ध्यान की इतनी विधियाँ क्यों? || आचार्य प्रशांत (2018)

ध्यान की इतनी विधियाँ क्यों

प्रश्न: आचार्य जी, अष्टावक्र कहते हैं कि ध्यान की विधियाँ बंधन हैं। मेरी जिज्ञासा यह है कि इतनी सारी ध्यान की विधियाँ क्यों हैं?

आचार्य प्रशांत जी: विधियाँ उनके के लिये हैं, जिन्हें सत्य को तो पाना है, और अपनी ज़िद्द को भी बचाना है। ख़ुदा को भी पाना है, और अपनी ज़िद्द को भी बचाना है। ध्यान की विधियाँ उनके लिये हैं।

जैसे की कोई सौ किलो वज़न उठाकर दौड़ने का अभ्यास करे, और कहे कि – बहुत मुश्किल है, और मंज़िल पर पहुँचने के लिये, कम-से-कम पाँच वर्ष का अभ्यास तो चाहिये। बिलकुल चाहिये पाँच वर्ष का अभ्यास अगर ज़िद्द है तुम्हारी कि सौ किलो वज़न लेकर ही चलना है। अब ये जो सौ किलो वज़न है, इसका नाम – ज़िद्द है, धृति है, अहंकार है।

तो एक तो तरीका यह है कि इस अहंकार को, उस झूठी आत्मीयता को, बचाये रखें, और साथ ही साथ ज़बरदस्त अभ्यास करते जायें। तो एक दिन, सुदूर भविष्य में एक समय ऐसा आयेगा, जब आप सौ किलो का वज़न लेकर भी आगे बढ़ जायेंगे, पहाड़ चढ़ जायेंगे। और सहज तरीका यह है कि वो जो ज़िद्द है, उसको सहज ही नीचे रख दीजिये, और सहज जी आगे बढ़ जाईये। वो जो आप चाहते हैं, वो सहज प्राप्य है।

तो विधियाँ उनके लिये हैं, जो सशरीर स्वर्ग पहुँचना चाहते हैं। जो कहते हैं कि हमारा काम -धंधा, हमारी धारणाएँ, हमारी मान्यताएँ , जैसे हैं, वैसी ही चलती रहें, और साथ ही साथ मुक्ति भी मिल जाये। तो फिर उनको कहा गया है कि अभ्यास करो। अन्यथा अभ्यास की कोई ज़रुरत नहीं है।

तो अभ्यास आवश्यक है या नहीं, वो इस पर निर्भर करता है कि आपमें सत्य के प्रति एकनिष्ठ प्यास है या नहीं। अगर आपमें एक निष्ठप्यास है, तो किसी अभ्यास की ज़रुरत नहीं। पर अगर आपका चित्त यदि खंडित है, बंटा हुआ है, दस दिशाओं में आसक्त है, तो फिर तो बहुत अभ्यास करना ही पड़ेगा।

और याद रखिये, आसक्ति मजबूरी नहीं होती। आसक्ति एक चुनाव होती है।

आप चुनते हो अपनी आसक्तियाँ।

चूँकि आसक्ति एक चुनाव होती है, इसीलिये आपको सहज ध्यान, सहज समाधि भी चाहिये या नहीं, ये बात भी आपके चुनाव पर है।

चुनिये – तो अभी मिल जाये। न चुनिये – तो कभी न मिले।

फिर ये कहते रह जायेंगे कि जिनको अभी मिल गया, वो तो अपवाद थे। वो अपवाद नहीं थे। उन्होंने निर्णय किया था कि अभी चाहिये। और वो निर्णय मानसिक ताल पर नहीं होता, बौद्धिक ताल पर नहीं होता, बहुत विचार करके नहीं होता। वो निर्णय प्रेमवश होता है, वो निर्णय बड़ी मजबूरी में होता है। वो निर्णय बड़ी कातरता में होता है, बड़ी विवशता में होता है। आप चाहकर भी उस निर्णय को बदल नहीं सकते। वो निर्णय, निर्विकल्पता में होता है।

