अपने आप को बदलो, ग़लती को नहीं बदलो

ये पछताते मन की साजिश है, सत्य को ओर न देखने की। पछतावा हमारी बड़ी गहरी साजिश होती है।

गलतियों को ठीक करने की कोशिश मत करिये, गलतियों से तादात्म्य हटा दीजिये।

ये बात कोई ढोंग की या बहाने की नहीं है कि कुछ कर दो और फिर कहो कि मैं वो हूँ नहीं। ये बात बोध की है, जानना।

जो व्यक्ति जितना पछताता है, वो उतना ही ज़्यादा अतीत से वसूलने को भी तैयार बैठा है।

दुर्घटना को नहीं प्रित्यागना है, दुर्घटना करने वाले को प्रित्यागना है।

चैतन्य होने का तो अर्थ ही होता है अतीत से असम्पृत हो जाना, तो पछतावा कैसा?

अतीत से भागने वाला तो वही है, जो अतीत की पैदाइश है।

हम पाप से बचने को आतुर रहते हैं, पापी को नहीं छोड़ना चाहते।

भूल का कोई सुधार नहीं होता, आत्मज्ञान होता है।

जो काम स्वार्थ के वशीभूत किया जा रहा है, उसमें पुण्य कहाँ है?

अपने आप को बदलो, ग़लती को नहीं बदलो।

इस दृष्टि को समझियेगा, गलती को बदलने की कोशिश मत करिए, ग़लती सुधारने की कोशिश मत करिये, स्वयं को सुधारिए क्योंकि आप ही वो हैं जो बार-बार गलती करता है।

आप जगे हुए ही रहते हैं। जब आप स्वभाव विपरीत चलने की ठान्ते हैं, जब आप असम्भव को संभव बनाने की कोशिश करते हैं, तब जीवन में जटिलताएँ आ जाती है क्योंकि आप वो करना चाह रहे हैं, जो हो नहीं सकता।



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