किसी बहुत बड़ी चीज़ के साथ व्यस्त हो जाओ || आचार्य प्रशांत (2018)

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प्रश्न: आचार्य जी, कभी-कभी घबराहट-सी होती है, और अचानक गुस्सा आ जाता है। समझ नहीं आता क्या करूँ। कृपया मार्गदर्शन करें ।

आचार्य प्रशांत जी: कोई बात नहीं।

गुस्सा आना कोई बुरी बात नहीं है, गुस्से के पीछे कारण सही रखो।

जब लगता है कि कुछ मिल नहीं रहा है, जब लगता है कि कुछ खो रहा है, किसी लक्ष्य को चाहा था और उसकी प्राप्ति नहीं हो रही, तो गुस्सा उठता है।

गुस्से की बात छोड़ो, गुस्से के नीचे वो लक्ष्य है, वो इच्छा, कामना है, जिससे जुड़े हुए हो।

लक्ष्य ठीक रखो।

जो ऊँचे से ऊँचा चाह सकते हो, उसको चाहो।

फ़िर वो न मिले, और गुस्सा आ गया, तो कोई बात नहीं।

दिक्क़त तब है जब व्यर्थ, छोटी चीज़ चाही, और फिर वो चीज़ नहीं मिली तो गुस्सा किया।

पहले तो माँगी ही ऐसी चीज़ जो क्षुद्र है, टुच्ची है, बिलकुल अपने आप को उसमें निवेशित कर दिया। छोटी ही चीज़ के साथ एकदम लिपट गए। और फिर वो छोटी चीज़ भी नहीं मिली।

पहला तो गुनाह ये किया कि वो छोटी चीज़ माँगी। और दूसरी बात ये कि अकर्णमन्यता ऐसी, अविवेक ऐसा कि वो जो ज़रा-सी चीज़ माँगी, वो भी नहीं मिली। और फिर गुस्सा दिखा रहे हैं, हाथ-पाँव पटक रहे हैं। ये बड़ा अशोभनीय लगता है।

कुछ ऐसा माँगो जो तुम्हें अपने लिये संभव ही न लगता हो। फिर तुम्हें हार भी मिलेगी अपने प्रयत्न में, तो कोई बात नहीं। फिर तुम्हें आश्चर्य होगा कि – गुस्सा उठता क्यों नहीं? या उठता है तो इतना क्षीण क्यों है? या उठता भी है, तो इतना सात्विक क्यों है? 

एक क्रोध होता है शराबी का कि ठेके पर खड़ा है, बोतल नहीं मिल रही, और मुँह से झाग आ रहा है, गाली -गलौच कर रहा है। एक वो क्रोध है। और एक वो क्रोध था कृष्ण का, भीष्म के ऊपर रथ का पहिया उठाकर दौड़े थे।

क्रोध-क्रोध में अंतर होता है।

धर्म की रक्षा हेतु तुम्हें क्रोध आ गया, तो वो क्रोध ‘सात्विक’ कहलाता है।

और नशा नहीं मिल रहा, गुस्सा उबाल रहा है, तो ये क्रोध बड़ा निकृष्ट है।

तो बात क्रोध की नहीं है, बात कामना की है। 

तुम माँग क्या रहे हो? 

मैं कह रहा हूँ – जो ऊँचे से ऊँचा है, जो बिलकुल ठीक है सही है, उसको माँगो।

फ़िर जो होगा, देखा जाएगा। 

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, तो जीवन में छोटे-छोटे लक्ष्य ही रखें ताकि वो आसानी से पूरे हो जाएँ?

आचार्य प्रशांत जी: क़दम तो हमेशा छोटा ही होता है। बड़ा भी क़दम रखोगे, तो वो भी है तो छोटा-सा ही। पहाड़ थोड़े-ही लाँघ जाओगे एक क़दम में।

दृष्टि किधर को है? लक्ष्य कौन है? ध्येय क्या है? किसको पाने के लिए बढ़े जाते हो? किसका आसरा है? प्रेम किससे है? दिल में कौन बसा हुआ है? – सवाल ये है। क़दम तो हमेशा छोटा होगा। इस वक़्त तो चाहे तुम हो, चाहे मैं हूँ, जो करेंगे, वो छोटा होगा।

बाहर की तो प्रत्येक गतिविधि छोटी ही होती है।

संसार में सब कुछ छोटा है तो, संसार में तुम जो क़दम लोगे, वो भी छोटा ही होगा।

प्रश्न ये है कि – दिल में कुछ बड़ा है या नहीं? किसी बड़े की तरफ़ बढ़ रहे हो या नहीं? 

