धन की क्या महत्ता है? || आचार्य प्रशांत, ओशो पर (2018)

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प्रश्न: “दरिद्र को नारायण कहने से ही इस देश में दरिद्रता फैल गई है। यदि आप दरिद्रता और गरीबी को सम्मान देंगे, तो आप कभी-भी मुक्त नहीं हो सकते। मेरा संन्यासी ऐसा होना चाहिए जो पहले धन पर ध्यान दे, फिर ध्यान की चिंता करे।”

ओशो के वचन हैं। आचार्य जी, कृपया इनका आशय स्पष्ट करें।

आचार्य प्रशांत जी: क्या है ‘धन’? और कैसे अर्जित होता है वो?

धन अकस्मात नहीं आ जाता।

हाथ का मैल नहीं होता वो, भले ही हमारा प्रचलित मुहावरा ऐसा कहता हो।

धन आता है, उसके पास, जो दुनिया को समझता है।

धन कमाना एक कला है, जो माँग करती है कि आपमें  जगत के दाँव-पेंचों की समझ हो।

जो दुनिया को नहीं जानता, वो दुनिया में धन नहीं कमा सकता।

और ‘दुनिया को जानने’ का अर्थ होता है – मन को जानना।

एक अच्छा व्यापारी, एक चतुर व्यापारी, बड़ी सहजता से अध्यात्म में प्रवेश कर जाएगा, क्योंकि उसने मन को जाना है। वो जानता है कि ग्राहक कैसे रीझता है, वो जानता है ‘मुनाफे’ का अर्थ। वो जानता है कि माल कहाँ से आता है, माल कहाँ को जाता है। वो जानता है कि हर चीज़ कहाँ से उठती है, और हर चीज़ का क्या अंजाम होता है। उसे पता है कि आदमी की दृष्टि किस चीज़ को मूल्य देती है, और किस चीज़ के पीछे पैसा खर्चने को तैयार हो जाती है।  

संतों का एक वचन है, “साईं मेरा बानिया, सहज करे व्यापार। बिन दांडी बिन पालड़ै, तोले सब संसार।”

जिसने पूरे संसार को ही तोल लिया, उस बनिये को वो ‘परमात्मा’ कहते हैं। हम छोटे-मोटे बनिये हैं – जिसकी व्यापार में रुचि, सो बनिया। व्यापारी तो हम सभी हैं, लेनदेन में लगे ही रहते हैं। कुछ भी देने से पहल  ये फ़िक्र करते हैं न कि बदले में क्या मिल रहा है? तो हम सब व्यापारी हैं। जो ठीक-ठीक जान ले कि क्या दिया और क्या लिया, उस महा-व्यापारी को ‘परमात्मा’ कहते हैं।

हम ठीक-ठीक जान नहीं पाते। हम गलत सौदा कर जाते हैं। हमें चीज़ों का मूल्य नहीं पता, क्योंकि हमें अपना मूल्य नहीं पता, और किसी चीज़ का मूल्य लगाने के लिए हमें पहले ये पता होना चाहिये कि वो चीज़ है क्या। अपना मूल्य लगाने के लिए पहले ये पता होना चाहिए कि – ‘मैं हूँ कौन?’। दुनिया का मूल्य पता लगाने के लिए हमें पता होना चाहिए कि ‘दुनिया’ शय क्या है। हमें कुछ पता नहीं, तो हम उलटे-पुल्टे मूल्य लगाते हैं।

जिस चीज़ की कौड़ी की बिसात है उसे हम लाखों के भाव खरीद लेते हैं, और जो हो अनमोल हीरा, उसे हम धूल के भाव बेच देते हैं।

वास्तव में ध्यान की ज़रुरत ही नहीं है, तुम इस दुनिया के चतुर व्यापारी बन जाओ बस। तुम जान लो क्या ख़रीदने लायक है, तुम जान लो क्या बेच देने लायक है। कैसा ध्यान? करोगे क्या ध्यान करके?

