उद्धरण – मार्च – अप्रैल’१९ में प्रकाशित लेखों से

1.

उन विषयों में चले जाईये, और देखिये कि उनमें ऐसा क्या ख़ास है कि आप आकर्षित हो जाते हैं ।

वो विषय ही तो आपका जीवन हैं, उन्हीं में ज़िंदगी गुज़ार रहे हो चौबीस घंटे। वही विषय आप पर हावी हैं, वही विषय आपकी पूरी ज़िंदगी संचालित कर रहे हैं। तो ज़ाहिर-सी बात है, वो विषय, आप किसी भी क्रिया में बैठें, आप किसी भी प्रयोजन से बैठें, आपको बार-बार पकड़ने भी चले आयेंगे।

तो किसी भी क्रिया में बैठने से अच्छा है उन विषयों का ही परीक्षण कर लिया जाए ।

जो विषय इतने ताकतवर हैं, कि आपको बार-बार घसीट ले जाते हैं अपने साथ, उनको थोड़ा जाँच-परख तो लीजिये, बात तो कर लीजिये कि – ‘क्या दोगे मुझे?’

2.

हमने कहा कि वो विषय तो आपको दिनभर घेरे हुए हैं।

तो पूछिये, “दिनभर जैसे जी रहा हूँ, तो क्यों जी रहा हूँ?”

उन विषयों को ताकत, प्रधानता, आपने ही तो दी है।

आपने ही तो निर्णय किया है कि – ‘ये विषय महत्वपूर्ण हैं, मुझे इन्हीं से लिप्त रहना है’।

3.

ऐसे ही तो करते हो न?

दिनभर जिसको खुद ही पालते हो, पोसते हो, ध्यान और अध्यात्म के ख़ास क्षणों में चाहते हो कि वो दूर ही दूर रहे।

ऐसा होगा?

4.

जिसे दूसरे को समझाना हो कि क्या सही है, क्या ग़लत है, उसे अपने सारे दोष साफ़-साफ़ पता होने चाहिये।

अगर अपने ही मन की ख़बर नहीं, तो तुम वैसे ही हो जैसे दूसरा है। उसे भी अपने मन की ख़बर नहीं।

इसलिए समझा नहीं पाओगे।

5.

दूसरे को जब समझाने निकलना, तो ये साफ़-साफ़ समझना, दूसरा तुम्हारे शब्दों से कम, तुम्हारी हस्ती से ज़्यादा समझता है। तुम्हारी बात बहुत ऊँची होगी, पर तुम उतने ऊँचे दिखते ही नहीं। तो वो तुम्हारी बात की कद्र, नहीं करेगा।

उपनिषद का एक श्लोक, उपनिषद के ही ऋषि बोलें, और उपनिषद का एक श्लोक, कोई भी और आकर बोल दे, श्लोक में वज़न रह जाएगा क्या?

6.

शब्दों को वज़न देता है ‘वो’, जिससे वो शब्द आ रहे हैं। अन्यथा, शब्द बहुत हल्की चीज़ हैं।

शब्द तो ऐसे ही हैं, बिल्कुल, पंख की तरह हल्के।

जिसके वो पंख हैं, अगर उसमें वज़न है, तो पंखों में भी वज़न है।

वज़न बढ़ाओ!

7.

तुम देखोगे अक़सर, जब संतों के पास जाओगे, तो उन्होंने जो बात बोली होगी, वो बहुत सीधी-साधी होगी, बहुत ही सरल। तुम्हें लगेगा ही नहीं कि बहुत दूर की बात बोल दी।

“बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर”।

बोली किसने है? और ये बात ब्रांड या लेबल की नहीं है। बात उसकी हस्ती की है। वो अगर बोल रहा है, तो छोटी से छोटी बात, ब्रह्मवाक्य हो जाती है।

और अगर छोटा आदमी ब्रह्मवाक्य भी बोल रहा है, तुम कहोगे, “भक्क”।

8.

आलस से ज़्यादा सुन्दर, कुछ मिला नहीं।

आलस के मज़े होते हैं। आलस से ज़्यादा मज़ेदार कुछ मिला ही नहीं अभी तक ।

सुबह-सुबह बिस्तर पर पड़े रहने के मज़े होते हैं। और एक मज़ा ये होता है कि – खिड़की खोलो, सर्दी की धूप है, सामने बागीचा है। वहाँ जाओ भागकर।

और अगर बागीचा ही न हो? तो पड़े रहो। फ़िर तो आलस ही सबसे ज़्यादा मज़ेदार है।

आलस सिर्फ़ ये बताता है कि जीवन में कुछ ऐसा है ही नहीं, जिसकी ख़ातिर तुम दौड़ लगा दो। जैसे ही वो मिलेगा, दौड़ना शुरू कर दोगे।

‘अहम्’ को कुछ तो चाहिये न, पकड़ने को। कुछ और नहीं मिलता है, तो वो आलस को पकड़ लेता है।

9.

‘आलस’ अपनेआप में कोई दुर्गुण नहीं है। आलस सिर्फ़ एक सूचक है।

जब कुछ अच्छा मिल जायेगा, आलस अपनेआप पलक झपकते विदा हो जायेगा।

10.

‘आलस’ – एक अर्थ में तो सन्देश देता है बस। क्या सन्देश? जीवन नीरस है। कुछ है नहीं ऐसा कि तुममें बिजली कौंध जाये। कुछ है नहीं ऐसा कि तुम लपक के खड़े हो जाओ, और कहो कि ये चाहिये।

और जब तक वो नहीं रहेगा, तो आलस ही रहेगा।

11.

जो अच्छा होता, उसके लिए तो प्रेम उठता न।

और प्रेम में आलस कहाँ होता है।

12.

ज़िंदगी में जिन-जिन चीज़ों से संयुक्त हो, जिनमें शामिल हो, उन चीज़ों को पैनी दृष्टि से देखो।

प्रेम है कहीं पर? या मजबूरी में ही ढोये जा रहे हो?

जहाँ मजबूरी होगी, वहाँ आलस होगा।

13.

बहुत सारी चीज़ें बदलनी पड़ती हैं, छोड़नी पड़ती हैं।

सख़्त निर्णय लेने पड़ते हैं।

तुम्हारी उम्मीद अगर यह है कि ज़िंदगी वैसी ही चलती रहे, जैसी चल रही है, और साथ ही साथ मुक्ति भी मिल जाये, तो तुम मुक्ति इत्यादि को भूल जाओ।

जैसी ज़िंदगी चला रहे हो, चलाओ।

14.

ग्रंथ इसलिये, ‘ज्ञान’ नहीं देते हैं। ग्रंथों से ‘ज्ञान’ नहीं मिलता है।

हालांकि पारंपरिक रूप से ऐसा कहा गया है, और ऐसा माना भी गया है कि ज्ञानोपार्जन होता है।

ज्ञानमार्ग ही है पूरा।

ग्रंथ ज्ञान नहीं देते, ग्रंथ गवाही देते हैं।

15.

हम कुछ नहीं। हम अहंता हैं। हम तो अपनी मिश्रित चेतना हैं।

लेकिन अपनी दृष्टि में हम राजा होते हैं, क्योंकि हम ही चुनते हैं।

मंदिर जाना है, या नहीं जाना है, ये भी तो हम चुनते हैं न?

