आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग: अपनी क्षमता का कैसे पता करें?

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श्रोता: आचार्य जी, हम अपने शरीर और मन को किस तरह से नियंत्रित कर सकते हैं? ग़लत चीज़ों की तरफ एकदम से खिंचे चले जाते हैं, और सही चीज़ से भागते हैं।

जैसे, हमने कोई दिनचर्या बनाई पढ़ाई के लिए, उसका पालन ही नहीं कर पाते कभी। ध्यान कहीं न कहीं भटक जाता है। तो ऐसा कैसे कर पायें कि जो सोचा था उसका पालन कर पायें?

आचार्य प्रशांत: तुम्हारी कोशिश ये है कि मैं जैसी ज़िन्दगी जी रहा हूँ, जीता रहूँ। पर उसके बाद भी, जो मैं नियंत्रित करना चाहता हूँ, वो मैं कर लूँ।

चील अगर आपने आप को बोले, कि मुझे आज से घास खानी है। और वो बहुत ज़ोर से बोले, कि आज से जो मेरी माँस खाने की प्रवत्ति है, मैं उसको त्यागती हूँ। माँस पर नियंत्रण और घास चालू। तो क्या उसे कभी भी सफ़लता मिलेगी?

श्रोता: नहीं।

आचार्य जी: वो जब तक ‘चील’ है, तब तक उसे माँस ही आकर्षित करेगा। इसी बात को अपने सन्दर्भ में समझो। तुम जब तक ‘तुम’ हो, तुम्हें वही सब कुछ आकर्षित करेगा, जो करता है। और तुम जब तक ‘तुम’ हो, तुम्हें वो सब नहीं आकर्षित करेगा, जो आज भी नहीं करता है। तुम चाहते हो कि मैं तो वैसा ही बना रहूँ जैसा मैं हूँ, मेरी पूरी पहचाने, मेरा पूरा अहंकार, मेरे मन, की जो पूरी व्यवस्था है, वैसी ही बनी रहे जैसी है। क्योंकि उसमें तुम्हें सुविधा है। पर साथ ही साथ, मुझे एकाग्रता भी उपलब्ध हो जाए, मुझे नियंत्रण भी उपलब्ध हो जाए; ये हो नहीं पायेगा ना! तुम असम्भव की माँग कर रहे हो।

श्रोता: आचार्य जी, आपने चील का उदाहरण लिया, लेकिन हमारा हिसाब वो थोड़े ही है!

आचार्य जी: तुम्हारा हिसाब वो ही है।

तुम दिन भर अभ्यास करते हो, तुम दिन भर अपनी ही ट्रेनिंग करते हो, उलटी-पुल्टी। और शाम को तुम घर जाते हो, और किताब खोल के बैठते हो, और पाते हो कि पढ़ नहीं पा रहे, किताब में मन नहीं लग रहा। नहीं लग सकता। असम्भव है।

जब दिन भर तुमने अपने मन को दूषण से भरा है। जब दिन भर तुमने उसको मौका दिया है, इधर-उधर आकर्षित होने का, तो शाम को भी वो उधर को ही आकर्षित होगा। पर तुम चाहते क्या हो? तुम चाहते हो, दिन भर तो मैं वही करूँ जो मैं कर रहा हूँ। और शाम को जब मैं पढ़ने बैठूँ, तो मैं वहाँ भी टॉपर हो जाऊँ। ये तुम नहीं पाओगे। तुम्हें पूरा जीवन बदलना होगा। जीवन बदलने के लिए तुम तैयार नहीं होओगे।

श्रोता: आचार्य जी, जीवन बदलने का क्या अर्थ हुआ?