परमात्मा का ही तो विस्तृत रूप है संसार।

जो संसार को जान गया, वो परमात्मा में प्रवेश कर गया।

उलझता तो संसार में वही है न जो संसार को समझ नहीं पाया।

गणित का सवाल होता है तुम्हारे सामने, उसमें कब उलझ जाते हो? जब हल न होता हो, जब समझ न आता हो। हमने बड़ा व्यर्थ चित्र बैठा लिया है मन में। हम कहते हैं कि – “जो दुकान पे बैठा, जो व्यापार में गया, वो संसार में उलझ गया।” न, आवश्यक नहीं है।

जो दुकान को नहीं समझा वो उलझ गया, जो व्यापार को नहीं समझा, वो उलझ गया। जो व्यापार को समझ गया, वो तो पार हो गया। जो दुकान को समझ गया, वो दुकान के पार हो गया। अब वो दुकान पे बैठा रहे, क्या अंतर पड़ता है? वो पार गया। धन काफ़ी है, ध्यान की आवश्यकता ही नहीं है।

ओशो ने कहा, “धन पहले, ध्यान बाद में,” मैं कह रहा हूँ कि ध्यान की ज़रुरत ही नहीं है, धन काफ़ी है। बस तुम्हें पता होना चाहिये कि असली धन कौन-सा है। अब ध्यान का करोगे क्या?

ध्यान तो होता है परमात्मा तक जाने के लिए, और परमात्मा ही असली धन है।

जब धन ही मिल गया, तो अब ध्यान का करोगे क्या?

ध्यान तो मार्ग है धन्यता का।

ध्यान वो मार्ग है, जो तुम्हें असली धन तक पहुँचाता है।

जब वो असली धन ही मिल गया, तो ध्यान का क्या करोगे?

असली धन ही काफ़ी है।

“पायो जी मैंने, राम रतन धन पायो”

कमाने निकलो, ज़रूर कमाने निकलो। दुनिया से जूझने निकलो, अर्जित करने निकलो। और इरादा पूरे का रखो, बुलंद रखो। ये न कहो कि थोड़ा-बहुत कमाकर संतुष्टि मिल जाएगी। ये न कहो – “दुकान पर बैठे हैं, आज इतना सौदा हो गया, बहुत है। और ज़्यादा का क्या करना है?” ये मारती है बात व्यापारी को।

व्यापार पूरा हो। व्यापार इसीलिए करने निकले थे न कि मुनाफ़ा हो? तो जानो न फिर कि  ‘मुनाफ़ा’ बोलते किसे हैं। व्यापार में कब तुम्हें मज़ा आता है? जब भारी ‘लाभ’ हो। तो जानो न कि ‘लाभ’ किसे बोलते हैं। भारी लाभ के बाद भी अगर अभी और लाभ की आकांक्षा बची है, तो लाभ कुछ ख़ास भारी तो नहीं था। या था?

तो भारी लाभ कौन-सा हुआ? जिसके बाद लाभ की आकांक्षा तृप्त-सी हो जाए, कि कुछ ‘और’ लाभ हो गया। ऐसा लाभ कि सारे लाभ छोटे-मोटे लगते हैं। “पायो जी मैंने …….।” कुछ मिला, कुछ मिला। कुछ ऐसा मिला, उसको फिर ‘धन’  कहते हैं।

‘वो’ धन, और सांसारिक धन, समझना इस बात को, बहुत दूर तक साथ-साथ चलते हैं। परमात्मा का धन, और संसार का धन बहुत दूर-दूर तक साथ चलते हैं, क्योंकि संसार के भीतर ही तो गहरे प्रवेश करके परमात्मा तक पहुँचोगे।   

कमाते-कमाते एक दिन कमाने के पार निकल जाओगे, कमाना छूट जाएगा।

अरे! दो पैसा ‘कमाने’ की बात हो रही है, भीख की बात नहीं हो रही कि बिना किसी योग्यता के, बिना किसी पात्रता के बाज़ार में जाकर खड़े हो गए कि – “पैसा दे दो।”

कमाने के लिए जानते हो क्या चाहिए?