तो हम अपनी नज़र में तो इतने बड़े हैं, कि हम ये भी चुनाव कर लेते हैं कि हमें भगवान अभी चाहिये, या नहीं चाहिये।

16.

हमारे सामने परमात्मा प्रार्थी की तरह ही तो खड़ा है। हम कभी उसकी सुनते हैं, कभी उसकी नहीं सुनते हैं।

तो ऐसे में ग्रंथ काम आते हैं। वो गवाही दे देते हैं।

अब आपके सामने सत्य खड़ा है, और भ्रम खड़ा है। ग्रंथ आ गया।

आप तो न्यायधीश बने हुए हो। और न्यायधीश क्या माँगता है? गवाही लेकर आओ, सबूत लेकर आओ। अब झूठ के पास बहुत सबूत होते हैं। सारे सबूत होते ही किसके पास हैं? झूठ के पास।

सत्य के पास सबूत नहीं होता है। इसलिए हारता कौन है? सत्य। हम निर्णय किसके पक्ष में कर देते हैं? झूठ के पक्ष में।

हम ही तो झूठ के पक्ष में निर्णय किये जाते हैं। उसी से तो दुनिया चल रही है। लेकिन सत्य को एक गवाह मिल जाता है – ये ग्रंथ। फ़िर, इसकी सहायता से, कभी-कभी सत्य जीत जाता है।

17.

लेकिन ये जो सच की आवाज़ होती है, समझाने के उद्देश्य से कह रहा हूँ, ये बड़ी झीनी होती है। वो बड़ी मंद होती है। झूठ चिल्ला-चिल्ला कर बोलता है, सारी इन्द्रियों से बोलता है – कानों में भी झूठ घुस रहा है, आँखों में भी झूठ घुस रहा है, स्मृति में भी वही बैठा है, बुद्धि में भी।

सच हारता रहता है।

तो ग्रंथ आकर कहते हैं कि – ‘उसका पक्ष लो, जो बड़ी भीनी-सी, बड़ी कोमल आवाज़ में बोल रहा है। उसका पक्ष लो’!

18.

सत्य बड़ा दुर्बल होता है। अब ये बात भी बड़ी अजीब लगेगी। सत्य को तो हमने कहा है कि वो बलवानों से बलवान है। पर हमारे भीतर का जो सत्य है, वो बड़ा दुर्बल है। क्योंकि उसको देखने वाला कौन है? उसको देखने वाला है – अहंकार। और अहंकार जब सत्य को देखता है, तो अहंकार के लिये, सत्य बड़ी दुर्बल चीज़ है।

हाँ, सत्य की दृष्टि से देखें, तो कहा जायेगा कि वो बली ही नहीं, वो बलातीत है। सच की नज़र से सच को देखें, तो आप कहेंगे कि सच बलवानों से बलवान है। और जब अहंकार न्यायधीश हो, और सच को देखा जाये, तो सच कैसा दिखाई देगा? दुर्बल, रोगी, मरियल।

ये ग्रन्थ फ़िर आकर गवाही दे देते हैं।

इसलिये ये उनके ही काम आते हैं, जिनके भीतर सच की मद्धम और सूक्ष्म ही सही, लेकिन आवाज़ ज़रूर हो।

तो जिसके भीतर प्राण थोड़े बचे होते हैं, या कहिये कि प्राण उठने लगते हैं, ये उनके काम के हो जाते हैं।

19.

तुम्हारे भीतर से कुछ उठे तो! कुछ ऊब उठे, कुछ ज्वाला उठे। कुछ विद्रोह उठे।

ग्रंथ उसको दिये जायें, जिसके भीतर से कोई विरोध में खड़ा होना शुरू हो जाये।

तो फ़िर तुम्हारे हाथ में ये ग्रंथ दें।

20.

गुरु के सामने कोई आये, जिसके भीतर अभी पात्रता पैदा होनी शुरू ही नहीं हुई है, गुरु उसे कुछ नहीं दे सकता।

21.

मुक्ति का तो एक ही तरीका है – एक-एक करके अपने बंधनों को पहचानों, और काटते चलो।

रोने-तड़पने भर से कुछ हो नहीं पायेगा।

22.

मैं तुम्हारी वेदना समझता हूँ, सबकी वेदना समझता हूँ। ये तक कह सकते हो कि अनुभव करता हूँ। लेकिन ये भी जानता हूँ कि ये वेदना अधिकांशतः व्यर्थ ही जाती है।

आँसू मत बनाओ वेदना को। आग बनाओ!

चिल्लाओ नहीं, कल्पो नहीं। संयमित रहकर, अपने दर्द को अपनी ताक़त बनाओ।

आँसुओं से तो बस गाल गीले होते हैं।

तुम्हें आग चाहिये, तुम्हें अपनी बेड़ियाँ पिघलानी हैं।

वही वेदना का सार्थक उपयोग है।

23.

भावनाओं का आवेग यदि बल है, तो ज्ञान उस बल को सही दिशा देता है। इसीलिये शास्त्रों का अध्ययन ज़रूरी है। ताकि तुम्हारे भीतर की इस बेचैन ऊर्जा को सही दिशा दी जा सके।

सही दिशा नहीं दोगे, तो भीतर की बेचैनी तुम्हें ही खा जायेगी।

24.

दुःख भी ऊर्जा है एक प्रकार की, उसका सदुपयोग करो।

दुःख आये, तो उस घटना को, उस उद्वेग को, व्यर्थ मत जाने दो।

दुःख का ही प्रयोग कर दो, दुःख के मूल को काटने के लिये।

25.

मुक्ति का सर्वश्रेष्ठ साधन, दुःख ही है।

अब या तो दुःख को अभाग समझ कर कलप लो, या दुःख को लपक लो।

बताओ – कलपना है, या लपकना है?

मैं कहता हूँ लपक लो।

दुःख बारूद है, उसका इस्तेमाल करो। जो कुछ सब जीर्ण-शीर्ण, फटा-पुराना, अनावश्यक है, ढहा दो उसको। करो विस्फ़ोट! ये बेचैनी, बेकरारी, बेसबब नहीं होती। कभी बहुत पहले मैंने कहा था, “पीड़ा परम का पैगाम होती है”। पैग़ाम आया है, उसको पढ़ो। रोना-पीटना बहुत हुआ।

आँसूँ पोंछो, साफ़ -साफ़ पढ़ो क्या कहा जा रहा है। इसीलिये ये ग्रंथ है, इसीलिये आदि शंकराचार्य के साथ हो।

मनुष्यों में, ख़ासतौर पर स्त्रियों में भावुकता तो होती ही है। और भावुकता माने, भाव की ऊर्जा।

उसी भावुकता को अगर ज्ञान की दिशा मिल जाये, तो फ़िर कुछ सार्थक होता है। अन्यथा वो ऊर्जा, भावुक व्यक्ति को ही भारी पड़ती है।

26.

