‘ना’ बोलने में झिझक || आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग (2014)

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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब कोई कुछ बोलता है तो न चाहते हुए भी ‘ना’ नहीं बोल पाता हूँ।

आचार्य प्रशांत जी: ‘ना’ तो तुम बोलते हो, ऐसा तो नहीं है कि ‘ना’ नही बोल पाते।

मंजीत उसको बोलो कि पंखे पर चढ़े।

चढ़ो!

तुम तो ‘ना’ बोल हीं नहीं पाते!

ऐसा नहीं है बेटा, ‘ना’ तो हम बोलते हैं, वहाँ हमारा गणित होता है। हमे अच्छे से पता है कहाँ ‘हाँ’ बोलनी है और किस सीमा के बाद ‘ना’ बोल देना है। ऐसा नहीं है कि हम ‘ना’ नहीं बोल पाते। तुम्हारा सवाल यह नहीं होना चाहिए कि मैं ‘ना’ नहीं बोल पाता, तुम्हारा सवाल ये होना चाहिए कि मेरा ये गणित कैसा है जो मुझे दुःख देता है?

तुम्हारी ‘हाँ’ और ‘ना’ ठीक नहीं बैठ रही यह है तुम्हारा सवाल। तुम ‘ना’ भी बोलते हो तुम ‘हाँ’ भी बोलते हो, बोलते तो तुम दोनों ही हो मगर जहाँ ‘ना’ बोलनी चाहिए वहाँ ‘हाँ’ बोल आते हो, जहाँ ‘हाँ’ बोलनी चाहिए वहाँ ‘ना’ बोल आते हो!

आमतौर पर हम ‘हाँ’ उस बात को बोलेंगे, उस व्यक्ति को बोलेंगे, उस घटना को बोलेंगे जो हमे हमारे जैसा बनाये रखती है। अपने जैसा बने रहने में हमने सुविधा बना ली है। जो हमे बदलती है, हमे तोड़ती है, हमे खोलती है; क्या नाम है आपका?

प्र: मनीष

आचार्य जी: अब मनीष ने अगर अपनी छवि ही यह बना ली हो कि मैं वो हूँ जो ‘ना’ नहीं बोलता, तो ‘ना’ बोलने में मनीष को दिक्कत आएगी। मनीष अब उस हर चीज़ को ‘ना’ बोलेगा जो इस छवि को तोड़ती है कि मनीष ‘ना’ नहीं बोलता। ध्यान दोगे तभी समझ आएगी बात।

मैं कौन?

मनीष, जिसकी छवि ही बन गई है कि मनीष वो जो ‘ना’ नहीं बोलता।

ऐसे लोग देखे हैं न कि “यह यारों का यार है!”,  “भाई यह सब की मदद करता है” ,”भाई तू रात में तीन बजे चला जा ये तेरी मदद करके दिखायेगा।” अब तुम तीन बजे उसके पास जायोगे तो उसका दिल तो जल रहा होगा, पर यह मदद करेगा, यह क्यों मदद करेगा?

छवि बचानी है न।

समझ रहे हो बात को?

अब उसी से प्रतिष्ठा मिलती है, वही बात तुम्हारे संबंधों का आधार बन गई है। कि यह छवि है कि ‘यह आदमी ‘ना’ नहीं बोलता’। स्वार्थ जुड़ गए है न तुम्हारे उस बात के साथ। दूसरे अब इसी कारण अब तुमसे संबंधित हैं। और तुम ऐसे हो नहीं कि दूसरों की स्वीकृति के बिना चल सको। मंजीत आजतक बोलता था; ‘मनीष यारों का यार है’, और मनीष खुश! मनीष को अब दिल में सांत्वना मिली हुई है कि मैं कुछ हूँ, मेरी कोई हैसियत है और मेरी क्या हैसियत है?

“यारों का यार”

और यारों का यार किसने बोला?

मंजीत ने बोला।

अब मंजीत पहुँचा; ‘भाई 10 हज़ार दियो, तू यारों का यार है’। मनीष के पास होते तो शायद दे भी देता, तो उसने बोला ‘ना’, क्या बोला?

‘ना’।

और जैसे ही उसने ‘ना’ बोला , मंजीत ने बोला; ‘तू यार नही गद्दार’। ऐसी चोट लगी मनीष को कि पूछिए मत। क्योंकि ऐसे भी पहले जो छवि थी वो बनाई कैसे थी? दूसरों से पूछ-पूछ के।

‘ऐ भाई! मैं अच्छा लगता हूं क्या?’