सोच समझकर निर्णय करेंगे, तो कभी नहीं कर पायेंगे। सिर्फ़ सच ही चाहिये – ये निर्णय तो वो करते हैं, जो पूरे तरीके से बिक जाते हैं, मजबूर हो जाते हैं। जो अभी बिक नहीं हैं, जिनके अभी बहुत डेरे हैं, धंधे हैं, तमाशे हैं, वो यह कह ही नहीं पायेंगे सहजता से, “और कुछ नहीं, बस एक चाहिये”। तो वो बस फिर अपने आप को बहलाने के लिये, ढांढस बंधाने के लिये, सांत्वना ही देने के लिये, विधियों का अभ्यास करते हैं। ताकि खुद को फुसला सकें कि काम चल रहा है, कार्य प्रगति पर है। ताकि कहीं वो स्थिति न आ जाये कि ख़ुद को ही मुँह न दिखा पायें।

तो आदमी अपने आप को ही ज़रा बहला-फुसला लेता है, ज़रा स्वयं से ही ढोंग कर लेता है। अपनी ही नज़रों में न गिर जाये, इसलिये। क्योंकि सैद्धान्तिक ताल पर, नैतिक तल पर, उसने मान तो लिया होता ही है कि जीवन का परम लक्ष्य है – मुक्ति। तो कैसे समझाये अपने आप को, कि जब परम लक्ष्य ही है मुक्ति, तो मैं तमाम तरीके के धंधे-तमाशों में क्यों फंसा हुआ हूँ। तो वो फिर कहता है, “मैं फंसा तो हूँ, पर मुमुक्षा भी मुझमें बहुत है। देखो न मैं रोज़ ध्यान करता हूँ”। ये आत्म-प्रपंचना है, ये ख़ुद को धोखा दिया जा रहा है।

पर चलिये, कोई बात नहीं। सौ किलो वज़न उठाकर भी, क्या पता दस-बीस-पचास, सौ साल में कोई पहाड़ चढ़ ही जाये।

प्रश्न: आचार्य जी, पतंजलि ने योग की विधियों के बारे में एक उदाहरण दिया है कि – एक बच्चा बैठा हुआ है कुर्सी पर, और वो कुर्सी पर से भाग जाने के लिये मचल रहा है। जब तक हम उसे भागने से रोकते रहेंगे, तब तक उसका मन मचलता रहेगा, और वो बैठे-बैठे भी कभी कुछ हरकत करेगा, कभी कुछ। यदि हम उससे कहें कि वो सात चक्कर दौड़ लगाकर आये, तो वो आकर, शांत होकर, कुर्सी पर बैठ जायेगा, और उसका मन भी मचलना बंद हो जायेगा। क्या इन्हीं उदाहरणों को मापदंड बनाकर पतंजलि ने सविकल्प समाधि, व् अन्य विधियाँ दीं?

आचार्य जी: वो तो इस पर निर्भर करता है कि आप अपने आप को बच्चा बनाये रखना चाहते हैं, या नहीं। समाधि बच्चों का तो खेल है नहीं। बड़े-बड़े व्यस्क अगर अपने आप को बच्चा ही मानकर, प्रकृति ही मानकर रहेंगे, तो फिर तमाम तरीके की विधियाँ ही चाहियें।

बच्चा तो योनिज है, प्रकृतिज है। अभी उसकी चेतना जागृत हो सके, उसका काल ही नहीं आया है। हम दो साल के, या चार साल के बच्चे की बात कर रहे हैं। तो ऐसों के लिये तो कोई ग्रन्थ, कोई गुरु नहीं कहता कि समाधि संभव है। पर ये उदाहरण बड़ों पर लागू नहीं होता। और बड़ा यदि बच्चे जैसा आचरण कर रहा है, तो फिर वो समाधि का न अभिलाषी है, न अधिकारी।

भीतर निश्चित रूप से एक बच्चा बैठा रहता है। पर प्रौढ़ता का मतलब ही यही है कि आप उस बच्चे को पीछे छोड़ आये। तमाम तरीके की अपरिपक्व ग्रंथियाँ भीतर विद्यमान तो रहती ही हैं। पर प्रौढ़ता का, व्यस्कता का मतलब ही यही है कि आप आगे बढ़ गये। भीतर जो बन्दर बैठा है, भीतर जो उधम करने वाला, शोर मचाने वाला बच्चा बैठा है, आप अब वो नहीं रहे।

संवाद देखें :  ध्यान की इतनी विधियाँ क्यों? || आचार्य प्रशांत (2018)

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