मन तो पचास जगह रिश्ता बनाता है। वो सब रिश्ते, मन के खेल हैं, मन की प्यास हैं। समय के संयोग हैं।

डेस्टिनी (क़िस्मत) होती है वो आख़िरी रिश्ता, जिसके बाद और कोई रिश्ता चाहिये ही नहीं।

डेस्टिनी (क़िस्मत) का अर्थ होता है – अंत, डेस्टिनेशन(गंतव्य)। अंत – जाकर के रुक जाना।

जो मिल गया हो आपको, क्या उसके बाद कोई और चाहिये? ये प्रश्न पूछिये।

जो मिल गया है, जिससे सम्बंधित हो रहे हो, क्या वो आख़िरी है?

अगर वो आख़िरी है, तो डेस्टिनी है। आख़िरी नहीं है, तो खेल है, संयोग है, घटना है।

खेल चलता रहेगा।

27.

मंज़िल से जो रिश्ता बनता है, मात्र वही डेस्टिनी है, नियति।

मंज़िल – जहाँ तुम्हें पहुँचना ही, पहुँचना है।

इसीलिये समझाने वाले कह गये हैं कि रिश्ते बहुत सोच समझकर बनाओ।

28.

संतों के पास जाओगे तो वो कहेंगे कि संगति से ज़्यादा कोई बड़ी बात नहीं।

सुसंगति मिल गई, तो सब कुछ मिल गया। और कुसंगति मिल गई, तो जीवन तबाह है। क्योंकि सारे रिश्ते हैं ही इसीलिये कि कोई ऐसा मिल जाये, जो ‘उससे’ रिश्ता बना दे तुम्हारा।

29.

जिससे मिले हो, अगर वो ऐसा है, कि तुमसे तुम्हारा ही परिचय करा दे, तुमसे सच्चाई का परिचय करा दे, तो सुसंगति है।

इस व्यक्ति को जीवन में आदर देना, जगह देना, मूल्य देना।

30.

असली रिश्ता, सुसंगति, वो है, जो तुम्हें अपने तक न ले आये व्यक्ति।

बल्कि तुम्हारा हाथ पकड़कर तुम्हें सत्य तक ले जाये।

31.

अधिकांश लोग तुमसे रिश्ता बनाते हैं, क्योंकि उन्हें तुमसे कुछ चाहिये। कोई ही होता है, जिसे तुमसे, न किसी और से, उसे कुछ नहीं चाहिये। वो तुम्हारा हाथ थाम रहा है, क्योंकि तुम्हें मंज़िल दिखाना चाहता है।

वो रिश्ता रखने लायक है।

उसके अलावा भी अगर कोई हमसफ़र मिल जाये, तो उसकी पहचान इसी बात से कर लेना।

32.

सर्वश्रेष्ठ संगति उसकी है, जो मंज़िल का पारखी ही हो। हमने कहा, अगर वो न मिले जो मंज़िल का पारखी ही हो, जो तुम्हारा हाथ पकड़कर मंज़िल तक पहुँचा दे, तो उससे भी काम चलाया जा सकता है, जो कम-से-कम मंज़िल का प्यासा हो। पारखी न हो, प्रार्थी ही हो।

पर सबसे घटिया संगति उसकी होती है जिसको मंज़िल की ओर जाना ही नहीं है। वो न खुद जायेगा, न तुम्हें जाने देगा। अधिकांश लोग ऐसे ही रिश्तों में, ऐसे ही कुसंगति में फंसे रह जाते हैं। किसी ऐसे के साथ नाता कर लेते हैं, जिसकी न तो ख़ुद रुचि है मंज़िल की ओर जाने में, और तुम चलोगे तो तुम्हें भी बाधा देगा।

ऐसों से बचना।

33.

सर्वश्रेष्ठ तो ये रहे कि तुम्हें कोई मिल जाये ऐसा, ऐसी सुन्दर किस्मत हो तुम्हारी, कि कोई मिल जाये ऐसा, जो स्वयं मंज़िल तक पहुँचा हुआ हो। फ़िर तो क्या कहने। वो न मिले, तो कम-से-कम किसी ऐसे का हाथ थामना, जो मंज़िल का प्रार्थी हो। जो कह रहा हो, “मंज़िल मिली तो नहीं है, पर मैं जा रहा हूँ मंज़िल की ओर, अगर तुम भी जा रहे हो, तो चलो साथ-साथ चलते हैं। एक ही राह के हमसफ़र हुए हम”।

इस दूसरी कोटि से भी काम चला सकते हो। पर तीसरी कोटि से तो दूर से ही नमस्कार कर लेना – जिसको मंज़िल से कोई लेना-देना ही नहीं है। ये तीसरी कोटि, जीवन नर्क कर देती है।

अब तुम देख लो, जो मिला है वो प्रथम कोटि का है, द्वितीय, या फ़िर निचली कोटि का।

34.

हर बात जो कही जाती है, हर उपदेश जो दिया जाता है, वो किसी ऐसे को दिया जाता है,

जो उस वक़्त उसका पात्र होता है।

35.

साधना में एक मक़ाम ऐसा आता है, जब आप न इधर के होते हो, न उधर के। आपके भीतर ताक़त धीरे-धीरे शक्ल ले रही होती है, जैसे कुम्हार का घड़ा पक रहा हो। अभी उसमें ज़ोर आया नहीं है, अभी वो जमा नहीं है। लेकिन आसार अच्छे हैं। इस वक़्त उसको सुरक्षा की ज़रुरत है।

एक समय ऐसा आयेगा, जब तुम उसमें पानी पूरा भी भर दोगे, तो वो दरक नहीं जायेगा। एक समय ऐसा आयेगा, जब तुम उसी घड़े को वाद्ययंत्र की तरह भी प्रयोग कर लोगे। और तब उसमें से संगीत बहेगा। तुम उसे मार रहे हो, तुम उसे चोट दे रहे हो, और उसमें से संगीत उठ रहा है। पर तब नहीं, जब अभी मिट्टी बैठी नहीं, जब अभी घड़ा कच्चा है। तो अभी क्या करना होगा? अभी तो ज़रा थमने दो, जमने दो, पक्का होने दो, पकने दो।

36.

कच्चे फल को पकने दिया जाता है। पका फल और पकेगा, तो सड़ जायेगा। कच्चे फल को ये नसीहत बिलकुल ठीक है कि – “तू तो अभी टंगा रह”। पक्के फल को ये नसीहत दे दी गयी कि तू अभी टंगा रह, तो सिर्फ़ दुर्गन्ध मिलेगी। सड़ जायेगा।

पके फल को तो गिरना है। पके फल को तो अब बीजों को छितराना है, प्रसार करना है, गीत गाना है।

37.

आपके माध्यम से तो अब कई अन्य वृक्ष उगने चाहिये।

अब आप पेड़ से टंगे मत रह जाना।

अब आप दुनिया के तानों की, और हमलों की, परवाह मत करने लग जाना।

आप को नहीं शोभा देता।

38.

इसी तरीके से, अगर आपको बहुत सारे ऐसे सन्देश आते हों, फ़ोनकॉल आते हों, कि बहुत सारे लोग आपके द्वार पर दस्तक देते हों, जो आपको पता है कि यूँही हैं, सतही, निकृष्ट कोटि के, व्यर्थ का वार्तालाप, व्यर्थ का प्रपंच करने वाले, तो आपको अपनेआप से ये प्रश्न पूछना चाहिये, “उन्हें मुझमें ऐसा क्या लगता है कि वो मेरी ओर खिंचे चले आते हैं?” क्योंकि बुद्धों की ओर तो वो जायेंगे नहीं।

39.