कमाने के लिए पहले तुम्हारे पास ऐसा कुछ होना चाहिये जिसको दुनिया क़ीमत रखे।

तुम जानते ही नहीं कि दुनिया किस चीज़ पर क़ीमत रखती है, तुम पैसा क्या कमाओगे।

बेच पाने के लिए आवश्यक है कि तुम ख़रीददार का मन पढ़ पाओ।

दूसरे का मन पढ़ पाने के लिए ये आवश्यक है कि पहले अपने मन का कुछ पता हो।

तुम इतने भोंदू हो कि तुम्हें अपने मन का कुछ पता नहीं, तुम अपना माल कैसे बेच पाओगे?

ग्राहक को समझा पाओ कि कोई चीज़ उसके लिए क्यों ज़रूरी है, उसके लिए तुम्हें पता तो होना चाहिए न कि किसके लिए क्या ज़रूरी है। तुम्हें आजतक यही नहीं पता कि तुम्हारे लिए क्या ज़रूरी है, तुम ग्राहक को क्या बता पाओगे कि तुम्हारे लिए क्या ज़रूरी है। जिनसे माल न बिकता हो, वो ये जान लें कि बड़े ही भोंदू हैं। वो अपने आप को इस सांत्वना में न रखें कि – “हम तो साहब संन्यासी हैं, पंडित हैं, और ये बेचना इत्यादि हमारे कद का काम थोड़े ही है।”

जो महा-पंडित होगा, वो महा-विक्रेता भी होगा। वो चुटकी में सामान बेचेगा।

अरे, पंडितों ने तो परमात्मा को बेच दिया भाई, तुमसे अपना माल नहीं बिकता। अब जब खड़े होना दुकान पर, कि बेच नहीं पा रहे हो, तो जान लेना जड़-भोंदू हो। कुछ जानते नहीं।

“साईं मेरा बानिया ……..”, भूलना नहीं।

व्यापार में, और उस पार में, एक बड़ा गहरा नाता है।

दुनिया को जीतना सीखो।

हरन्ते, भगोड़े, इनके लिए नहीं है अध्यात्म।

परमात्मा अस्वस्थ, और पंगु, और अशक्त लोगों को कोई विशेष पसंद नहीं करता।   

“नायं आत्मा बलहीनेन लभ्यो”

बलहीन को आत्मा का लाभ नहीं होता। और कौन-सा बल होगा? मनोबल की ही बात हो रही है। और एक ही मनोबल है। क्या? बोध, समझदारी। दुनिया को जान गए अगर तुम, तो कोई अध्यात्म अब शेष नहीं रहा तुम्हारे लिए। संसार को जान लिया, यही तो सत्य है।

‘संसार’ माने – व्यापार का अड्डा।

‘संसार’ माने – जहाँ हर कोई अधूरा है, और इसीलिए लेनदेन में लगा हुआ है।

संसार को जानना माने, संसार के व्यापार को जानना।

व्यापार को जानना माने – धन के क्षेत्र में अनाड़ी न होना।

मैं ये नहीं कह रहा कि धन-लोलुप हो जाओ, पर अनाड़ी न रहो धन के मामले में। क्योंकि जो धन के मामले में अनाड़ी है, दोहराना पड़ रहा है, ये बात कम कही गई है, जो धन के मामले में अनाड़ी है, वो दुनिया को लेकर अनाड़ी है।

धन संचित करने की बात नहीं कर रहा हूँ। सामर्थ्य होनी चाहिए धन कमाने की, अर्जित करने की, फिर छोड़ दो तो अलग बात है। और कोई भिखारी हो अगर, और कमाने की हैसियत ही न हो, और कहे कि – “नहीं, नहीं, रुपया तो हाथ का मैल है,” तो उसे कहो, “रगड़ हाथ को भई। थोड़ा मैल इधर भी दे-दे।”

और अकसर जो ऊपर से नीचे तक मैले होते हैं, क्योंकि साबुन ख़रीदने के पैसे नहीं होते, वही बताते हैं कि – “रुपया तो हाथ मैल है।” जिन्होंने कमाया होता है, वो जानते हैं कि ऐसे ही नहीं आ जाता। मेधा चाहिए, प्रतिभा चाहिए, ध्यान चाहिए, समर्पण चाहिए, तब दुनिया जीती जाती है।   

