आध्यात्मिक ग्रंथों की क्या उपयोगिता है? || आचार्य प्रशांत (2018)

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प्रश्न: आध्यात्मिक ग्रंथों की क्या उपयोगिता है? आध्यात्मिक ग्रंथ किन्हें पढ़ना चाहिए, और किन्हें नहीं? क्या आध्यात्मिक ग्रंथ सबके पढ़ने लायक हैं? आध्यात्मिक ग्रंथ कैसे उपयोगी हैं?

आचार्य प्रशांत जी: ग्रंथ ज्ञान नहीं देते हैं। ग्रंथों से ज्ञान नहीं मिलता है। हालांकि पारंपरिक रूप से ऐसा कहा गया है, और ऐसा माना भी गया है कि ज्ञानोपार्जन होता है, ज्ञानमार्ग ही है पूरा। पर ग्रंथ ज्ञान नहीं देते, ग्रंथ गवाही देते हैं। आपके सामने दो खड़े होते हैं, प्रार्थी।

थोड़ी-सी अलग बात है।

हम कुछ नहीं। हम अहंता हैं। हम तो अपनी मिश्रित चेतना हैं। लेकिन अपनी दृष्टि में हम राजा होते हैं, क्योंकि हम ही चुनते हैं। मंदिर जाना है, या नहीं जाना है, ये भी तो हम चुनते हैं न? तो हम अपनी नज़र में तो इतने बड़े हैं, कि हम ये भी चुनाव कर लेते हैं कि हमें भगवान अभी चाहिए, या नहीं चाहिए।

तो हम बैठे होते हैं न्यायधीश की कुर्सी पर, और हमारे सामने दो खड़े होते हैं प्रार्थी। प्रार्थियों में एक तो होता है – सत्य, और दूसरा होता है – भ्रम। अगर एक सत्य है, तो दूसरा तो भ्रम ही होगा। अब ये सुनने में बात अजीब है कि – ऊपर जो बैठा है, वो अहंकार है। और उसके सामने सत्य प्रार्थी की तरह खड़ा है।

हाँ, बिलकुल ऐसा ही है ।

हमारे सामने परमात्मा प्रार्थी की तरह ही तो खड़ा है। हम कभी उसकी सुनते हैं, कभी उसकी नहीं सुनते हैं। तो ऐसे में ग्रंथ काम आते हैं। वो गवाही दे देते हैं। अब आपके सामने सत्य खड़ा है, और भ्रम खड़ा है। ग्रंथ आ गया। आप तो न्यायधीश बने हुए हो। और न्यायधीश क्या माँगता है? गवाही लेकर आओ, सबूत लेकर आओ। अब झूठ के पास बहुत सबूत होते हैं। सारे सबूत होते ही किसके पास हैं?

श्रोता: झूठ के पास।

आचार्य प्रशांत जी: सत्य के पास सबूत नहीं होता है। इसलिए हारता कौन है? सत्य। हम निर्णय किसके पक्ष में कर देते हैं?

श्रोता: झूठ के पक्ष में।

आचार्य प्रशांत जी: हम ही तो झूठ के पक्ष में निर्णय किए जाते हैं, उसी से तो दुनिया चल रही है। लेकिन सत्य को एक गवाह मिल जाता है – ये ग्रंथ। फ़िर इसकी सहायता से, कभी-कभी सत्य जीत जाता है। तो ये आकर गवाही दे देते हैं।

हमारे ही भीतर तो सच और भ्रम दोनों हैं न?