तो शरीर का काम है जगत को सत्यता देना, क्योंकि अनुभवों के लिये जगत चाहिये न। तुम्हें ठंड का, या गर्मी का अनुभव हो, इसके लिये तुमसे बाहर कुछ होना चाहिये। बाहर की हवा लगेगी, तभी तो ठंडा या गर्म अनुभव होगा। तो शरीर का होना ही, जगत को सत्यता दे देता है।

40.

जब तक शरीर है, तब तक ये सब कुछ अनुभव में आता रहेगा। चेतना इन्हीं चीज़ों से भरी रहेगी – अभी ठंडा लगा, अभी भूख लगी, अभी प्यास लगी। कुछ मिला, कुछ खोया। चेतना इन्हीं चीज़ों से भरी रहती है। सवाल यह है कि ये सबकुछ, जो चेतना में मौजूद है, सामग्री की तरह, इससे तुम्हें रिश्ता क्या बनाना है।

‘शुद्ध चेतना’ का ये मतलब नहीं होता कि तुम्हारे मन में कोई सामग्री ही नहीं है।

‘शुद्ध चेतना’ का मतलब ये होता है कि तुम्हारे घर में चीज़ें होंगी, पर तुम उनको लेकर बौराये नहीं हो।

41.

तो ये पूरी व्यवस्था पचास तरह के अनुभव करती ही रहे गई। तुम उनसे रिश्ता क्या बना रहे हो, ये तुम्हें देखना है। वो रिश्ता स्वस्थ रखो। उस रिश्ते में ज़रा अपनी एक हैसियत रखो, बौरा मत जाओ, पागल मत हो जाओ। डरे-डरे मत घूमो। समझो कि आने-जाने वाली चीज़ें हैं, और इनका आना-जाना आवश्यक है।

42.

एक तो आत्मा आवश्यक है। और दूसरे आत्मा के चलते ही, जगत की निस्सारता भी आवश्यक है। इसीलिए ज्ञानी ये भी जानते हैं कि आत्मा मात्र है, जगत मिथ्या। और अन्यत्र वो ये भी कहते हैं कि जगत कुछ नहीं है, आत्मा का ही प्रतिपादन है।

43.

आत्मा अपने होने के कारण सच है। और जगत अपने न होने के कारण सच है। आत्मा है, इसीलिये सच है। और जगत नहीं है, इसीलिये सच है। तो दो बातें हैं जो पत्थर की लकीर हैं।

पहली – आत्मा सदा है। और दूसरी – जगत क्षणभंगुर है। और दोनों बातें हैं तो पत्थर की लकीर न। तो दोनों ही बातें क्या हो गईं ? आत्मा हो गईं।

तो आत्मा जब निराकार है, तो सत्य है। और साकार होकर जब वो सामने आती है, तो अपनी क्षणभंगुरता में सत्य को प्रदर्शित करती है, प्रतिपादित करती है।

44.

गलती हमसे ये हो जाती है, कि हम साकार सत्य को अमर आत्मा का दर्ज़ा देना शुरू कर देते हैं। यहाँ सब कुछ क्या है? मरण-धर्मा। और हम उसे वो हैसियत देने लग जाते हैं, जो मिलनी चाहिये मात्र, अजर-अमर आत्मा को। फिर हमें निराशा लगती है, फिर हमारा दिल टूटता है। फिर तमाम तरह के दुःख और पीड़ा।

45.

जगत को पूरा सम्मान दो। वैसा ही सम्मान, जैसे दो दिन के फूल को दिया जाता है। दो दिन का जो फूल होता है, दो दिन के लिये आया है, सम्मान तो उसे फिर भी देते हो न। पर याद रखते हो कि ये दो दिन का है। उससे चिपक नहीं जाते। ये स्वस्थ चेतना है। वो जगत को देखती है, जगत से खेलती है, पर लगातार याद रखती है कि ये दो दिन का फूल है। अभी आया, अभी जायेगा।

तो जगत को मिथ्या बोलना भी आवश्यक नहीं है। जगत को देखो और बोलो, “जगत का न होना ही सत्य है”। तो जगत भी इस अर्थ में सत्य-तुल्य हो गया। बस भूल मत जाना कि ये खाली है, खोखला है, कुछ रखा नहीं है इसमें। कुछ रखा नहीं जगत में – यही बात सत्य है।

46.

ज्ञान की प्राप्ति का सबसे बड़ा साधन तुम्हारी मुमुक्षा है। साधन तुमने कहा न। स्वयं आदि शंकराचार्य ‘साधन चतुष्टय’ बता गये हैं। उसमें न जाने कितने गुणों का उन्होंने वर्णन किया है, जो साधक में होने चाहिये। अगर साधक को परम-पद चाहिये, अगर साधक को परम-ज्ञान चाहिये, तो उसमें बहुत गुण होने चाहिये – विवेक, वैराग्य, शम, दम, उपरति, तितिक्षा, और सबसे ऊपर, मुमुक्षा।

47.

तो ज्ञान की प्राप्ति का सबसे बड़ा साधन है – तुम्हारी मुमुक्षा।

‘मुमुक्षा’ माने – मुक्ति की इच्छा।

इसी को मैं कह रहा हूँ – तुम्हारी नीयत, इरादा, लक्ष्य, ध्येय।

ध्येय तो बनाओ, वही है ज्ञान की प्राप्ति का साधन।

48.

बोध का कोई विषय नहीं होता।

‘बोध’ का अर्थ होता है – व्यर्थ ज्ञान से मुक्ति मिली।

‘बोध’ माने – छुटकारा।

49.

‘ज्ञान’ ऐसा है, कि तुम किसी को कहो, “मैं बंधा हुआ हूँ”, तो वो पूछेगा, “किस चीज़ से बंधे हो?” बंधन का सदा एक विषय होगा। अगर तुम बंधे हो, तो किसी वस्तु से बंधे होगे । तो बंधन का हमेशा एक विषय होगा। पर अगर तुम कहो कि तुम मुक्त हो, तो कोई मूर्ख ही होगा, तो पूछेगा, “किस चीज़ से मुक्त हो?’ मुक्त माने – मुक्त। मुक्त माने – मुक्त, मात्र मुक्ति।

“किस चीज़ से मुक्ति?”

“अरे! अब चीज़ की क्या बात है?” हर चीज़ से मुक्ति। मुक्ति से मुक्ति, मात्र मुक्ति।

तो जैसे बंधन का विषय होता है, मुक्ति का विषय नहीं होता है। वैसे ही ज्ञान का विषय होता है, बोध का विषय नहीं होता। इसीलिये मैं ज्ञान की अपेक्षा, ‘बोध’ शब्द का प्रयोग करता हूँ।

50.

बोध की प्राप्ति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा क्या है? सबसे बड़ी बाधा है – तुम्हारी ज़िद्द, सुख की तुम्हारी कामना। जो कुछ जैसे चल रहा है, उसी के साथ समायोजित हो जाने की तुम्हारी वृत्ति। ‘बोध’ माने तो मुक्ति होता है। तुम पूछ रहे हो, “मुक्ति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा क्या है?”

