ग्लानि और हीन भावना || आचार्य प्रशांत (2019)

ग्लानि और हीन भावना

प्रश्न: आचार्य जी, ग्लानि भाव को कैसे दूर करें?

आचार्य प्रशांत जी: “साइकिल बहुत तेज़ दौड़ाई, बहुत तेज़ दौड़ाई, पर सौ की गति नहीं पाई। अब बड़ी ग्लानि हो रही है कि ज़रूर मैंने ठीक से श्रम नहीं किया”।  या –  “ज़रूर मेरी साइकिल में कुछ कमी थी, सौ की गति नहीं आई”।

मूल भूल क्या है? तुमने श्रम नहीं किया, या तुम साइकिल पर सवार हो? मूल भूल ये है कि तुमने श्रम नहीं किया, या मूल भूल ये है कि तुम साइकिल से सौ की गति की अपेक्षा रख रही हो?

श्रोता: साइकिल से सौ की गति की अपेक्षा रखना।

आचार्य जी: लेकिन साइकिल से मोह है। तो तुम ये मानने को तैयार नहीं होओगे कि – मैं जो हूँ, और ये जो साइकिल है, ये सौ तक कभी पहुँच ही नहीं सकते। सही भूल न माननी पड़े, इसीलिये एक नकली भूल का निर्माण किया जाता है। उस नकली भूल का नाम है – ग्लानि।  कि – “साइकिल तो ठीक ही है, थोड़ी सी ताक़त और लगाते तो सौ की गति आ ही जाती”।  जानते हो न ग्लानि क्या बोलती है? ग्लानि बोलती है – “हम तो बहुत अच्छे हैं, बस भूल कर बैठे”।

तुम भूल नहीं कर बैठे। तुम जो कर रहे हो,  तुम वैसे ही हो। ग्लानि क्या दिखा रहे हो? जैसे कि तुम दौड़ो बहुत ज़ोर से, और तुम्हें ग्लानि उठे कि तुम उड़ क्यों नहीं पाये।  कितनी भी ज़ोर से दौड़ लो, तुम उड़ थोड़े ही जाओगे। तुम ऐसे ही हो ।

तुमसे वही होता है, जैसे तुम हो। वो होना अपरिहार्य था। अब पछता क्यों रहे हो?

पछताकर के तुम अपने लिये एक धोखे का निर्माण कर रहे हो।

क्या कहता है वो धोखा? हम बुरे हैं नहीं, हमसे बुराई हो गयी।

हमसे दुर्घटना हो गयी। संयोग हो गया।

हम लापरवाह हैं नहीं, हम लापरवाह हैं नहीं, हमसे लापरवाही हो गयी। वैसे तो हम बहुत अच्छे आदमी हैं, बस आज लापरवाही हो गयी। हम शांत हैं, बस दुर्घटनावश हिंसा हो गयी हमसे। हम हिंसक हैं नहीं, हमसे हिंसा हो गयी। तो अब ग्लानि उठेगी कि – “मुझ जैसे शांत व्यक्ति से हिंसा हो कैसे गयी?”

तुम मूल दोष को छिपाने के लिये, एक छोटे दोष का आविष्कार कर रहे हो। मूल दोष ये नहीं है कि हिंसा कर दी। मूल दोष ये है कि तुम हिंसक हो ही। तुम्हारा हिंसक होना छुपा रह जाता था, आज सामने आ गया। तो इस घटना को धन्यवाद दो कि तुम्हारे भीतर की हिंसा का उद्घाटन हो गया। पर धन्यवाद देने की जगह हम पछताते हैं। हम कहते हैं, “हिंसक तो मैं हूँ ही नहीं। आज बस गड़बड़ हो गयी है”। गड़बड़ नहीं हो गयी है, वही हुआ है जो होना था। ग्लानि किस बात की कर रहे हो? ग्लानि किस बात की?

श्रोता: लेकिन हम अपनी किसी गलती पर, यही कहते रहें कि हम हिंसक हैं इसलिये हिंसा हुई, या हम लापरवाह हैं इसलिये लापरवाही हुई, तो ऐसा करने में हीन भावना घर कर जाती है।

आचार्य जी: आनी चाहिये वो हीन भावना, क्योंकि हीन हो। अहंकार चाहता है कि हीन हैं, पर माने कि हम बहुत विशाल हैं।  यही तो अहंकार है – गुरूर, कि हीनता को स्वीकार ही नहीं करना। जब तुम्हें साफ़ -साफ़ दिख जायेगा कि हीन हो, तब उस हीनता को उठाकर के दूर फेंक दोगे। जब तक इसको(अहंकार को) लेकर ये भ्रम बनाये रखोगे कि – “नहीं, नहीं ये वैसे तो अच्छा है, बस आज ही इससे भूल हो गयी, तब तक तुम इसको पकड़े रहोगे। तुम कहोगे, ” ये चीज़ तो ठीक ही है, बस आज ही इससे भूल हो गयी”।

जिस दिन तुम्हें दिख गया कि ये चीज़ ही गड़बड़ है, उस दिन तुम इसे उठाकर के फेंक दोगे। तो अच्छा है कि तुम्हें तुम्हारी हीनता, पूरी निर्ममता और पूरी नग्नता के साथ साफ़-साफ़ दिख जाये। हीनता की फिर रक्षा तो नहीं करोगे तुम कम-से-कम।

अभी तो ये होता है कि हीनता को छुपा-छुपा कर तुम उसकी रक्षा करते रहते हो ।

संवाद देखें :  ग्लानि और हीन भावना || आचार्य प्रशांत (2019)

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