उक्तियाँ, जनवरी’१९ – फरवरी’१९

१.

आत्मज्ञान के अभाव में प्रेम कहाँ?

जो अज्ञान से चिपटा रहे,उसकी सज़ा यही है कि उसका जीवन प्रेम से खाली रहेगा।

उसे ऊब रहेगी, बेचैनी रहेगी, ईर्ष्या रहेगी, हिंसा रहेगी। आसक्ति रह सकती है, मोह और वासना भी।

बस प्रेम नहीं रहेगा।

वो वासना को, और आसक्ति को, अज्ञानवश प्रेम का नाम देता रहे तो दे।

२.

सत्य की तलाश वास्तव में शांति की तलाश है।

सत्य और शांति को तुमने अलग-अलग किया तो सत्य सिद्धान्त मात्र बनकर रह जाएगा।

सत्य तुम्हें मिला या नहीं मिला, इसकी एक ही कसौटी है: शान्त हुए कि नहीं? चैन, सुकून आया कि नहीं? और गहरा चैन तुमको जहाँ भी आने लगे, सत्य वहीं है। ना आगे, न पीछे।

३.

बंधनों का इंतज़ाम भी आप कर रहे हैं, और मुक्ति की प्रार्थना भी आप ही की है।

अपनी दासता के सारे प्रबंध आपने करे।

बंधन सब आपकी सहमति से हैं।

और रोज़ परमात्मा से विनती भी आप ही करते हैं कि मुक्ति दो।

तो दो हो आप: एक जिसे क़ैद में मज़ा है और दूसरा जिसे आज़ाद उड़ना है।

अब चुन लो।

४.

दुनिया दुख से भरी हुई है और हम लगातार कोशिश कर रहे हैं सुख पाने की।

हमारी चेष्टा में ही भूल है- हम सोच रहे हैं दुख , सुख से मिट जाएगा। इस कारण हम सुख की कोशिश कर रहे हैं।

हमने गलत समझा है। दुख, सुख से नहीं मिटता। दुःख मिटता है अज्ञान के मिटने से।

५.

प्रेम पंख देता है, पिंजड़ा नहीं

६.

दोषी को देख कर

तुममें आकर्षण या विकर्षण उठे,

तो समझ लेना तुम भी बराबर के दोषी हो।

और अगर दोषी को देख कर

तुममें उसके प्रति करुणा उठे,

तो समझ लेना तुम उस दोष से मुक्त हुए।

७.

न जानने से जानने तक की यात्रा बहुत दुष्कर नहीं होती।

कठिन होता है जानने से जीने तक आना।

जो न जानता हो उसे जनवाया तो जा सकता है, पर जो जानता हो वो जीना शुरू कर दे; ये जादू होता है।

जानते बहुत हैं, जीते कितने हैं?

८.

तुम्हारा जीवन किधर का है, ये जानने का सरल तरीका है:

देख लो समय किसको दे रहे हो।

९.

ईश्वर जिन्हें सज़ा देना चाहता है उन्हें उनके गलत कामों में सफलता दे देता है

१०.

जब सत्य असीमित है, ब्रह्म असीमित है, तो ब्रह्मलीनता की सीमा कैसे हो सकती है, वो भी तो असीम है।

बढ़ते रहना, बढ़ते रहना; प्राप्ति के बाद प्राप्तियाँ हैं। कोई भी प्राप्ति अधूरी नहीं है और कोई भी प्राप्ति आखिरी नहीं है। हर प्राप्ति पूरी है और हर प्राप्ति के बाद और भी यात्राएँ हैं…

११.

बड़ी बात वो जो याद दिला दे कि हर बात छोटी है

१२.

जब निगाह में मंज़िल बसी हो,

तब रास्ते में जो मिलता है,

तुम उसका सम्यक उपयोग कर ही लेते हो।

१३.

जीव को पूरी स्वतंत्रता है वो अपने आपको कुछ भी मान सकता है। कोई आपत्ति नहीं करेगा।

बस अस्तित्व की एक शर्त है-कि तुम अपनेआप को जो कुछ मानोगे, उसके तुमको अंजाम भुगतने पड़ेंगे। क्योंकि जो मानोगे, उस के अनुरूप विचार उठेंगे,और जो विचार उठेंगे वैसे कर्म करोगे,और फिर वैसा कर्मफल मिलेगा।

१४.

ध्यान से यथार्थ दिखाई देता है, तब बहुत लोग डर जाते हैं, ‘हकीकत इतनी डरावनी है कि उसे देखना नहीं चाहते’।

तब ध्यान के आगे चाहिए श्रद्धा, कि आश्वस्त रहो कुछ बिगड़ेगा नहीं, कोई संभाल लेगा।

साधना के यही दो पक्ष हैं – ध्यान और श्रद्धा। दोनों चाहिए। एक भी यदि अनुपस्थित हुआ तो अटकोगे।

१५.

समय पर नज़र रखो!

और समय पर नज़र तभी रख पाओगे जब नज़र के पीछे समय से आगे का कोई बैठा हो।

जहाँ कहीं समय नष्ट कर रहे होगे, समय के साथ तुम्हारा मन भी नष्ट हो रहा होगा।

जब समय का सदुपयोग करते हो,साथ-साथ तुम्हारा मन भी साफ़ होता है।

जब समय का दुरुपयोग करते हो, मन भी गंदा होता है।

~ आचार्य प्रशांत @Hindi_AP