मुक्ति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा यह है कि मुक्त होने की तुम्हारी इच्छा ही नहीं है। और क्या बाधा है? तुम स्वयं ही बाधा हो। मुक्ति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा क्या है? बंधन ही बाधा है। जो बद्ध है, वही बाधा है, क्योंकि वो जब चाहे, वो चुनाव कर सकता है। वो चुनाव कर नहीं रहा है।

51.

बंधन ही बाधा है। और बंधन कौन है? जो बद्ध है, वही बंधन है। तुम ही बाधा हो।

जिसे मुक्ति चाहिये, वो स्वयं बाधा है, मुक्ति के मार्ग में। उसे ही हटना होगा।

52.

विधियाँ उनके के लिये हैं, जिन्हें सत्य को तो पाना है, और अपनी ज़िद्द को भी बचाना है।

ख़ुदा को भी पाना है, और अपनी ज़िद्द को भी बचाना है।

ध्यान की विधियाँ उनके लिये हैं।

53.

तो विधियाँ उनके लिये हैं, जो सशरीर स्वर्ग पहुँचना चाहते हैं। जो कहते हैं कि हमारा काम -धंधा, हमारी धारणाएँ, हमारी मान्यताएँ , जैसे हैं, वैसी ही चलती रहें, और साथ-ही-साथ मुक्ति भी मिल जाये। तो फिर उनको कहा गया है कि अभ्यास करो। अन्यथा अभ्यास की कोई ज़रुरत नहीं है।

तो अभ्यास आवश्यक है या नहीं, वो इस पर निर्भर करता है कि आपमें सत्य के प्रति एकनिष्ठ प्यास है या नहीं। अगर आपमें एक निष्ठप्यास है, तो किसी अभ्यास की ज़रुरत नहीं। पर अगर आपका चित्त यदि खंडित है, बंटा हुआ है, दस दिशाओं में आसक्त है, तो फिर तो बहुत अभ्यास करना ही पड़ेगा।

54.

पर याद रखिये, आसक्ति मजबूरी नहीं होती। आसक्ति एक चुनाव होती है।

आप चुनते हो अपनी आसक्तियाँ।

चूँकि आसक्ति एक चुनाव होती है, इसीलिये आपको सहज ध्यान, सहज समाधि भी चाहिये या नहीं, ये बात भी आपके चुनाव पर है।

चुनिये – तो अभी मिल जाये।

न चुनिये – तो कभी न मिले।

55.

“जिनको अभी मिल गया, वो तो अपवाद थे”। वो अपवाद नहीं थे। उन्होंने निर्णय किया था कि अभी चाहिये। और वो निर्णय मानसिक तल पर नहीं होता, बौद्धिक तल पर नहीं होता, बहुत विचार करके नहीं होता।

वो निर्णय प्रेमवश होता है, वो निर्णय बड़ी मजबूरी में होता है। वो निर्णय बड़ी कातरता में होता है, बड़ी विवशता में होता है। आप चाहकर भी उस निर्णय को बदल नहीं सकते।

वो निर्णय, निर्विकल्पता में होता है।

56.

सोच समझकर निर्णय करेंगे, तो कभी नहीं कर पायेंगे।

सिर्फ़ सच ही चाहिये – ये निर्णय तो वो करते हैं, जो पूरे तरीके से बिक जाते हैं, मजबूर हो जाते हैं।

जो अभी बिक नहीं हैं, जिनके अभी बहुत डेरे हैं, धंधे हैं, तमाशे हैं, वो यह कह ही नहीं पायेंगे सहजता से, “और कुछ नहीं, बस एक चाहिये”। तो वो बस फिर अपनेआप को बहलाने के लिये, ढांढस बंधाने के लिये, सांत्वना ही देने के लिये, विधियों का अभ्यास करते हैं। ताकि खुद को फुसला सकें कि काम चल रहा है, कार्य प्रगति पर है। ताकि कहीं वो स्थिति न आ जाये कि ख़ुद को ही मुँह न दिखा पायें।

57.

भीतर निश्चित रूप से एक बच्चा बैठा रहता है। पर प्रौढ़ता का मतलब ही यही है कि आप उस बच्चे को पीछे छोड़ आये। तमाम तरीके की अपरिपक्व ग्रंथियाँ भीतर विद्यमान तो रहती ही हैं।

पर प्रौढ़ता का, व्यस्कता का मतलब ही यही है कि – आप आगे बढ़ गये।

भीतर जो बन्दर बैठा है, भीतर जो उधम करने वाला, शोर मचाने वाला बच्चा बैठा है, आप अब वो नहीं रहे।

58.

सही भूल न माननी पड़े, इसीलिये एक नकली भूल का निर्माण किया जाता है। उस नकली भूल का नाम है – ग्लानि।

तुम भूल नहीं कर बैठे। तुम जो कर रहे हो,  तुम वैसे ही हो। ग्लानि क्या दिखा रहे हो? जैसे कि तुम दौड़ो बहुत ज़ोर से, और तुम्हें ग्लानि उठे कि तुम उड़ क्यों नहीं पाये। कितनी भी ज़ोर से दौड़ लो, तुम उड़ थोड़े ही जाओगे। तुम ऐसे ही हो ।

59.

तुमसे वही होता है, जैसे तुम हो। वो होना अपरिहार्य था। अब पछता क्यों रहे हो?

पछताकर के तुम अपने लिये एक धोखे का निर्माण कर रहे हो।

क्या कहता है वो धोखा? “हम बुरे हैं नहीं, हमसे बुराई, हो गयी। हमसे दुर्घटना हो गयी”।

संयोग हो गया।

60.

तुम मूल दोष को छिपाने के लिये, एक छोटे दोष का आविष्कार कर रहे हो।

मूल दोष ये नहीं है कि हिंसा कर दी। मूल दोष ये है कि तुम हिंसक हो ही।

तुम्हारा हिंसक होना छुपा रह जाता था, आज सामने आ गया। तो इस घटना को धन्यवाद दो कि तुम्हारे भीतर की हिंसा का उद्घाटन हो गया।

पर धन्यवाद देने की जगह हम पछताते हैं। हम कहते हैं, “हिंसक तो मैं हूँ ही नहीं। आज बस गड़बड़ हो गयी है”। गड़बड़ नहीं हो गयी है, वही हुआ है जो होना था। ग्लानि किस बात की कर रहे हो? ग्लानि किस बात की?

61.

आनी चाहिये वो हीन भावना, क्योंकि हीन हो। अहंकार चाहता है कि हीन हैं, पर माने कि हम बहुत विशाल हैं। यही तो अहंकार है – गुरूर, कि हीनता को स्वीकार ही नहीं करना।

जब तुम्हें साफ़ -साफ़ दिख जायेगा कि हीन हो, तब उस हीनता को उठाकर के दूर फेंक दोगे।

62.

जिस दिन तुम्हें दिख गया कि ये चीज़ ही गड़बड़ है, उस दिन तुम इसे उठाकर फेंक दोगे। तो अच्छा है कि तुम्हें तुम्हारी हीनता, पूरी निर्ममता और पूरी नग्नता के साथ साफ़-साफ़ दिख जाये। हीनता की फिर रक्षा तो नहीं करोगे तुम कम-से-कम।

अभी तो ये होता है कि हीनता को छुपा-छुपा कर तुम उसकी रक्षा करते रहते हो ।

63.

