कष्ट का निवारण पता होने पर भी कष्ट से मुक्ति क्यों नहीं मिलती? || आचार्य प्रशांत (2019)

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प्रश्न: आचार्य जी, जब हम किसी कष्ट में होते हैं, तो हमें कष्ट का निवारण पता होता है कि वहाँ से हो सकता है। लेकिन ये पता होने के बावजूद हम उस पर ध्यान नहीं देते हैं।

ऐसा क्यों?

आचार्य प्रशांत जी: नहीं पता है बेटा। कल सुन रहे थे न, गुरु साहब गा रहे थे, “सब सुख दाता राम है”? तुम्हारे जीवन में जब सुख आता है, तुम्हें ये ख्याल आता है कि तुम्हें ये सुख उस व्यक्ति से नहीं, राम से मिल रहा है? ईमानदारी से बताना। किसी दोस्त की संगति में हो, और अच्छा लग रहा है, तो यही कहते हो न कि – “दोस्त की संगति में आज अच्छा लग रहा है”? या ये कहते हो, “आज ‘राम’ के साथ था, तो अच्छा लगा’? सुख का कारण तुमने किसको बना डाला? दोस्त को। राम याद आते हैं क्या उस वक़्त?

प्रश्नकर्ता: वो ऐसे याद आते हैं, कि ‘राम’ ने ही भेजा है उस दोस्त को।

आचार्य प्रशांत जी: तभी फिर दोस्त के लिए रोते और तड़पते हो, ‘राम’ के लिए तो नहीं।

प्रश्नकर्ता: ऐसा नहीं। राम के लिए भी रोते हैं।

आचार्य प्रशांत जी: अच्छा, अपनी ज़िंदगी को देखो। अपनी ज़िंदगी को देखो को, कि किसके लिए तड़पे हो, किसका नाम ले-लेकर रोए ह।

(हँसी)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, वो तो है ही। उसके साथ-साथ तड़प ‘राम’ की भी तो है।

आचार्य प्रशांत जी: उसके साथ-साथ नहीं हो सकती। याद रखना होता है – “कुछ सुख दाता राम है” – नहीं, “सब सुख दाता राम।” साथ-साथ नहीं होता। साथ-साथ तो घपला हो गया।

तुम्हारे जीवन में जो भी कुछ सुन्दर है, वो ‘वहाँ’ से आया है। ये बात सुख के पलों में याद नहीं रह जाती। तब लगता है कि सुख तो किसी स्त्री से मिल रहा है, या पैसे से मिल रहा है, या किसी जगह से मिल रहा है। फिर इसीलिए आदमी रोता है, कलपता है, दिल टूटता है। सुख के समय पर याद रख लो कि – ये हर चीज़ किसकी मेहरबानी से है – तो फिर दुःख नहीं मिलेगा न।

(ढलते हुए सूर्य की ओर इंगित करते हुए) देखो गया।

प्रश्न २: आचार्य जी, ये चीज़ देखने में आती है कि सोचते हम कुछ भी हों, लेकिन आपसे बात करने में बहुत सारी चीज़ें बाहर निकल आती हैं। और जाने-अनजाने बहुत-सी ऐसी गूढ़ चीज़ें निकलती हैं, जिनका कभी अहसास भी नहीं हुआ होता है। अचैतन्य में छिपी सारी चीज़ें पता चल जाती हैं, इससे अपना ही झूठ पता चल जाता है।

श्रोता १ : आचार्य जी जब झाड़ू मारते हैं, तो धूल तो दिखती ही है।

आचार्य प्रशांत जी: अपने आप ही नहीं निकल जाती, निकाली जाती हैं। निकालनी पड़ती है।

श्रोता ४: आचार्य जी, आज जब शिविर संपन्न होने जा रहा है, तो लौटने का बहुत उतावलापन नहीं है। उतावलापन नहीं है – इससे भी डर लग रहा है।

आचार्य प्रशांत जी: तो लगने दो। बहुत कुछ लगेगा। जब तक ज़िंदा हो, न जाने क्या-क्या लगेगा? सब का ज़िक्र करते फिरोगे क्या?

जब तक जीव हो, हस्ती है तुम्हारी, देह है तुम्हारी, मन है, तो तमाम तरह के छोटे-बड़े अनुभव लगातार अपनी उपस्थिति का अहसास दिलाते रहेंगे। हमें नहीं करनी है उनकी बात। वो आए, ठीक है। “कुछ आया होगा, हम अपना काम कर रहे हैं।”

(पीछे गंगा की बहती हुई धारा की ओर इंगित करते हुए)

अब पीछे ये धारा बह रही है न? ये समझ लो, ये अनुभव की धारा है। ये बह भी रही है, और थोड़ा शोर भी कर रही है। अपने होने का अहसास करा रही है न? हमें पता है कि ये है, ऐसा नहीं है कि हम अनुभव-शून्य हैं। मन में इसकी संवेदना हो रही है, लेकिन हम उसका संज्ञान नहीं ले रहे, क्योंकि हम अभी कुछ और कर रहे हैं जो बहुत ऊँचा है।