लेकिन ये जो सच की आवाज़ होती है, समझाने के उद्देश्य से कह रहा हूँ, ये बड़ी झीनी होती है। बड़ी मंद होती है। झूठ चिल्ला-चिल्ला कर बोलता है, सारी इन्द्रियों से बोलता है – कानों में भी झूठ घुस रहा है, आँखों में भी झूठ घुस रहा है, स्मृति में भी वही बैठा है, बुद्धि में भी। तो सच हारता रहता है।

ग्रंथ आते हैं, तो कहते हैं, “सुनो बेटा! ये जो सच बोल रहा है न, ये बात खोखली नहीं है। ये बात हम भी बता रहे हैं।” तो जो आप ग्रंथ पढ़ते हो, आपको कोई नई बात नहीं पता चलती है। इसलिए मैंने कहा – “ज्ञान नहीं देते ग्रंथ।”

ग्रंथों से आपको वही पता चलता है, जो सत्य आपसे पहले ही बोल रहा था। लेकिन क्योंकि वो आंतरिक सत्य था, इसलिए बड़े मद्धम स्वर में बोल रहा था।

जो बात अष्टावक्र कह रहे हैं, वो बात आपको पता है, पहले से पता है। लेकिन जब तक वो बात अष्टावक्र की नहीं है, आपकी है, तब तक उस बात में तीव्रता कितनी है? ज़ोर कितना है? कुछ नहीं। क्योंकि तब तक वो बात हमारी अपनी है न। जानते हैं हम, पर हमारे भीतर एक बैठा है जो भीनी-सी आवाज़ में बोल रहा है, और हमारे भीतर एक बैठा है जो शेर-भालू की तरह ज़ोर-से चिल्ला रहा है।

तो ग्रंथ आकर कहते हैं कि –

“उसका पक्ष लो, जो बड़ी भीनी-सी, बड़ी कोमल आवाज़ में बोल रहा है।”

उसका पक्ष लो!

सत्य बड़ा दुर्बल होता है। अब ये बात भी बड़ी अजीब लगेगी। सत्य को तो हमने कहा है कि वो बलवानों से बलवान है। पर हमारे भीतर का जो सत्य है, वो बड़ा दुर्बल है। क्योंकि उसको देखने वाला कौन है? उसको देखने वाला है – अहंकार। और अहंकार जब सत्य को देखता है, तो अहंकार के लिए सत्य बड़ी दुर्बल चीज़ है।

हाँ, सत्य की दृष्टि से देखें, तो कहा जाएगा कि वो बली ही नहीं, वो बलातीत है। सच की नज़र से सच को देखें, तो आप कहेंगे कि सच बलवानों से बलवान है। और जब अहंकार न्यायधीश हो, और सच को देखा जाए, तो सच कैसा दिखाई देगा? दुर्बल, रोगी, मरियल।

ये ग्रंथ फ़िर आकर गवाही दे देते हैं। इसलिए ये उनके ही काम आते हैं, जिनके भीतर सच की मद्धम और सूक्ष्म ही सही, लेकिन आवाज़ ज़रूर हो।

जैसे कि – “आवाज़ मेरे भीतर भी थी, लेकिन ये पता नहीं चल रहा था कि इसका पक्ष लूँ या न लूँ। इसकी तरफ़ फ़ैसला दूँ या न दूँ। और तभी मेरे सामने ये आ गए, और मैंने कहा कि भाई, जो बात मुझे लग रही थी, वो बात मुझे यहाँ भी मिली।”

“यहाँ से नहीं मिली, यहाँ भी मिली। थी मेरी, गवाही देने ये आ गए।”

ग्रंथ काम आते हैं। और जो लोग ऐसे जाते हैं कि – “ये चीज़ मेरे भीतर तो है नहीं, तो इनको पढ़कर कुछ जान जाऊँगा, ज्ञान अर्जित कर लूँगा,” उनको कुछ नहीं मिलता।

वहाँ बात ऐसी है कि अभी मुकदमा शुरू ही नहीं हुआ है। मुकदमा है ही नहीं। क्यों? दोनों पक्षों में से एक पक्ष नदारद है। कौन-सा पक्ष? सत्य का। अब जब सत्य का पक्ष ही नदारद है, तो तुम सबूत लाकर क्या कर लोगे ? गवाह लाकर क्या कर लोगे? पहले प्रार्थी खड़ा तो होना चाहिए, तब तो उसके पक्ष में तुम कुछ सबूत लाओ तो फ़ायदा होगा।