और भाई ने कह दिया ‘हाँ तू अच्छा लगता है’;

तो मैं क्या हो गया ‘अच्छा’

ऐसा ही तो होता है।

स्पा में पार्लर में जाकर तुम दस हज़ार खर्च कर आए और जब वापस आए तो किसी ने बोल दिया ‘ये क्या कर आए?’ आग लग जाती है ऐसा सुनकर, बर्बाद हो गए! क्योंकि जो किया था वो किया ही इस खातिर था कि दूसरे अच्छा बोले। अपने लिए तो किया नहीं था।

मैं कपड़े की दुकान पर था एक लड़की थी वो अपने साइज से दो साइज़ छोटा कपड़ा खरीद रही थी।

सेल्समैन समझा रहा है उसको; ‘देखिए नहीं चलेगा यह आपको, आपको आपके साइज का दूसरे रंग और डिज़ाइन का कुछ दिखा देता हूँ।’ लेकिन लड़की अपनी ज़िद्द पर कायम कि उसको यही अपने से दो साइज छोटा कपड़ा ही चाहिए क्यों?

क्योंकि कोई है जिसे यह रंग, ये डिज़ाइन पसंद है।

सोचो उसका क्या होगा अगर 6 घंटे उस कपड़े में रही! सांस नहीं आ रही! एम्बुलेंस बुलवानी पड़ी, सारे काण्ड हो गए! लेकिन अपने लिए खरीदा ही कब था?

नौकरी में सड़ रहे हैं, बर्बाद हो रहे हैं फिर भी किए जा रहे हैं क्योंकि अपने लिए नौकरी करी कब थी?

किसके लिए करी थी?

दूसरों के लिए।

कॉलेज में मन नहीं लगता, लेकिन फिर भी जम्हाहियाँ लिए जा रहे हैं और जिए जा रहे हैं, क्योंकि कॉलेज में अपने लिए आए ही कब थे?

किसने भेज दिया कॉलेज?

दूसरों ने।

हमे ‘हाँ’ और ‘ना’ कहना आता हीं कहाँ है?

यह पानी की बोतल, इसको अगर मैं टेढ़ा करूँ तो पानी बोलेगा क्या?

‘मुझे टेढ़ा नहीं करो मुझे सीधा जीने दो। सीधा जीना मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।’

बोलेगा?

कोई चेतना नहीं है न इसमें, इसकी केमिस्ट्री जैसा सिखा देती है, वैसा जिया जा रहा है। इसे ऊपर से गिरा दो यह इनकार कर सकता है? ‘कि गिरायो मत, मैं गिरना नहीं चाहता। मैं ऊँचा जीना चाहता हूँ, मैं अपने तल पर जीना चाहता हूँ।’ ये इनकार कर सकता है? तुम इनकार कर पाते हो, तुम्हें जब गिराया जाता है?

मैं किस गिराने की बात कर रहा हूँ, समझ रहे हो न? इसको तो गिराया जाता है भौतिक रूप से, तुम्हें कैसे गिराया जाता है?

प्र: मानसिक रूप से

आचार्य जी: इसको उबाला जाए तो क्या यह सौ डिग्री पर उबलने से इनकार कर पायेगा?

तुम्हें उबाला जाता है तो उबल जाते हो कि नहीं?

चार गाली कोई दे, अभी उबल जाओगे। जैसे पानी ‘ना’ करना नहीं जानता वैसे तुम भी ‘ना’ करना नहीं जानते।

पानी की केमिस्ट्री इसे चला रही है, तुम्हारी बायोलॉजी  तुम्हें चला रही है।

‘हाँ’ या ‘ना’ का असली निर्णयता तो चेतना हो सकती है बस, बाहर से दिए गए संस्कार या प्रभाव नहीं।

तुम्हारी अपनी समझ, होश, वहीं से ‘हाँ’ या ‘ना’ फूटता है। फिर तुम्हें सोचना नहीं पड़ता है कि हाँ बोलें या ना बोलें। उसमें एक सहजता होती है, निर्विकल्प सहजता, दस लोगों से पूछने की जरूरत नहीं पड़ी कि हां बोलें कि ना बोलें।

कहीं से पढ़कर नहीं आ गए कि ऐसे मौकों पर हां बोलना चाहिए, हमारे भीतर कोई बैठा है, उसने तत्काल बता दिया। और बैठा है कोई हमारे भीतर जिसने ना की घड़ी में ना ही बोला है, मैं चाहूं तब भी ना को हाँ नहीं कर सकती। हमारी हाँ और न तो सामाजिक संस्कार हैं या शारीरीक उद्वेग है।

उनमें कोई दम नहीं इसलिए कभी हाँ, ना बन जाती है, और कभी ना, हाँ बन जाती है।

मंजीत कह रहा है पंखे पर चढ़ जायो तो नहीं चढ़ोगे, अभी कोई ए-के-47 दिखा के बोले तो पंखे पर क्या छत पर चढ़ जाओगे। चढ़ जाओगे के नही? हाँ को ना बनते देरी नहीं लगेगी।

लेकिन जब चेतना से हाँ और ना उठती है तो वो बदल नहीं सकती फिर चाहे कोई जान लेले। जो कुछ भी जीवन में कीमती है वो चेतना से आता है, वहाँ सोच का कोई स्थान नहीं है।

~ संवाद सत्संग, १२ अक्टूबर, २०१४, ऐ.के.जी.ई.सी


शब्द-योग सत्र से उद्धरण। स्पष्टता के लिए सम्पादित।

संवाद देखें : आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग: ‘ना’ बोलने में झिझक

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