ओशो को अकसर कहा गया कि ये तो अमीरों के ही सरदार हैं (द रिच मैन्स गुरु)। पर ये अनुभव मेरा भी रहा है। जो बिलकुल ही बेहाल, फटेहाल होते हैं, उन्हें मेरा कहा भी समझ में आता नहीं। उन्हें कुछ भी समझ में आता तो फटेहाल क्यों होते? वो बुद्ध थोड़े ही हैं, वो महावीर थोड़े ही हैं, कि वस्त्र स्वयं स्वेच्छा से त्यागकर वन गमन किया है।   वो तो वो हैं, जिनमें ये कुव्वत नहीं है कि वस्त्र खरीद सकें ढंग के। इन्हें कुछ समझ में नहीं आता।

हमारा बड़ा स्वार्थ होता है ये कहानी बैठा लेने में कि जो गरीब है, वो इसीलिए गरीब है क्योंकि वो चालाक नहीं है, बेचारा ईमानदार है। और जो अमीर है, वो इसीलिए अमीर है क्योंकि वो रक्त-पिपासु है, और उसने गरीबों का शोषण किया है।

हकीकत ऐसी नहीं है।

ज़्यादातर लोग जिनके पास धन है, उनके पास धन इसीलिए है क्योंकि उन्होंने उसके पीछे मेहनत की है। एकाग्र हुए हैं। और एकाग्रता, समाधि की दिशा में भी एक कदम होता है।  

अगर आप कमाने के लिए एकाग्र हो सकते हैं, तो आप परमात्मा को पाने के लिए भी एकाग्र हो सकते हैं।

जो एकाग्रता जानता ही नहीं, जो धन भी नहीं कमा पा रहा, वो परमात्मा को क्या पाएगा?

जो धन भी नहीं कमा पा रहा, वो परमात्मा को क्या कमा पाएगा?

‘वो’ तो सबसे बड़ा धन है।

समाज के हर वर्ग के लोगों से मेरी बातचीत होती है। और मैं इस बात की पुष्टि कर रहा हूँ कि जो समाज में सफल और अग्रणी लोग हैं, वो अपेक्षाकृत ज़्यादा आसानी से समझ पाते हैं मैं जो कह रहा हूँ, क्योंकि उन्होंने सबकुछ देखा है। उन्होंने जय-पराजय देखी है, उन्होंने उतार-चढ़ाव देखे हैं, उन्होंने गँवाना देखा है, उन्होंने पाना देखा है।

और दरिद्र नारायण, उनको अगर मैं कहता हूँ कि – “सुनो, सबसे ऊँचा धन है परमात्मा,” उन्हें नहीं समझ आता, क्योंकि उन्हें तो अभी संसार का ही धन नहीं मिला। वो तो अभी संसार के ही धन के प्यासे हैं। उन्हें नहीं बात समझ आती।

एक उदाहरण और देता हूँ, ये छात्रों से सम्बंधित है। आज से तीन-चार साल पहले, मैं उन दिनों आई.आई. टी. दिल्ली में बोलने के लिए जाया करता था, और उन्हीं दिनों कुछ दूर-दराज के भी कॉलेज थे जिनमें जाया करता था। अमेठी जिले का भी एक कॉलेज था जहाँ जाता था।

आई. आई.टी. के छात्र हैं जिन्हें धन को लेकर, रोज़ी-रोटी को लेकर अपने मूल-निर्वाह को लेकर कोई चिंता नहीं, उन्हें पता है कि इतना तो अब सुलभ है, आँखमूँद कर मिलना है। उनसे मैं बात करूँ तो वो बात को समझें। वो बात को आगे बढ़ाएँ, जिज्ञासा को आगे बढ़ाएँ, और दिन-दिन भर बात हो। वो गहराई में जाने को तैयार। तैयार ही नहीं, उत्सुक। वो मुझे खीचें कि और बताईए कैसे, क्या, कुछ-भी क्यूँ।

