समाज से मिली शर्म (On Osho: Guilt acquired from society) ||आचार्य प्रशांत, ओशो पर (2018)

समाज

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आचार्य प्रशांत जी: आपके नेता, महंत, अभिभावक सबके सब ग्लानि के निर्माता हैं क्योंकि वही अकेला तरीका है कि आपको नियंत्रण में रखा जा सके, आपको धोखा दिया जा सके। बड़ी विचित्र प्रक्रिया है। वो पहले तुम्हें समझाते हैं कि तुममें खोट है, फिर तुमसे कहते हैं तुम्हारी खोट का इलाज सिर्फ हमारे पास है। इन दोनों व्यक्तव्यों को जोड़ के बताओ क्या कहा उन्होंने?

वो पहले तुमसे कहेंगे कि तुममें खोट है और इस खोट को सिर्फ हम मिटा सकते हैं, तो क्या कह रहे हैं वो?

श्रोता: हमारे पास आ जाओ।

आचार्य प्रशांत जी: हमारे पास नहीं आ जाओ, हमारे नीचे आ जाओ।

अगर चाहते हो कि तुम्हारी खोट मिटे, तो फिर जैसा हम कह रहे हैं करते चलो, हमारे नियंत्रण में रहो। दूसरे के भीतर ग्लानि जगाना ज़रूरी है, यही एक मात्र तरीका है उसे को काबू में रखने का।

तुम अपने ही खिलाफ जा सको इसके लिए ज़रूरी है कि तुम्हें बता दिया जाए कि अपने साथ जाना कोई गंदी बात है, तुम्हारे भीतर अनैतिकता का डर बैठाना ज़रूरी है।

जानते हो तुमसे क्या कहा जाता है?

तुमसे कहा जाता है कि प्रेम के प्यासे हो तुम, सम्मान के प्यासे हो तुम और वो सब कुछ तुमको हमसे ही मिलना है। हमसे तुम्हें वो सब तब मिलेगा जब तुम हमारी शर्तों  के अनुसार आचरण करो। जो कुछ तुम हमारी शर्तों के अनुसार आचरण कर रहे होगे तो उसका नाम होगा ‘अच्छा’ और जो कुछ तुम हमारी शर्तों के खिलाफ कर रहे होगे उसका नाम होगा ‘बुरा’।

तुमने अच्छाई-बुराई के पैमाने और पाए कहाँ से?

तुम्हें कैसे पता क्या अच्छा क्या बुरा? तुम्हें किसने सिखाया क्या तुम्हारे कर्तव्य हैं? किस चीज़ का नाम ज़िम्मेदारी है? तुम्हे कैसे पता कैसे जीना चाहिए कैसे मरना चाहिए? कैसे रहना चाहिए? पैसे का क्या अर्थ है? परिवार का क्या अर्थ है? प्रेम का क्या अर्थ है? जीवन ही क्या है ये तुम्हें किसने बताया?

ये सब तुम्हें दूसरों ने बताया।

उनका कहा मान लो तो तुम ठीक जी रहे हो, उनका कहा ना मानो तो तुम गलत जी रहे हो। तुम गलत जी रहे हो तो तुम्हें सिखाया गया है कि तुम्हें अपने ही प्रति छुद्रता अनुभव करनी चाहिए। इसका नाम है ग्लानि।

तुम देख रहे हो यह खुला पाखण्ड? कैसा षडयंत्र है?

तुमसे कह रहे हैं ‘देखो! तुम हमारे अनुसार चलना और जब हमारे अनुसार न चल पाओ तो खुद को पापी मान लेना’

पुण्य क्या हुआ?

‘हमारा अनुसरण करना, हमारी आज्ञा का पालन करो तो पुण्य और जो कुछ हमारी आज्ञा के खिलाफ जाता हो वो पाप और हमे ये ज़रूरत भी नहीं पड़नी चाहिए कि हम जताए कि तुम पापी हो। हम तुम्हारे भीतर ग्लानि बैठा देंगे। हमने तुम्हें सिखा दिया है कि जब भी तुम हमारे खिलाफ जाओ, तुम अपनी हीं नज़रों में गिर जाना’