आचार्य जी: जीवन बदलने का अर्थ है, कि कभी एक हिस्सा नहीं बदलता।

जिन्हें कुछ बेचैनी है, जिन्हें परेशानी है, जिन्हें कुछ बदलाव की ज़रुरत दिखाई पड़ती है, उन्हें समग्र बदलाव करना पड़ेगा। जैसा मैंने कहा, कि दिन भर तुम इधर-उधर घूम कर के, तुम ये चाहो कि शाम को अचानक तुम्हारा किताब में मन लगने लगे, तो ये हो नहीं पाएगा। हालाँकि तुम्हारी इच्छा यही है। तुम चाहते हो, दोनों हाथ लड्डू रहे। दिन में ये सब भी कर लें, और शाम को जब पढ़ने बैठें, तो वहाँ भी कर लें। ये नहीं मिलेगा तुम्हें।

तुम्हारा जो पूरा सवाल है ध्यान का, एकाग्रता का, वो फ़ालतू है। क्योंकि तुम जो हो, उसी के मुताबिक तो ध्यान लगाओगे ना! मैं इतनी देर से यही तो कहने की कोशिश कर रहा हूँ! जब तुमने पूरा अभ्यास ही अपने आपको विकृत करने का कर रखा है, तो तुम्हारा ध्यान भी उसी मुताबिक उस दिशा में जाता है। ध्यान को केंद्रित तुम करते हो, क्यों नहीं करते! आतंकवादी भी ध्यान केंद्रित करता है, गोली चलाने पर, वैज्ञानिक भी करता है, अपनी प्रयोगशाला में। तुम भी करते हो। तुम भी ध्यान केंद्रित करते हो, क्यों नहीं करते! तुम सब ध्यान केंद्रित करते हो, पूरे तरीके से! पर अपने मुताबिक तुम कुछ चुन लेते हो विषय, उस पर ध्यान केंद्रित करते हो।

कोई क्रिकेट मैच पर ध्यान केंद्रित कर लेगा, किसी को अगर कोई ख़ास तरीके का खाना दिखाई दे जाए, तो उस पर ध्यान केंद्रित हो जाएगा। लड़के हो, घूम रहे हो, लड़कियाँ दिख जाएँ, पूरा ध्यान वहीं केंद्रित हो जाएगा।

ध्यान तो तुम केंद्रित करते ही हो! तुम्हारा सवाल ही गलत है कि हम ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते! पूछो, कि हम किस वस्तु पर ध्यान केंद्रित करते हैं। और तुम उसी वस्तु पर ध्यान केंद्रित करोगे, जिसका तुमने निरंतर अभ्यास किया है, वही तुम्हारी कंडीशनिंग बन गयी है। अब कुछ बात समझ में आ रही है?

श्रोता: आचार्य जी, हमें खेलना भी है। पर हमने एक दिनचर्या भी बनायई है कि हमें भविष्य में क्या करना है, उसके मुताबिक। तो क्या हम खेलना छोड़ दें?

आचार्य जी: खेलने में भाव क्या है? उदाहरण देता हूँ।

एक आदमी, खेलता है इसलिए कि खेल के इज़्ज़त मिलेगी; जीत चाहिए। उसे खेलने से सरोकार नहीं है। वो खेल रहा है, क्योंकि उसे? कुछ चाहिए आगे उससे। जीत चाहिए, इज़्ज़त चाहिए। यही मन, जब शाम को पढ़ने बैठेगा, तो उसे फिर किताब से भी सरोकार नहीं होगा, उसे किताब से कुछ आगे का चाहिए। क्या चाहिए? परिणाम चाहिए, अंक चाहिए। जो मन खेलता इस खातिर है, कि जीतूँ और इज़्ज़त मिले, वो मन पढ़ेगा भी इस खातिर, कि इसमें से मुझे कुछ परिणाम मिले, नौकरी मिले। अब ये व्यक्ति चूँकि जानता है, कि वो पढ़ सिर्फ नौकरी के खातिर रहा है। या अंकों के खातिर रहा है। तो वो कभी भी ‘पढ़ने’ में डूब नहीं पाएगा। क्योंकि पढ़ना तो छोटी बात है। बड़ी बात क्या हुई उसके लिए?

