आचार्य प्रशांत: कई बुद्ध पुरुषों ने समाज क्यों छोड़ा?

Blog-31

(आचार्य जी के नवीन लेखों के बारे में जानने के लिए व उनसे मिलने का दुर्लभ अवसर प्राप्त करने हेतु यहाँ क्लिक करें)

प्रश्न: आचार्य जी, बुद्ध पुरुषों ने जो बताया है समाज को वह बहुत सरल है, लेकिन फिर भी इतना झूठ, इतना ड्रामा क्यों?

आचार्य प्रशांत: आप बताओ क्यों?

कहीं बाहर से थोड़ी टपक रहा है, रोज़ हम ही करते हैं, आप बताओ क्यों?

आप जिस वजह से करते हो उसी वजह से है, आप अपनी वजह बता दो, जो आपकी व्यक्तिगत वजह है वही संसार की सार्वजनिक वजह है। जिस वजह से एक घर में ड्रामा होता है, ठीक उसी वजह से दूसरे घर में भी होता है। जिस वजह से एक दुकान चल रही है, ठीक उसी वजह से दूसरी दुकान भी चल रही है।

आप अपने जीवन मे झाँक लो, जो वजहे आप को चलाए जा रही है, जो वजह आपको धक्का दिए जा रही है, आपकी ऊर्जा बन रही है, आपकी प्रेरणा बन रही है, वही वजह हर किसी की प्रेरणा बन रही है। आप और संसार मूलतः कोई भिन्न थोड़ी ही हैं। कहानी घर-घर की!

