प्रेम यही है – के छोड़ के ना जाओ

ये खेल ऐसे नहीं खेला जा सकता कि लग रहा है, पर तुम वीरता से उससे लड़ाई कर रहे हो। ये खेल तो ऐसे ही जीता जाता है कि कुछ बातें हैं, जो अब प्रतीत होनी ही बंद हो गयी हैं। आभास ही नहीं हो रहा है।

तुम वही मन रखते हुए, ज़िन्दगी नहीं बदल सकते।

मुक्ति का मतलब यही होता है कि हमारे पास वो हुक नहीं बचे, जिनमें तुम अपने रस्से फँसा सको।

जब अपनी सुध लगने लग जाती है ना, तो पूरी दुनिया का सच बिलकुल खुल के सामने आने लग जाता है। थोड़ा सा जब अपना मामला साफ़ होने लग जाता है, तो दुनिया बिलकुल ऐसे खुल जाती है के जैसे कुछ उसमें, कभी कुछ छुपा हुआ था ही नहीं।

और प्रेम यही है – के छोड़ के ना जाओ। किसी भी तरीके से बाँध के ले आओ।



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