श्रोता: नौकरी।

आचार्य जी: नौकरी। अब उसका ध्यान केंद्रित होगा ही नहीं। मज़ेदार बात यह है कि उसका खेलने में भी पूरा ध्यान नहीं होगा। ध्यान उसका कहाँ पर है? जीत पर। और याद रखना, जो बहुत जीत के लिए खेलते हैं, वो खेल भी नहीं पाते। तो जिन भर जो तुमने अभ्यास किया खेलने में, कि भविष्य की और देखते रहो। वही अभ्यास अब शाम को भी सामने आएगा, पढ़ने में। कि लगातार? भविष्य की ओर देखते रहो। अगर पढ़ना चाहते हो ठीक से तो तुम्हें अपना खेलना भी सुधारना पड़ेगा। तुम्हें अपने मन की पूरी गुणवत्ता ही बदलनी पड़ेगी। बात खुल रही है अब?

श्रोता: लेकिन हम ये सोचते हैं, हर बार, जब भी कुछ करते हैं, कि ये आखिरी बार है, अब नहीं करेंगे। अब इसे छोड़ देंगे ।

आचार्य जी: ये भी तो मन की एक ट्रेनिंग ही है ना? कि ये आखिरी बार है।

तुम देखो ना, कैसी ट्रेनिंग है मन की। तुम कहते हो, कि तीन पाठ आज पढ़ेंगे, और तीन कल पढ़ेंगे। परीक्षायें आ रही हैं। होता है ना ऐसा?

श्रोता: जी।

आचार्य जी: आज तुम उन तीन में से पढ़ते हो, एक। और अब कहते हो कि कल पाँच पढ़ेंगे। कुल हम कर लेंगे हम छे। तीन आज पढ़ने थे, तीन कल पढ़ेंगे। आज पढ़ते हो एक। और कहते हो कल कितने पढ़ेंगे?

श्रोता: पाँच।

आचार्य जी: पाँच।

तुम्हें दिखता नहीं है तुम कितने बेईमान हो? जो आदमी आज तीन नहीं पढ़ पाया, वो क्या कल पाँच पढ़ेगा? आज तो तुमने पढ़ा है एक, कल पाँच क्या खा के पढ़ लोगे? कल क्या तुम्हारा नया अवतार आ जाएगा? तुम तो ‘तुम’ ही हो ना? अब ये ट्रेनिंग भी हम अपने आप को लगातार देते ही रहते हैं।

उदाहरण के लिए, ये वही आदमी है जिसको जिम जाना है। पर वो कहता है, चलो आज नहीं जा रहा, कल दुगना समय दे दूँगा। ये आदमी जब पढ़ने बैठेगा, तो पढ़ाई में भी यही हरकत करेगा। पर तुम सोचते हो, नहीं! पढ़ना और जिम जाना दो अलग-अलग बातें हैं। तुम समझ ही नहीं रहे कि वो मन जो जिम जाने में बेईमानी कर रहा है, वो पढ़ाई में भी बेईमानी करेगा।

तुम्हारी इच्छा क्या है? कि ज़िन्दगी के बाकी सारे हिस्से तो वैसे के वैसे ही रहे, पर पढ़ाई में मैं ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दूँ। मैं तुमसे फिर से कह रहा हूँ, ये असम्भव है। जीवन की पूरी गुणवत्ता बदलनी पड़ेगी।

फिर पूछता हूँ अभी। ठीक अभी, यहीं से एक सवाल। तुम्हारे सामने मैं बोल रहा हूँ अभी कुछ। मैं बातों को खोल रहा हूँ। मैं कह सकता हूँ तुम्हारे सामने, मैं खुला हुआ हूँ। मैं जो कह रहा हूँ, अगर तुम इसमें नहीं डूब पा रहे, तो थोड़ी ही देर बाद, जब तुम्हारे सामने किताब खुलेगी, तुम उसमें कैसे डूब पाओगे? क्योंकि तुमने अपने मन को ट्रेनिंग तो यही दे दी है ना कि जो सामने है उसमें डूबो मत। अभी मैं सामने हूँ, तुम मुझमें नहीं डूब पा रहे, थोड़ी ही देर में किताब होगी, तुम किताब में कैसे डूब जाओगे? पर, तुम्हारी इच्छा ये है कि अभी जो में कह रहा हूँ, इसमें भले ही ना डूब पाओ, पर जब किताब खुले तो उसमें डूब जाओ। वो हो नहीं पाएगा। असम्भव। या तो दोनों जगह डूबोगे, या कहीं नहीं डूबोगे। ये जीवन समग्र है। पूरा है। टोटल!