प्रश्न: आचार्य जी,जो बुद्ध जन सत्य को प्राप्त हुए, वो समाज से क्यों दूर चले गए?
आचार्य प्रशांत: आप को कुछ नहीं पता कि वो समाज से दूर चले गए या नही चले गए। उनके बारे में कोई कयास, अनुमान वगैरह लगाइए ही मत।
मुझे तो लग रहा है कि समाज से दूर हम सब हैं, बुद्ध तो मुझे लगता है समाज के बहुत पास थे। उन्होंने तो हजारों लोगों को गले लगा लिया था, आपने कितनों को लगाया है?
कितनों को लगाया आजतक?
कितनों को कहोगे कि ये मेरे मित्र हैं, मेरे घनिष्ठ हैं, मेरा परिवार है?
कितनों को कहोगे?
पाँच, दस, चालीस, पच्चास?
बुद्ध के लिए तो पचास हजार थे।
अब आप बताओ, आप असामाजिक हो या बुद्ध असामाजिक थे?
असामाजिक आप हो, क्योंकि आपका समाज इतना-सा है, चार लोगों से ज़्यादा बड़ा आपका परिवार नहीं हो पाता, बुद्ध का परिवार? चालिस हज़ार लोगों का!
ओशो ने कम्युन स्थापित कर दिया था, उन्होंने तो पुरा समाज बना ही डाला था, और आप कह रहे हो कि वो समाज से दूर चले गए,असामाजिक हो गये, देख नहीं रहे हो कि ये सब कहानियाँ हम गढ़ते ही इसलिए है ताकि बुद्धत्व से किसी तरीके से भाग सकें।
‘असामाजिक हो जायेंगे, ये हो जाएगा, वो हो जाएगा’।
वो असामाजिक हो गए होते, तो उनके किस्से आप तक कैसे पहुँचते?
यहाँ पर कौन ऐसा है जो समाज से भागा था?
कृष्ण समाज से भागे थे?
जीसस समाज से बाहर भागे?
कबीर समाज से बाहर भाग गए थे?
नानक भागे थे?
कृष्णमुर्ति भागे थे?
कौन भागा था समाज से बताओ?
एक इनमें से बता दो जो कि अब समाज से बाहर भाग गया था। हाँ, इतना ज़रूर हुआ था कि उन्होंने समाज को एक परिष्कार दिया था, चूँकि वो स्वयं साफ हो गए थे, तो उनके इर्द-गिर्द का समाज भी साफ़ होने लग गया था, इसी से हम डरते हैं, क्योंकि हमने अपनी पहचान ही किससे बैठा ली है?
मैले से, गंदगी से।
जब मैले से पहचान बैठा लो, तो सफाई बड़ी भयानक लगती है।
ये जानते थे लोगों से गले मिलना, क्योंकि इनके लिए विभाजन नहीं थे। ये नहीं कहते थे कि तू अगर इस जात का है तो मै तुझसे नहीं मिलूंगा, आप मिल पाते हो हर जात के, हर धर्म के लोगों से समभाव से?
बुद्ध मिल लेते थे।
आप तो बगल के घर में जो रहता हो उससे समभाव से न मिल पाओ!
आप तो कहोगे, ‘ये मेरा घर है ये मेरे बच्चे है, ये मेरे बच्चे’, पड़ोस के बच्चे किसी और के हो गए!
अब बताओ असामाजिक कौन हुआ?
आप कहते हो ये मेरा घर है, इसमें जितने लोग रह रहे हैं, ये स्त्री मेरी है, ये कुत्ता मेरा है, बाकी घर कहीं और हो गया।
पहली छवि यहाँ कृष्ण की, उनकी सोलह हज़ार रानियाँ थीं, आपसे एक नहीं सम्भाली जाती। असामाजिक कौन हुआ? और सोलह हज़ार रानियों का मतलब यह नहीं कि उन्होंने सोलह हज़ार ब्याह कर लिए थे, इसका मतलब ये कि उनमें इतनी अनंत क्षमता थी कि वह सोलह हज़ार व्यक्तियों से, स्त्रियों से, सम्बन्ध बना पाए, आवश्यक नहीं कि देहिक सम्बन्ध जुड़ पाए।
हम तो दो से नहीं जुड़ पाते! हम दो से जुड़ते हैं तो वहाँ दो से जुड़ने में लड़ाईयां हो जाती हैं।
वास्तव में एक बुद्ध ही समाजिक हो सकता है, हम नहीं हैं समाजिक, हमारा तो जैसा समाज है वहाँ क्या होता है, वहाँ लड़ाईयां होती हैं।
ये समाज भी अगर किसी तरीके से घिस-पिट, के चर-मरा के चल रहा है, तो इसलिए चल रहा है क्योंकि इसे बुद्धों का थोड़ा बहुत स्पर्श मिला। उसी कारण से किसी प्रकार घिसट-घिसट के चल रहा है।
यहाँ सब ऐसे हैं जो गाँव-गाँव घुमे थे। इन्होंने बड़ी यात्रायें की थी। अपने आपको एक शहर, एक प्रान्त, एक जगह तक सीमित नहीं रखा। नानक हैं, पुरा भारत घुम लिया, बिहार घुम आए और उधर जा कर अरब में मक्का मदीना हो आए। उनके लिये तो पुरा संसार ही समाज था। ये कबीर हैं, जंगल में गए थे बैठने? गुफा में घुस गए थे? हिमालय से सिग्नल भेजते थे? और फिर वो नीचे आते थे तो दोहे बन जाते थे? पर देखो छवि ऐसी रहती है!
हमारे शिविर आयोजित होते हैं, तो पचास-पचास कोस दूर माँयें बच्चों से कहती हैं, बेटा शिविर में मत जाना नहीं तो सन्यासी बन जायेगा!
और सन्यासी से उनका आशय क्या है? सन्यासी से उनका आशय है कि उसके बाद तु मेरी दुधारू गाय नहीं रहेगा, और ये उनके लिए त्रासदी है कि कहीं ऐसी जगह चला गया जहाँ  आँख खुल गई, सच्चाई दिख गई, अभी गधा है, भौन्डा है, बोना है, कहीं आदमी बन गया तो!
उसके बाद मेरी गुलामी नहीं करेगा, बस यही उनका सबसे बड़ा डर है, कहीं एक बार आदमी बन गया तो फिर थोड़ी हमारे कहे पर चलेगा!


शब्द-योग सत्र से उद्धरण। स्पष्टता के लिए सम्पादित।

संवाद देखें : आचार्य प्रशांत: कई बुद्ध पुरुषों ने समाज क्यों छोड़ा?

(आचार्य जी के नवीन लेखों के बारे में जानने के लिए व उनसे मिलने का दुर्लभ अवसर प्राप्त करने हेतु यहाँ क्लिक करें)


General Poster

आचार्य प्रशांत जी की पुस्तकें व अन्य बोध-सामग्री देखने के लिए:

http://studiozero.prashantadvait.com/

Books Hindi