तम्बाकू हो, या निंदा हो, या माँस हो, या आलस हो। हर आदत सत्य का, मौज का, एक विकल्प होती है, असफल और सस्ता।

असली चीज़ नहीं मिली है, तो तम्बाकू चबा रहे हो।

64.

अरे रग, रग कराह किसके लिये रही है, उसका तो नाम लो। तम्बाकू रग, रग में भरोगे, तो कैंसर ही मिलेगा अधिक से अधिक। रग, रग में ‘राम’ भर लोगे, तो मुक्ति मिल जायेगी। जो तड़प मुक्ति के लिये उठ रही है, उस तड़प के एवज में तुम्हें कैंसर मिल जाये, ये कहाँ की अक्ल है?

चाहिये था ‘राम’, और लो आये कैंसर, बढ़िया।

65.

सारी पुरानी आदतें छूट जातीं हैं, जब कुछ ताकतवर मिल जाता है ज़िंदगी में।

हर किसी को मिलता है, चुनने की बात होती है। मिलता सबको है, चुनते कोई-कोई हैं।

बिरला।

66.

एक बार ये जान जाओ कि किस माहौल में, किस विधि से, किस संगति से, शांति मिलती है, सच्चाई मिलती है,

उसके बाद एकनिष्ठ होकर, उसको पकड़ लो।

67.

तुम वो मरीज़ हो, जिसने सैकड़ों, हज़ारों दवाईयाँ आज़मां लीं। और जो दवाई आज़माई, वो मर्ज़ को और बिगाड़ गयी। अब अगर कोई दवाई मिले, जो थोड़ा भी लाभ दे, तो उसका नाम मत भूल जाना।

भूलना मत, तुमने सही दवाई ढूँढने की बहुत कीमत चुकाई नहीं ।

अब ये न हो कि तुम पहुँच भी गये, और पहुँचकर गँवा दिया, भूल गये।

एक बार मिल गयी सही दवाई, तो उसको सीने से लगा लो।

उसकी आपूर्ति सुनिश्चित कर लो।

68.

हम बड़े बेसुध रहे हैं। ऐसा नहीं है कि हमें सही दवाई अतीत में कभी मिली नहीं है। अतीत में भी मिली है, लाभ भी हुआ है।

सत्य की झलक भी मिली है।

पर हम इतने बेसुध रहे हैं, कि जो मिला है उसको गँवाते रहे हैं, भूलते रहे हैं।

69.

कुछ मूर्छित हैं, और कुछ आशान्वित हैं, कि जो घुसपैठिया आ रहा है, उससे भी नेह लग जाये। हमें घुसपैठिये से भी तो बहुत आसक्ति है।

कौन है घुसपैठिया? क्रोध, मद, मोह। ये ही तो हैं घुसपैठिये। हमें इनसे भी तो आकर्षण है। हम उनका विरोध कैसे करेंगे, जब हमें वो भले लगते हैं।

कामना घुसी चली आ रही है, उसका विरोध तब करोगे न जब विरोध करने का इरादा हो। अगर इरादा ही हो कि कामना आ रही है, उसके स्वागत में द्वार खोल दो, तो विरोध कैसा?

70.

श्रद्धा को जितना परखेंगे, वो उतनी मज़बूत होती जायेगी।

माया को जितना परखेंगे, वो उतनी कमज़ोर होती जायेगी।

तो परखा करिये, बार-बार प्रयोग, परीक्षण करिये।

71.

ये कुश्ती हो जाने दिया करो।

जितनी बार इसको होने दोगे, उतनी बार पाओगे कि श्रद्धा जीती, माया हारी।

अब तुम्हारे लिये मन बना लेना आसान होगा। अब तुम कहोगे, “इसका मतलब भारी तो श्रद्धा ही पड़ती है”। पर उसके लिये तुमको बार-बार बाज़ी लगानी होगी, खेल खेलना होगा। खेल खेलोगे ही नहीं,  निर्णय कर लोगे, यूँ  ही कुछ मन बना लोगे, तो निर्णय ग़लत होगा तुम्हारा।

इसीलिये तो साधना में समय लगता है न। क्योंकि इन सब प्रयोगों में समय लगता है।

मन आसानी से निष्कर्ष पर आता नहीं। उसको बार-बार सुबूत चाहिये।

वो सुबूत देना होगा।

72.

ऐसा नहीं है कि माया की बात झूठ साबित हो जायेगी। तुम पाओगे कि माया की बात सच भी साबित हो सकती है। माया तुम्हें जो घटना कहकर धमका रही थी, वो घटना घट भी सकती है।

लेकिन कुछ और भी होगा।

तुम पाओगे कि वो घटना घट भी गयी, और तुम पर कोई अंतर भी नहीं पड़ा। तुम अब अप्रभावित रह गये।

श्रद्धा की जीत हुई।

ये श्रद्धा है!

73.

‘श्रद्धा’ का अर्थ ये नहीं होता है कि तुम्हारे साथ अब कुछ बुरा घटित नहीं होगा।

‘श्रद्धा’ का अर्थ होता है – बुरे-से-बुरे घट भी गया, तो भी झेल जायेंगे, तो भी मौज में हैं।

कैसे झेल जायेंगे हमें नहीं पता, पर काम हो जायेगा।

अच्छा हुआ तो भी अच्छा, और बुरा हुआ तो भी कोई बात नहीं।

74.

होने दो कुश्ती। जीतेंगे तो जीतेंगे ही, और हारेंगे भी तो फर्क नहीं पड़ता। चित भी हमारी, पट भी हमारी।

ये है श्रद्धा!

75.

सावधानी तात्कालिक होती है, उसी समय की। वो अपना कोई अवशेष पीछे नहीं छोड़ती है।

सावधानी कुछ और नहीं है – जागरूकता है, सजगता है।

“मैं जगा हुआ हूँ” – जगा होना ही सावधानी है।

उसके लिए कोई विशेष प्रयत्न नहीं करना होता।

76.

सावधानी कोई विचार नहीं। सावधानी सजगता की तात्कालिक प्रतिक्रिया है।

उसकी कोई तैयारी नहीं करनी है।

वो पूर्वनियोजित नहीं है।

77.

बस जगा होना काफ़ी है, तो सावधानी बस यही है। इसके अलावा सावधानी कुछ नहीं।

इसके आगे अगर कोई सावधानी की बात करता है, तो वो फिर डरा रहा है।

सजगता के अतिरिक्त अगर कोई सावधानी की बात करता है, तो फिर वो सिर्फ़ डरा रहा है, क्योंकि फिर सावधानी विचार बन जाएगी।

और वो तुम्हारे मन में चक्कर काटेगी- “मुझे सावधान रहना है, मुझे सावधान रहना है”।

78.

अपने को कुछ का कुछ समझ लेना, अपने से परिचित न होना – यही सब धूल है।

तो सावधानी की ओर तुम्हें प्रयत्नपूर्वक नहीं जाना पड़ेगा। तुम ये नहीं कहोगे कि – “मैं सावधानी कर रहा हूँ”। सावधानी तो स्वभाव है।

सावधानी का ही दूसरा नाम ‘सजगता’ है – ‘मैं जान रहा हूँ’।

अगर तुम वाकई जान रहे हो, और जगे हुए हो, तो तुम्हारे सामने अगर कुछ ऐसा चला आ रहा है जिससे तुम्हारे शरीर को हानि हो सकती है, तो तुम्हें विचार नहीं करना होगा।

तुम खुद ही हट जाओगे।

79.

