तुम मानव हो या मशीन? || आचार्य प्रशांत, युवाओ के संग (2013)

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प्रश्न: आचार्य जी, अचानक गुस्सा क्यों आता है?

आचार्य प्रशांत: बल्ब चालू करते हो, कितना टाइम लगता है बल्ब को जलने में? सब कुछ अचानक हो जाता है ना? हम भी वैसे ही हैं।

प्रश्नकर्ता: लेकिन बाद में दुःख होता है ना, कि हमने गलत किया !

आचार्य प्रशांत: बाद में वो जो बंद होता है पंखा चलने के बाद, तो गर्मी होती है उसमें खूब। गर्मी पैदा हो गई होती है, वो बाद में पता चलती है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, इसमें और मेरे प्रश्न में क्या सम्बन्ध है?

आचार्य प्रशांत: सम्बन्ध यह है कि हम ऑटोमैटिक (यंत्रवत) जी रहे हैं। हम में कोई चेतना नहीं! जैसे एक पंखा ऑटोमैटिक है ना? इधर दबाया नहीं कि चालू हुआ। बटन है। वैसे ही हमारे मन में बटन है। बटन है – गाली! गाली दी नहीं कि…..?

प्रश्नकर्ता: गुस्सा।

आचार्य प्रशांत: जैसे ये फ़ोन है, ये वॉइस-ऑपरेटेड (ध्वनि-संचालित) भी है। मैं इसको यहाँ से कुछ बोल दूँ, तो ये कुछ काम करना शुरू कर देता है। सारे ही फ़ोन अब ऐसे होने लग गए हैं। तो मैंने इस फ़ोन को कुछ बोला नहीं कि इसने काम करना…..?

श्रोतागण: शुरू कर दिया।

आचार्य प्रशांत: शुरू कर दिया। वैसे ही मैंने तुम्हें गाली दी नहीं कि तुमने गुस्सा करना…..?

श्रोतागण: शुरू कर दिया।

आचार्य प्रशांत: ऑटोमैटिक है। क्योंकि ‘चेतना’ नहीं है इसमें कहीं। ‘मैं’ कहीं मौजूद नहीं हूँ, एक मशीनी काम चल रहा है। ऐसा हमारा जीवन है। लड़की दिखी नहीं कि, उत्तेजना हो गई! नाक में खाने की खुशबू पड़ी नहीं कि लार टपकनी शुरू हो गई।

‘पावलोव’ का नाम सुना है? उसने यही प्रयोग किया था। उसने कुछ कुत्ते इकट्ठा किए। कुत्तों को जब भी रोटी देता, तो साथ में घंटा बजाता। अब रोटी की खुशबू जा रही है, तो लार टपकनी शुरू हो जाती, और साथ में घंटी बजती। कुछ दिनों बाद उसने रोटी देनी बंद कर दिया, सिर्फ़ घंटी बजाना शुरू किया। एक बड़ी अजीब स्थिति आई। जैसे ही घंटी बजती, वो कुत्ते लार बहाना शुरू कर देते थे।

हम वैसे ही हैं। ऑटोमैटिक! आवाज़ आई, लार बहनी शुरू। उसमें ‘चेतना’ कहीं नहीं है। तो कुत्तों को पता नहीं है ना कि क्या कर रहे हैं! वैसे ही हमें भी समझ में नहीं आता कि हम क्या कर रहे हैं। समझे नहीं, कि ऑटोमैटिसिटी (स्वत: चलन) बंद हो जाएगी। कुछ और शुरू हो जाएगा।

देखो, आदमी के अस्तित्व के दो छोर हैं।

एक छोर पर हम पूरी तरीके से मशीन हैं।

दिल एक बड़ी कुशल मशीन है, आँख भी एक बड़ी कुशल मशीन है। आदमी के दिमाग जितनी कुशल मशीन आज तक कोई वैज्ञानिक बना नहीं पाया।

ये एक छोर है हमारे होने का, जहाँ पर कोई ‘जीवन’ नहीं है। गति दिखाई तो पड़ती है, पर वो गति मृत-स्वरुप है; पूर्व-निर्धारित गति है।

दूसरे छोर पर हम पूरे तरीके से स्वतन्त्र हैं।

वहाँ कोई पूर्व-निर्धारित तरीके से नहीं चल सकता।

ये तुम्हें तय करना है कि तुम किस छोर पर जीना चाहते हो। ये पक्का है कि मशीन वाले छोर पर रहोगे तो बेचैन रहोगे। जैसे तुमने कहा ना, “गुस्से के बाद अफ़सोस होता है,” तो ज़िन्दगी अफ़सोस में बीतेगी। ये तुम्हें तय करना है कि इस छोर पर जीना है या उस छोर पर।

प्रश्नकर्ता: स्वतन्त्रता में पर कोई सुरक्षा नहीं है!

आचार्य प्रशांत: सुरक्षा नहीं है! पर मज़े की बात यह है कि तब यह ख़याल भी नहीं है कि – ‘मैं असुरक्षित हूँ’।

सुरक्षा की तलाश उसी दिन तक है जब तक पहले ये ख़याल आए कि मैं….?

श्रोतागण: असुरक्षित हूँ।

आचार्य प्रशांत: जब ये ख़याल ही ना आए कि – ‘मैं असुरक्षित हूँ’, तो तुम सुरक्षा क्यों माँगोगे?

सही बात तो यह है कि तुम अभी-भी बहुत असुरक्षित हो! अभी भूकंप आ सकता है, मर सकते हो। और अगर सोचना शुरू कर दो, – ‘आने वाला है, आने वाला है’, तो पसीने-पसीने हो जाओगे। अभी तुम शांत हो कर इसलिए बैठ पा रहे हो, क्योंकि यह ख़याल ही नहीं है कि तुम असुरक्षित हो? ख़याल आना शुरू हुआ नहीं कि तुम पागल हो जाओगे।

और असुरक्षाएँ हज़ार तरीके की हैं। क्या पता अभी तुम्हारे शरीर के भीतर कैंसर पनप रहा हो? क्या पता? क्या पता कौन-सा ट्रक इंतज़ार कर रहा है किसी कोने पर? आज ही बाहर निकलो और सारी सम्भावनाएँ खोजना शुरू कर दो कि क्या-क्या हो सकता है। तुम्हारे लिए मुश्किल हो जाएगा बैठना यहाँ पर।

हो सकता है ज़मीन फट जाए और तुम उसमें समा जाओ!

(अट्टहास)

और बाहर निकलने का कोई तरीका भी ना बचे! तुम अंदर गए तो दरवाज़ा बंद हो गया। सोचो कितनी मज़ेदार कल्पना है! ये अंदर गया, और दरवाज़ा बंद!

होने को तो कुछ भी हो सकता है!


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