आप उन वीडियो रिकॉर्डिंग्स को देखिये, मैं बोल रहा होता हूँ, और वो झुककर सुन रहे होते हैं, क्योंकि धन उन्होंने अर्जित किया है, धन अर्जित करने की उनमें पात्रता है। तो अब वो महा-धन की ओर आकृष्ट हो रहे हैं। मैं उनके सामने महा-धन का गीत गाता था। मैं उनकी भाषा में, परमात्मा और अध्यात्म लेकर आया था। वो उत्सुक होते थे, वो सुनते थे।

और उन्हीं दिनों मैं यहाँ से अमेठी तक की यात्रा कर, उस कॉलेज में बोलने जाऊँ, और जहाँ मैं कहूँ कि- “शांति सर्वोपरि है, बंधन से बचना, आज़ादी अपनी बेच मत देना,” तहाँ वो झन्ना के खड़े हो जाएँ। कहें कि – “ये क्या बात है।” कहें, “अरे, ये बेकार की बातें हैं। आप ये बताईए कि कहीं से पाँच हज़ार की नौकरी का इंतज़ाम हो सकता है।” सुनने को तैयार नहीं। मैं कहूँ कि तुम अपने आप को बहुत सस्ता बेच रहे हो, तुमने अपनी इतनी ही कीमत लगाई ‘पाँच हज़ार’, तो वो कहें कि हमारे साथ मज़ाक मत करिए।

और ये वो थे, बड़े अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है, जिनमें से ज़्यादातर पाँच हज़ार की नौकरी के भी काबिल नहीं थे। मैकेनिकल इंजीनियर को आप बैठाकर पूछते ‘बर्नौली थ्योरम’ क्या है, वो न बता पाता। बहुत आगे की बात कर दी मैंने। मैकेनिकल इंजीनियर को आप बैठाकर पूछते ‘टॉर्क’ की यूनिट क्या है, वो न बता पाता। ये पाँच हज़ार की नौकरी के भी हक़दार नहीं थे, और मैं इन तक परमात्मा ला रहा था। ये सुनेँगे कभी? मैंने जान का ज़ोर लगा दिया, और फिर लौटकर चला आया। मैंने कहा, “आप जीते। कण-कण में नारायण, हो तो तुम भी परमात्मा ही। जैसी तुम्हारी मर्ज़ी। उन्होंने मेरी नहीं सुनी।”

कहने लगे, “हमें तो ये पता था कि कोई आई.आई.टी, आई.आई.एम. वाला आ रहा है, हमें कुछ ऊँचीं बातें सुनने को मिलेंगीं। आप ये कैसी बातें कर रहे हैं? और आप हिंदी भाषा में क्यों बात कर रहे हैं? हमें अंग्रेज़ी में बात करनी है।” मैंने कहा, “ठीक है, मैं अंग्रेज़ी में बोल देता हूँ।” वो बोलते थे, “आप हिंदी में क्यों बोलते हो? आपकी हिंदी हमें समझ में नहीं आती। ये हिंदी नहीं, ये कुछ और है।” तो मैंने कहा, “ठीक है, मैं अंग्रेज़ी में बोल देता हूँ,”  मैंने अंग्रेज़ी में बोला। पर बोले, “ये कौन-सी भाषा है?”

इनको परमात्मा सुलभ होगा?

समझ में आ रही है बात?

ये धारणा बिलकुल मन से निकाल दो कि जो फटेहाल घूम रहा है, वो बड़ा तत्व-ज्ञानी है। जो फटेहाल घूम रहा है, वो फटेहाल ही है। और भारत में ये भ्रम ज़रा गहरा चला गया है कि जो ही दिख जाए बिलकुल उपेक्षित, तिरस्कृत, उसको ही मान लेना कि फ़कीर है, संत है। जो ही किसी ‘काम का’ ना हो, उसे ही मान लेना कि परमात्मा के काम का है।

ऐसा थोड़े -ही होता है।

राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, ये सब राजवंश से थे। पढ़े- लिखे थे, कुलीन थे, विद्यावान थे, शौर्यवान थे। फटेहाल थोड़े ही घूम रहे थे। त्याज्य थोड़े ही थे।


वीडियो  सत्र: धन की क्या महत्ता है? || आचार्य प्रशांत, ओशो पर (2017)


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