मरीज़ ज़िंदा तो होना चाहिए, कि तुम दवाई दो तो फ़ायदा हो उसको कुछ। जहाँ मरीज़ है ही नहीं, जहाँ मरीज़ बचा ही नहीं, इतना क्षीण हो गया कि मरीज़ ख़त्म हो गया, उसको तुम दवाई लगा रहे हो। ये दवाईयाँ हैं, गवाहियाँ हैं, इन्हीं तरीकों से इनकी, ग्रंथ की, बात करता हूँ।

दवाई भी किसके काम आती है? जिसके भीतर कुछ तो प्राण बचा हो।

तो जिसके भीतर प्राण थोड़े बचे होते हैं, या कहिए कि प्राण उठने लगते हैं, ये उनके काम के हो जाते हैं।

जिसके भीतर से सच आवाज़ देने लगता है, भले ही बड़ी मद्धम आवाज़ में, ये उनके काम के हो जाते हैं। पर जिनके भीतर से अभी आवाज़ उठ ही नहीं रही, या आवाज़ इतनी दबा दी गई है कि उसका कुछ पता नहीं लग रहा, उनके ये काम नहीं आएँगे। तो उनको फ़िर मैं पढ़ने को भी नहीं बोलता। उनसे मैं कहता हूँ कि तुम जाओ, ज़रा ज़िंदगी की ठोकरें खाओ। या तुम जाओ और ज़रा अपने ही जीवन का अवलोकन करो।

तुम्हारे भीतर से कुछ उठे तो!

कुछ ऊब उठे, कुछ ज्वाला उठे।  

कुछ विद्रोह उठे।

तो फ़िर तुम्हारे हाथ में ये ग्रंथ दें।  

जिसको अभी भीतर से संतुष्टि ही संतुष्टि है, जो कह रहा है कि – “जैसा चल रहा है, सब बढ़िया है, कोई समस्या नहीं है,” जो कह रहा है, “भ्रम है तो बढ़िया है, झूठ है तो बढ़िया है, लालच है तो बढ़िया है, वासना है तो बढ़िया है। जितने तरीके के विकार हो सकते हैं, सब ठीक हैं, सब स्वीकार्य है,” जिसके साथ अभी ये चल रहा है, उसको ग्रंथ देने का भी कोई औचित्य नहीं।

ग्रंथ उसको दिये जाएँ, जिसके भीतर से कोई विरोध में खड़ा होना शुरू हो जाए।

दो पक्ष बन जाएँ।

मुकदमा शुरू तो हो पहले।

समझ रहे हैं न? कहीं से कोई आए, जो कहे, “मैं विरोध कर रहा हूँ, और मैं मुकदमा दायर करूँगा, क्योंकि मुझे लगता है कि मेरे पक्ष में फ़ैसला होना चाहिए।”

विरोध उठे! अगर विरोध ही नहीं उठ रहा है, तो ग्रंथ क्या करेगा?

तो वो जो आपने बात कही वो मौलिक है, और बहुत पुरानी भी। आपके लिए मौलिक है, और वैसे सदा-सदा से घटती आई है। लेकिन शुभ है बात! और ऐसे ही होना चाहिए।

गुरु के सामने कोई आए, जिसके भीतर अभी पात्रता पैदा होनी शुरू ही नहीं हुई है, गुरु उसे कुछ नहीं दे सकता।

दुनिया के सारे गुरु असहाय हैं।

वहाँ अगर कुछ देने की कोशिश भी की जाएगी, तो वो असफ़ल रहेगी।

हाँ, ये ज़रूर सकता है कि दिख भी जाए कि सामने कोई कुपात्र बैठा है, तो गुरु किसी स्वार्थवश या लालचवश उसको कुछ थमा दे। लेकिन, वो जो चीज़ थमाई जा रही है, वो उसके काम आएगी नहीं।


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