सावधानी तो बड़ी ही सहज एवं सरल बात है।

जितने सरल और सहज रहोगे, समझ लो उतना ही सावधान भी हो।

बड़ी हल्की चीज़ है सावधानी। उसमें कुछ करना नहीं पड़ता। कोई प्रयत्न, कोई विचार, कोई आयोजन उसमें शामिल ही नहीं है।

समझ रहे हो बात को? आँखे खुली हैं, इतना काफ़ी है। ध्यान बस इतना रहे कि आँखें खुली होनी चाहिए।

वास्तव में खुली होनी चाहिए। कहाँ की? आँखों की भी, और मन की भी।

80.

सावधानी बेख़ौफ़ होती है।

सावधानी में कोई चिंता, निराशा, भारीपन नहीं होता।

81.

जो बने सो बने, जो टूटे सो टूटे, आपको क्या करना है? आपका क्या लेना-देना? ना आप बनने वाली चीज़ हो, ना आप टूटने वाली शय हो। आप क्या हो, इससे भी आप का क्या लेना-देना?

इतना काफी है कि बनना-टूटना आपके पहले भी था, आपके बाद भी है। और आपके पहले कभी कुछ था नहीं, और आपके बाद कभी कुछ होगा नहीं।

82.

जीवन का नाम ही है – बदलना, बिगड़ना, बनना, सब पुनः-पुनः। आप इस चक्र में कहाँ सम्मिलित हो रहे हैं? आपका इसमें प्रयोजन क्या है?

आप कहीं और हैं, आप वहीं रहिए। आप इस सब के द्रष्टा और साक्षी भी होने का प्रयास मत करिए। दिख गया तो दिख गया, नहीं दिखा तो कोई बात नहीं। कुछ बहुत अच्छा आपको मिल नहीं जाना है बहुत टूट जाए तो। और कुछ आपका छिन नहीं जाना है, अगर संसार बनता ही रहे तल-दर- तल, परत-दर-परत, मंज़िल-दर-मंज़िल।

तो भी।

83.

कोई दिन ऐसा नहीं था जब ये खेल चल नहीं रहा था,

और कोई दिन ऐसा नहीं होगा जब ये खेल चल नहीं रहा होगा।

84.

जो शब्द में आ गया, वो चैतन्य मन में आ गया। जो बिंदु रूप में है, वो अचेतन में बैठा हुआ है।

अब वो इसलिए बैठा है क्योंकि आप उसे गंभीरता से ले रहे हैं।

जिसका कुछ बनना-बिगड़ना नहीं, वो किसी सवाल-जवाब का मोहताज नहीं। ठीक?

और जिसका बनना-बिगड़ना है, लाख सवाल-जवाब कर लो, उसका वही होगा जो होता ही आया है।

85.

मिट्टी का सवाल है, मिट्टी में मिल जाना है। जिसे नहीं मिलना मिट्टी में, वो सवाल कर ही नहीं रहा।

तो इतना नहीं आतुर होते, इतना नहीं भावाकुल होते। मौज मनाइए।

बस यही है।

86.

जब तुम विश्राम में होते हो, तब कुछ ‘कर’ रहे होते हो? कुछ कर-कर के विश्राम में होते हो क्या? हमारा सवाल है – कैसे हो जाएँ विश्राम में? निश्चित रूप से हम जानना चाहते हैं – क्या करें विश्राम में होने के लिए? मैं पूछ रहा हूँ – कुछ ‘कर’ के विश्राम मिलता है, या तनाव मिलता है? और जब तुम होते हो विश्राम में, तो क्या कुछ ‘कर’ रहे होते हो? ये ‘करना’ ही तो हमारी बीमारी है, तनाव तो इसी से मिलता है।

‘करना’ बीमारी क्यों है? क्योंकि ‘करने’ के पीछे ये भाव है कि जो कमी है, वो ‘कर’ के पूरी हो जाएगी।

87.

क्या ‘कर के’ मिलेगी? या आँखे खोल के मिलेगी? जितना करेगा, उतना और भटकेगा। ‘करने’ का मतलब ही यही है – खोज रहा हूँ, भटक रहा हूँ। उसे और खोजना है, भटकना है, या चुपचाप घर में आकर ठहर जाना है? अगर ठहर जाए, घर में आकर के, तो पा लेगा जो खोया है।

88.

‘विश्राम’ का अर्थ है – तनाव फ़िज़ूल है। इससे वो मिलेगा नहीं जो चाहिए।

तनाव अपनेआप नहीं आता है। हम तनाव को पहले बुलाते हैं, और फिर उसे हम पकड़ के भी रखते हैं।

तनाव अपने पाँव चल कर नहीं आता, आमंत्रित किया जाता है, क्योंकि हमें ऐसा लगता है कि तनाव से हमें कुछ मिल जाएगा।

89.

ये मत कहा करो कि – “मुझे तनाव हो गया”। ये कहा करो कि – “मैंने तनाव बुला लिया”। बुलाया पहले, फ़िर उसे ग्रहण किया। हम खुद बुलाते हैं तनाव को। हमें भ्रम है कि तनाव फायदेमंद है।

90.

तनाव फ़िज़ूल है – जैसे ही तुम इस बात को समझते हो, तुम तनाव को आमंत्रित करना बन्द कर देते हो।

याद रखो, तनाव अपने पाँव चलकर नहीं आता। तुम उसे बुलाना बंद करो, वो आना बंद करेगा।

91.

तुम्हें जो मिलना है वो तुम्हारे ध्यान से, तुम्हारी शांति से मिलना है, तनाव से नहीं मिलना।

जब जो मिलना है वो शांति में मिलना है, तो शांत ही रह लेते हैं।

92.

वो छोटी-सी धारणा, जो अब विकराल रूप ले चुकी है, इसको त्यागना होगा।

कौन सी धारणा? कि तनाव फायदेमंद है।

क्या ये याद रख सकते हो कि – तनाव फायदेमंद नहीं है? तनाव से कुछ नहीं मिलेगा। तनाव फायदेमंद बिल्कुल नहीं है।

शांति फायदेमंद है। विश्राम फायदेमंद है।

93.

शांत रहोगे, सब ठीक रहेगा अपनेआप ठीक रहेगा। ये श्रद्धा रखो।

इसके लिए थोड़ा सिर झुकाना पड़ता है।

इसके लिए अहंकार थोड़ा कम होना चाहिए कि – “मेरे बिना करे भी सब ठीक है।और मुझे जो कुछ करना है, उसका इंजन तनाव नहीं हो सकता। उसका स्रोत तनाव न हो तो अच्छा हो।”

94.