श्रोता: आचार्य जी, पहले सेमेस्टर में मेरे ६५ प्रतिशत आए थे। उसके बाद अगले साल में – इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन्स पढ़ाई गई, जो कि मेरी ब्रांच थी। मुझे इलेक्ट्रॉनिक्स बिलकुल समझ में नहीं आई। फिर मैंने सोचा, मुझे मैकेनिकल लेनी है, बदलनी है ब्रांच। फिर मैंने इतना अच्छा पढ़ा, अपने आप ही, कि अगले सेमेस्टर में मेरे ७५ प्रतिशत आये और मेरी ब्रांच भी बदल दी गई । लेकिन अगर मैं वो सोचता हूँ, के कैसे हुआ एकदम, अब मैं चाहता हूँ पढ़ूँ, तो मैं वैसा नहीं पढ़ पाता। अब मेरा ध्यान केंद्रित नहीं हो पाता ज़्यादा। और उस समय मेरा एक ही लक्ष्य था, कि मुझे मैकेनिकल ही लेनी है। तो तब तो वो हो पाया था, पर अब क्यों नहीं हो पाता।

आचार्य जी: अब इसलिए नहीं हो पाता क्योंकि तब हो गया। जो भी काम किसी लालच में किया जाएगा, उसका यही हश्र होगा। कि वो तुमको एक झटका तो दे देगा, और उसके बाद? फुस्स। अब तुम चाहते हो, कि ये चला हुआ रॉकेट बार-बार चले। दिवाली के रॉकेट देखे हैं ना? कितनी बार चलते हैं?

श्रोता: एक बार।

आचार्य जी: बस एक बार चलता है, फिर उसके बाद चाहे तुम उसमें कितनी आग लगाते रहो।

हमारे जो मोटिवेशन हैं, वो ऐसे ही हैं। अब एक बार चल गया ना, तो अब आगे कैसे चले? चल गया रॉकेट अब। तुमने लालच में काम करा था। लालच खतम। तुम्हें लालच था ब्रांच बदलने का। लालच ख़तम। अब दुबारा कैसे चलाओगे वही रॉकेट?

पर हमें, देखो फिर वही, कि ट्रेनिंग क्या दी जाती है। ट्रेनिंग यही दी जाती है कि जब तुम्हारे सामने कोई बढ़ा मक़सद होता है, तब तुम मेहनत करते हो। और देखो, वो कहेगा, हाँ बात ठीक है, मेरे पास एक उदाहरण भी है। तब मेरे पास मकसद था, और मैंने काम कर लिया और मेरे ७५ प्रतिशत आ गए थे। अब वो पूरी कहानी नहीं देख रहा है कि ७५तो आ गए, पर फिर क्या हुआ?

श्रोता: फिर भी ७५ से ऊपर ही आयी थी हमेशा !

आचार्य जी: तो फिर अब क्या दिक्कत है?

श्रोता: दिक्कत ये है कि अब ध्यान केंद्रित नहीं हो रहा है।

आचार्य जी: नहीं होगा। क्योंकि हर मकसद के दो ही अंत होते हैं, या तो पूरा होता है, या नहीं पूरा होता है। पूरा होता है तो अब बचा क्या? और नहीं पूरा होता है तो फिर मिला क्या?

दोनों ही स्थितियों में मरोगे। जो लोग मकसदों के पीछे चलते हैं, उनका यही होता है। कभी भी उद्देश्य बना के, गोल बना के काम मत करना। हो सकता है उसमें तुम्हें सतही सफलता मिल भी जाए, जैसे तुम्हें मिली। तुम्हें जो चाहिए था, ब्रांच चेंज वगैरा, वो मिल गया। हो सकता है वो मिल भी जाए । पर उतने पर ही कहानी ख़त्म नहीं हुई, कहानी अभी आगे भी है। फिर उसके आगे रहेगी गहरी निराशा। दो रूपये मिले हैं, बीस रूपये का नुक़सान होगा। आ रही है बात समझ में।

श्रोता: आचार्य जी, बिना लक्ष्य के तो जीवन के कुछ मायने रहेंगे ही नहीं।

आचार्य जी:  कभी जी है?

