ज़रुरत बहुत है पैसे की, पर मैं कमा नहीं रहा”, तो या तो उसका एक वक्तव्य झूठ है, या दोनों ही झूठ हैं। या वो बहुत चालाक है। अगर घर पर पैसों के ज़रुरत होती, तो तुमने कमा लिया होता न। कौन ऐसा है जिसे भूख लगी हो , और तो खायेगा नहीं? कौन ऐसा है जिसे प्यास लगी हो, तो पियेगा नहीं? निश्चित रूप से ज़रुरत है नहीं।

या वो जिसे तुम ‘ज़रुरत’ कह रहे है, वो कोई और चीज़ है। या असली कारण कुछ और है, तुम मुझे बता कुछ और रहे हो।

अभी मैं इसकी तो बात ही नहीं कर रहा, कि आदमी सत्य के केंद्र से चले। झूठ का केंद्र भी लाभकारी होता है। झूठ के पास भी एक सशक्त तर्क होता है। झूठ के पास भी एक सशक्त तर्क होता है- स्वार्थ का।

अभी तो मैं तुमसे परमार्थ की बात कर ही नहीं रहा, सत्य की तो बात कर ही नहीं रहा। मैं तो ये देख रहा हूँ कि तुम स्वार्थ पर भी नहीं चल रहे हो। न परमार्थ पर चल रहे हो, न स्वार्थ पर चल रहे हो, तो तुम चल कहाँ रहे हो?

निश्चित रूप से, जब परमार्थ का केंद्र नहीं होता है, तो स्वार्थ का होता है। हाँ, स्वार्थ तुमने कहाँ बैठा रखा है, तुम ये भी मेरे सामने ज़ाहिर नहीं करना चाहते।

प्रश्नकर्ता: अध्यात्म की तरफ।

आचार्य जी: बेटा, अध्यात्म तो परम स्वार्थ सिखाता है। जो छोटा-मोटा स्वार्थ भी पूरा न कर पा रहा हो, वो परम स्वार्थ क्या पूरा करेगा?

पढ़ाई नहीं करनी है, तो गौर से देख लो कि क्या आवश्यक है जीवन में।

अगर रोटी आवश्यक है, तो देख लो कि पढ़ाई के बिना भी कैसे कमा सकते हो। कोई ज़रूरी थोड़ी ही है कि पढ़-लिख कर ही रोटी कमाई जाये। और भी तरीके हैं, उनसे कमा लो।

और पाओ कि रोटी आवश्यक नहीं है, घरवाले ज़बरदस्ती धक्का दे रहे हैं, तो मना कर दो हाथ जोड़कर कि नहीं पढ़ना। और पाओ कि रोटी के लिये ही सही, लेकिन पढ़ना ज़रूरी है, तो पढ़ो बैठकर।

भूखे को धर्मगुरु नहीं चाहिये समझाने के लिये कि – रोटी खा ले। उसका स्वार्थ काफी होता है। कोई भूखा आदमी आध्यात्मिक सत्संग में आकर बोले, “भूखा तो बहुत हूँ धर्मगुरुजी, पर रोटी नहीं खाता”। तो ये बात न भौतिक है, न आध्यात्मिक है, सिर्फ भ्रामक है।

आमतौर पर क्या होता है, मैं ये नहीं कह रहा कि तुम्हारे किस्से में भी ऐसा ही है, जबतक रोटी मिल रही है, कमाये कौन? इतना लम्बा रास्ता कौन ले रोटी का कि पढ़ाई करो, फिर परीक्षा पास करो, फिर नौकरी करने जाओ, फिर महीने के अंत में तनख्वाह कमाओ।

“कौन ये सब झंझट उठाये? संतों फकीरों ने कहा है न सीधा-सदा जीवन जीयो। ये सब तो हम झंझट उठाते ही नहीं मेहनत वगैहरा करने का”। वो सब झंझट तुम उसी दिन तक नहीं उठाते, जिस दिन तक घर का संचित पैसा तुम्हारे लिये उपलब्ध है। जिस दिन वो पैसा उपलब्ध होना बंद हो जायेगा, उस दिन श्रम अपने आप होना बंद हो जायेगा।

इसमें कोई आध्यात्मिक पहलू नहीं है। तुम्हें यही करना है, तो करो फिर। परेशानी का नकाब क्यों ओढ़ते हो फिर। पाँच-सात साल घर की जमापूँजी पर ऐश करो फिर। जिन्होंने जमा किया था, वो भी कौन-से होशियार लोग थे। उन्हें पता ही होता कितना जमा करना है, और किसके लिये जमा करना है, तो उनकी जमा की हुई पूँजी का ये अंजाम हो भी नहीं रहा होता। तो अच्छी बात है। उन्होंने जमा किया, तुम उड़ा दो। उड़ा देने के बाद अपनेआप ही ये नौबत आ जायेगी कि मेहनत करनी पड़ेगी।

इसमें भी कोई दिक्कत नहीं है। पर ग्लानि भाव मत पालो न। सीधे-साढ़े घोषणा करो कि  -“हम कमाई नहीं करते हैं, हम खाते हैं घर बैठकर”। ऐसे भी बहुत हैं। फिर उनको जीवन सिखाता है आगे।

और अगर वास्तव में ये ललक उठ रही है कि जीवन को सार्थक करना है, जो पाने योग्य है उसे पाना है, तो फिर सवाल जवाब हटाकर के, सीधे-सीधे श्रम करो।


शब्द-योग सत्र से उद्धरित। स्पष्टता हेतु सम्पादित। विडियो सत्संग देखें:पढ़ाई में मन नहीं लगता? || आचार्य प्रशांत (2019)

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