जो चल रहा है, चलने दीजिये। जो चल रहा है, चलने दीजिये। बनता है तो मौज, टूटता है तो मौज। जिसे बनना है वो बनता रहेगा, जिसे टूटना है वो टूटता रहेगा। आप कुछ भी अपने ऊपर अनिवार्य मत कर लीजिये। जो कुछ भी आप अपने ऊपर अनिवार्य कर लेंगे, वो ही फालतू बंधन बन जाएगा।

आप कहेंगे, “बनना बुरा”, तो लो आ गया ना बंधन। क्या? कि अब जीवनभर जो बनता हो, उसके विरोध में खड़े रहो।

आप कहोगे, “टूटना बुरा”, तो लो आ गया ना बंधन। क्या? कि जहाँ कुछ टूटता देखो, वहाँ उसे टूटने से रोको।

आप कहोगे, “टूटना अच्छा”, लो आ गया ना बंधन। क्या? कि जो कुछ भी अनटूटा मिले, तुम हथौड़ा लेकर उसे तोड़ने में लगे रहो।

आ गया ना बंधन?

95.

ये जो पूरा तर्क होता है न कि – मुझे अपने मन पर चलना है, मुझे अपने मन पर चलना है, उनसे पूछो, “तुम्हारा मन, तुम्हारा है क्या?” तुम्हारा मन बहुत तरीके से, दूसरों के प्रभुत्व में है।

पहली ग़ुलामी से बचना आसान है, दूसरी ग़ुलामी गहरी होती है। दूसरों की ग़ुलामी से बच लोगे, अपने मन की ग़ुलामी से बचना मुश्क़िल है।

96.

कभी भी इस तर्क को महत्त्व मत देना कि – ‘भई, अपनी-अपनी मर्ज़ी होती है’। अपनी मर्ज़ी, ‘अपनी’ होती ही नहीं। लाखों में कोई एक होता है, जिसकी अपनी मर्ज़ी होती है।

बाक़ियों की मर्ज़ी क्या होती है?

ग़ुलामी।

97.

हाँ, क्योंकि आत्म-अवलोकन ज़रा नहीं है, आत्म-ज्ञान ज़रा भी नहीं है, अपनी ज़िंदगी को कभी ध्यान से देखा ही नहीं, तो तुम्हें ये पता भी नहीं है कि, ‘मेरी मर्ज़ी’ जैसा कुछ है ही नहीं।

कुछ भी नहीं है तुम्हारी मर्ज़ी का।

98.

ग़ुस्सा माने – कामना पूरी नहीं हुई। भीतर से ऊर्जा उठी है। वो कह रही है, “कामना पूरी करनी है। मैं ज़ोर लगाऊँगी”। गुस्सा माने – ज़ोर लगाना।

“मैं जो चाहता हूँ, वो हो नहीं रहा, तो चाहत पूरी करने के लिए मैं ज़ोर लगाऊँगा” – इसका नाम होता है, ‘गुस्सा’।

99.

जहाँ कहीं भी कर्ता होने की, और अर्जित करने की भावना है, वहाँ जो मिला हुआ है, वो भी छिन जाता है।

जिसने भी ये सोचा कि अर्जित कर लूँगा , वो अंततः ये पाएगा कि अर्जित करने को तो कुछ था ही नहीं। अर्जित करने की प्रक्रिया में जो हमेशा से मिला हुआ था, उससे भी दूर हो गए।

अर्जित करने को तो वैसे भी कभी कुछ नहीं था। हाँ, अर्जित करने की प्रक्रिया में जो मिला ही हुआ था, उससे भी दूर हो गए।

100.

मौन वो है जो लगातार है, जिसका होना कभी कम या ज़्यादा नहीं होता। शब्द आते-जाते रहते हैं। शब्द कभी हैं, कभी नहीं हैं। वहाँ पर द्वैत है – शब्दों का होना या शब्दों का न होना। वो चलता रहता है। कभी शब्द हैं, कभी शब्द नहीं हैं।

मौन वो है जो लगातार है। जो शब्दों के होते हुए भी है, जो शब्दों के न होते हुए भी है। ठीक वैसे ही, जैसे मन में भविष्य के, अतीत के विचार आते-जाते रहते हैं, लेकिन वर्तमान सदा है। वो विचार है तो भी है, विचार नहीं है तो भी है।

101.

तो मंदिर कौन-सी जगह हुई? मंदिर वो जगह हुई, जहाँ का शब्द आपको मौन में ले जाए। जहाँ की भेरी, अनहद जैसी हो। जहाँ का घंटा, मौन जैसा हो। जहाँ का शब्द, शान्ति जैसा हो। वो ही जगह मंदिर है।

यही ‘मंदिर’ की परीभाषा है।

102.

काम छोटा-बड़ा नहीं है, मन छोटा-बड़ा है। बड़े मन से जो करा, वो बड़ा है। छोटे मन से जो भी करो, छोटा है।

103.

जब कर्ता नहीं रहता है, जब कर्म सिर्फ आत्मा की अभिव्यक्ति होता है, तब काम जैसा कुछ नहीं रह जाता। तब वह आत्मा का नृत्य होता है। आत्मा नाच रही है, आत्मा का नाच है, उसमें काम कहाँ है? कोई विषय-वस्तु है ही नहीं कि जिसको तुम कहो कि – “यह है और मैं इस पर काम कर रहा हूँ”।

104.

न पुरुष है, न विषय है। जब कर्ता-रुपी पुरुष होता है, तभी कर्म-रुपी विषय होता है।

न कर्ता है, न कृत्य है। आत्मा है, आत्मा का नाच है। अब कहाँ कुछ छोटा, और कहाँ कुछ बड़ा।

नाचते हो तो कहते हो क्या, कि इस नाच में जो ये वाली मुद्रा है वो छोटी है, और ये मुद्रा या ये गति या ये भाव या ये ताल बड़ी है? नाच तो नाच है, सम्पूर्ण है, पूरा है।

लेकिन वो स्थिति सिर्फ तब है जब आत्मा नाच रही हो।

पूरी धरती मंदिर सिर्फ तब है, जब तुम्हारा मन ही मंदिर बन गया हो। जब तक मन मंदिर नहीं बना है, तब तक तो तुम अपना मंदिर ध्यान से चुनना।

105.

हो तो आवाज़ ही रही है, पर आवाज़ ऐसी है कि मौन में ले जाती है। और कैसे मौन तक पहुँचोगे? मन तो जानता नहीं आवाज़ों  के अलावा कुछ।

दिख तो दृश्य ही रहे हैं, खड़ी तो सामने मूर्ति ही है, पर वो मूर्ति कुछ ऐसी है कि अमूर्त में ले जाती है।

मूर्ति का रूप कुछ ऐसा है कि अरूप की याद दिलाता हैc

दीवारों पर लिखे तो शब्द ही हैं, पर वो शब्द कुछ ऐसे हैं कि शांत कर देते हैं, हलचल नहीं मचा देते।

वहाँ हो तो कर्म ही हो रहे हैं, पर वो कर्म ऐसे हैं जो कर्ता को मिटा देते हैं।

जहाँ यह होने लगे, उसी जगह को मंदिर जानना। जहाँ ये न हो, वो जगह भले ही ‘मंदिर’ कहलाती भी हो, तुम उसे मंदिर मत मान लेना।

जहाँ जाकर तुम्हारा कर्ताभाव प्रबल हो जाता हो, जहाँ जाकर मन और अशांत हो जाता हो, जहाँ जाकर इन्द्रियाँ भर जाती हों, वो जगह भले ही बड़े से बड़ा मंदिर कहलाती हो, तुम उसे मंदिर मानना मत।

हट जाना वहाँ  से।