जी है क्या?

तो कैसे पता कि उसका कोई अर्थ रहेगा कि नहीं।

श्रोता: एक एहसास हुआ था।

आचार्य जी: ना! उत्तर दो, कैसे पता?

देखो, मज़ेदार बात है। उद्देश्यहीन जीवन उसने कभी जिया नहीं, पर तुरंत उसके मन में ये प्रतिरोध उठा कि अगर उद्देश्यहीन हो गए, गोल-लेस हो गए, तो जीवन का कोई अर्थ ही नहीं रहेगा। मैं तुमसे पूछ रहा हूँ, ये विचार उसके मन में कैसे उठा?

श्रोता: कंडीशनिंग है!

आचार्य जी: हाँ। तुम्हें ट्रेनिंग दी गई है। और ट्रेनिंग का अर्थ ही यही है कि अभी तुमने जाना नहीं है, पर पहले ही तुम्हारे मन में ये भाव बैठा दिया गया है, कि बेटा गोल्स होने चाहियें, भागो गोल्स के पीछे। समझदारी का अर्थ यही है कि मैं तुरंत अपने आप को ही पकड़ लूँ, कि मैंने ये बोल कैसे दिया? और जैसे ही ध्यान दोगे, तुरंत सतर्क हो जाओगे, कि अरे! बाप रे बाप! इतने गहरे तरीके से मुझे कंडीशन कर दिया गया है, कि जो जीवन मैंने चखा ही नहीं, मैं उसके बारे में पहले ही निर्णय करे बैठा हूँ! इसका मतलब, उस जीवन का भले ही ना पता हो मुझे, पर ये जो मैं जी रहा हूँ, ये बड़ा खतरनाक है। ये तो अंधों का जीवन है। जिसमें कुछ जाना नहीं है, पर निर्णय पहले ही कर रखे हैं। और वो सारे निर्णय हमें पहले ही थमा दिए गए हैं। कि ऐसा होना चाहिए, जीवन में इतना पैसा होना चाहिए, इतनी पढ़ाई होनी चाहिए। इस उम्र में आ कर के शादी कर लेनी चाहिए। ये सब तुम्हें पहले ही पढ़ा दिया गया है।

तुम कहोगे, हाँ, यही तो ठीक है, ऐसे ही तो होता है। तुमसे पूछूँगा, तुम्हें कैसे पता? तुम्हारे पास कोई उत्तर नहीं होगा। तुम्हारे  पास बस एक ही उत्तर होगा कि, हमें बताया गया है। और मैं कहूँगा, पागल हो क्या?

श्रोता: आचार्य जी, हमारी ट्रेनिंग भी तो आचार्य जी मूर्खतापूर्ण होती है?

आचार्य जी: पाओ उसको। ये जो सवाल है ना, ये तुम्हारी ट्रेनिंग का हिस्सा नहीं है। अभी जो तुमने ये सवाल पूछा, तुम्हें इसकी ट्रेनिंग नहीं दी गयी है। ट्रेनिंग हमेशा इस बात की दी जाती है कि, सवाल मत उठाना! जो कहा जा रहा है, चुप चाप उसको मान लेना। ये जो तुमने अभी पूछा, यहाँ से दरवाज़ा खुलता है, नया! कि क्या सब ट्रेनिंग ही है मेरी? और यदि सब कुछ बाहरी ही है, यदि सब कुछ ग़ुलामी ही है, तो फिर मेरा वास्तविकता में है क्या? अब कुछ बात खुलेगी। अब तुमने, थोड़ा सा बाहर कदम रखा है, ग़ुलामी से।



शब्द-योग सत्र से उद्धरण। स्पष्टता के लिए सम्पादित।

संवाद देखें : आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग: अपनी क्षमता का कैसे पता करें?

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