जैसे आप किसी को सिखा दे कि तू जब भी मेरी बात न माने खुद को दो थप्पड़ मार ले। ये ग्लानि है। ग्लानि इसलिए थोड़े ही उठती है कि तुम्हारी आत्मा ने बताया है कि तुम गलत हो। ग्लानि तुम्हें इसलिए उठती है क्योंकि तुम्हें समाज ने बताया है कि तुम गलत हो।

आत्मा से तुम जानते हो, बोध उठता है और बोध की परिणीति कभी ग्लानि नहीं होती। ग्लानि में तो तुम बचे रह जाते हो। बोध में तुम गल जाते हो।

ग्लानि तो पछतावा है; ग्लानी कहती है, ‘अरे! कुछ और करना था कुछ और कर गया!’ और बोध है जानना, बोध कहता है मैं जैसा हूँ उससे यही होना है। ग्लानि कहती है कुछ और था मेरा धर्म, कुछ और था मेरे लिए करणीय और मैं कुछ और ही कर गया, तो मुझे बुरा मानना चाहिए।

और बोध कहता है जैसी मेरी व्यवस्था है, वो व्यवस्था यही तो करती है, मैं समझ गया उस व्यवस्था को। मैं जान गया वो व्यवस्था और कुछ कर नहीं सकती,  बस ये भ्रम दे देती है कुछ और होगा। आदमी उसी आशा में जिए जाता है कि इसी व्यवस्था के रहते हुए कभी कुछ और हो जाएगा, न! जब तक ये व्यवस्था है जिसका नाम है मन, जिसका नाम है बुद्धि, जिसका नाम है दृष्टि, जिसका नाम है अंतःकरण, जिसका नाम है शरीर, जब तक ये व्यवस्था है तब तक वही होगा जो हो रहा है और अच्छा हुआ मैंने पकड़ लिया जो हो रहा है। पकड़ते ही व्यवस्था तो वही रही, बस मैं आज़ाद हो गया। अब व्यवस्था जो करती हो करे, उस व्यवस्था को मेरा समर्थन नहीं मिलेगा।

ग्लानि में यह कभी नहीं होगी।

ग्लानि में तुम व्यवस्था के साथ ही लगे रहते हो और ये उम्मीद करते रहते हो कि अचानक चमत्कार होगा और व्यवस्था बदल जाएगी। उम्मीद भी नहीं करते, तुम कहते हो व्यवस्था बदली ही हुई है। बस पता नहीं क्यों कुछ अज्ञात कारणों से इसबार अपेक्षित फल नहीं दे पाई।

बार-बार तुम्हें कड़वा फल खाने को मिलता है, लेकिन तुम कहते हो ‘अरे! पेड़ तो ठीक ही है, कोई चूक हो गई है इसलिए कड़वा फल दे गया वरना पेड़ तो मीठे आम का है’। और कहते हो कुछ गलती हो गई; ये ग्लानि है।

कोई तुम्हें ज़ोर-जबर्दस्ती से डंडा मार के दबाए तुम विद्रोह कर दोगे, पर कोई तुम्हारे ही मन में घुस के बैठ जाए, तुम्हारे ही मूल्यों को विकृत कर दे, तुम्हें सीखा दे कि जब भी तुम आज़ाद हो के चलना तो अपनी ही नज़र में गिर जाना।

जब भी तुम्हारे भीतर प्रेम उठे तुम अपनी ही नज़र में गिर जाना, जब भी तुम ज़रा पंख फैलाना तुम अपनी ही नज़र में गिर जाना, जब भी तुम झूठ को झूठ बोल पाना, अपनी ही नज़र में गिर जाना।

तो ये बड़ी खौफ़नाक साजिश है इसे ग्लानि कहते हैं।

परोक्ष हिंसा है ग्लानि। कोई बाहर से तुम्हें दबाए तुम्हें हिंसा दिखाई देगी कि यह आया मुझपर दावेदारी करी, मालिक बनके बैठ गया। कोई तुम्हारे भीतर ही बैठ जाता है, और तुम्हें दबा देता है, तुम्हें पता भी नहीं चलता।


आचार्य प्रशान्त | शब्दयोग सत्संग | २४ अगस्त, २०१७ | अद्वैत बोधस्थल

संवाद देखें : समाज से मिली शर्म (On Osho: Guilt acquired from society) ||आचार्य प्रशांत, ओशो पर (2018)

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