अब ये बात समझना।

संसार में जो कुछ है, वो छोटा है। और बढ़ना बड़े की ओर है। किसी ऐसे की ओर बढ़ना है जो संसार का हिस्सा नहीं, जो पदार्थ नहीं, जो इंद्रियगत नहीं। जिसका कोई मूल्य नहीं लगाया जा सकता, जिसे नापा-तौला नहीं जा सकता। उसकी ओर जब बढ़ रहे हो, तो निशाना तुमने किसी बड़े पर लगाया। और संसार पर अगर तुमने निशाना लगाया, तो वो चीज़ छोटी ही होगी।

हाँ, अपेक्षाकृत बड़ी हो सकती है। चट्टान ढेले से बड़ी होती है, बस तुलनात्मक रूप से। पर सीमित तो होती ही है न? और जो कुछ सीमित है, उसके साथ कुछ मज़ा नहीं।

प्रश्न २: आचार्य जी, हमारे जीवन में कुछ -न -कुछ ऐसे पल आते हैं जो हमें बहुत दुःख देते हैं। जब तक सब सही चल रहा होता है, तब तक वो याद नहीं आते। पर जहाँ थोड़ा-सा दुःख आया, अकेलापन आया, तो वो सब पल याद आ जाते हैं? हम कैसे उसकी निरर्थकता देखें?

आचार्य प्रशांत जी: व्यस्त हो जाओ।

किसी बहुत बड़ी चीज़ के साथ व्यस्त हो जाओ। उसी को मैं कहता हूँ – अपने आप को सत्य में डुबो दो। छोटी बातों का ख़याल आना अपने आप बंद हो जाएगा। छोटी-छोटी बातें फिर स्मृति में कूदेंगीं-फाँदेंगीं नहीं। बड़ा-सा हाथी कोई घुस आए इस कमरे में, हम सब छोटे-छोटे लोग अपने आप बाहर हो जाएँगे। तो जीवन में कोई हाथी घुसा लो, तो ये सब छोटे-मोटे उपद्रव अपने आप मर जाएँगे, बाहर हो जाएँगे।

तुम गए चिकित्सक के पास, सिर दर्द हो रहा है। उसने जाँच की, उसने कहा, “मुझे तो लग रहा है आपकी आँतों में ट्यूमर है,” सिर दर्द कहाँ गया अब?

तो बड़ी वाली परेशानी मोल ले लो।

परमात्मा सबसे बड़ी परेशानी है।

मिलता ही नहीं।

तो तुम उतनी बड़ी परेशानी उठा लो, उतनी बड़ी चुनौती।

फ़िर ये छोटी-मोटी चुनौतियाँ सब अकारक लगेंगी।

अप्रासंगिक हो जाएँगी।

और जिसके पास कुछ बड़ा नहीं होता, उसको छोटी-छोटी चीज़ें बड़ी लगने लगती हैं।

“ए.सी. छब्बीस पर क्यों चल रहा है, बाईस पर क्यों नहीं?” इस बात पर ही दो घंटे संग्राम हो सकता है। देखा है लोगों को? किसी भी बात पर हो सकता है क्योंकि कुछ बड़ा नहीं है न, तो छोटी-छोटी बातों पर ही। अब जब तुम टी.वी. को लेकर लड़ रहे हो, और उसी समय आग लग जाए, तो टी.वी. बिलकुल भूल जाएगा, क्योंकि अब कुछ बड़ा हो गया।

तुम उसके साथ हो लो, जो आग से भी, अग्नि से भी बहुत बड़ा है। जो अग्नि के भी प्राणों का अधिष्ठाता है।

फिर कुछ नहीं डराएगा।


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