जब हम बैठे थे, तब बढ़िया, नर्म धूप थी। अच्छा लग रहा था। अब ठण्ड बढ़ रही है। ये सब अनुभव सब को हो रहे हैं।या नहीं हो रहे? पर उनकी बात क्या करनी।

जब कुरुक्षेत्र में हो ही, तो क्या बताते फिरोगे कि – यहाँ खरोंच आ गई, और फलाना बाल टूट गया। जब संघर्ष में हो ही, तो खरोंच भी आयेगी, दर्द भी होगा, खून भी बहेगा। बाल क्या, हाथ भी टूटेगा। बार-बार क्या ज़िक्र करना? असली चीज़ का ज़िक्र करो न – लड़ाई कहाँ तक पहुँची।

छोटे की बहुत बात करना, बड़े की उपेक्षा करने का बहाना बन जाता है।

एक बार जान लो कि कोई चीज़ छोटी है, फ़िर उसको छोटे जैसा ही व्यवहार दो।

(पुनः ढलते सूर्य की ओर इंगित करते हुए)

देखो अब क्या होगा? मकान सूरज जो ढक लेगा। कितना छोटा मकान है, और ये सूरज को ढक लेगा। कोई मुकाबला है मकान का और सूरज का? लेकिन अब मकान हावी हो जाने वाला है। आचार्य जी को उठना पड़ेगा, सूरज को ढलना पड़ेगा। मकान का वक़्त आ गया है।

छोटी -सी चीज़ से भी अगर आसक्ति है, तो वो छोटी-सी चीज़ इतने बड़े सूरज पर भी भारी पड़ती है।

छोटी -सी आसक्ति भी सत्य पर भारी पड़ जाती है।

अपनी छोटी-सी आसक्ति के कारण, तुम सत्य को छोड़ने को तैयार हो जाते हो।

मकान के पीछे सूरज छुप जाता है।

प्रश्नकर्ता २: लेकिन आचार्य जी, जब थोड़ी देर में काँपने लगेंगे, तो यही मकान याद आएगा।

आचार्य प्रशांत जी: अरे पागल! तुझे जितनी गर्मी मिलती है, मकान के अंदर भी, वो तुझे पता है कहाँ से आती है? सूरज से ही आती है।

प्रश्नकर्ता २: वो तो पता है।

आचार्य प्रशांत जी: तो फ़िर ?

आचार्य जी: कह रहे हो कि जब ठिठुरने लगोगे तो मकान याद आएगा। मकान के अंदर जो हीटर जलाते हो, उसकी ऊर्जा कहाँ से आती है? मकान से आती है क्या?

प्रश्नकर्ता २: नहीं। ऐसा तो नहीं।

आचार्य प्रशांत जी: दुनिया की, पृथ्वी की ऊर्जा का छोटे-से-छोटा हिस्सा कहाँ से आता है? सूरज से आता है। पर इतनी बात तुम्हें दिखाई नहीं देती। तुम्हें लगता है मकान के अंदर हीटर जल रहा है, तो वो गर्मी मकान की है। वो गर्मी मकान की नहीं है, वो गर्मी सूरज की है। सूरज की कृपा है कि वो हीटर जल रहा है।

पर सूरज के लिये तुम्हारे मन में कोई भावना ही नहीं, कोई कृतज्ञता ही नहीं। तुरंत बोल उठे, “जब ठिठुरेंगे, तब मकान ही चाहिये न।” और अभी बोल रहे थे, “गुरु से बार-बार मिलने की ज़रुरत ही क्या है? हमें तो लगता है गुरु हर वक़्त साथ ही हैं।” अपनी कल्पनाओं के गुरु को लिए रहो। वो कल्पनाओं का ‘गुरु’ तुम्हारे ही जैसा है। तुम अगर मेरे सामने न बैठे न होते, तो अभी कौन तुम्हारा अँधेरा मिटाता? पर तुम्हारा तो कहना है कि हमें गुरु की ज़रुरत ही नहीं। गुरु तो हमारे साथ हैं सर्वदा।

वो जो तुम्हारे साथ गुरु है, वो मैं नहीं हूँ। वो तुम्हारी अपनी ही कल्पना है, जो तुम्हारे ही तल पर है। वो तुम्हारे काम नहीं आने की। हीटर तो छोड़ ही दो, तुम्हारे शरीर की जो गर्मी है, वो कहाँ से आ रही है? सूरज से। ये जो पानी बह रहा है, पानी को बहने के लिये ऊर्जा चाहिए न? ये जो पानी बह रहा है, ये किसकी ऊर्जा से बह रहा है? सूरज की ऊर्जा से बह रहा है।

तुम भूल जाते हो कि ये सब कुछ किसके दम से है?

कहा तो – मकान बड़ा हो जाता, सूरज छोटा हो जाता है।


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