आचार्य प्रशांत: पश्चाताप व्यर्थ है; पाप नहीं पापी को छोड़ो

प्रश्न: आचार्य जी, ‘अपराध बोध’ क्या है?

आचार्य प्रशांत: गहरा अहंकार। मैं, मुझ जैसा, ग़लती कैसे कर बैठा, यह ‘अपराध बोध’ है। इससे फिर निकलता है, पछतावा, ग्लानि, कुंठा। उसके मूल में यही है, मैं गलती कैसे कर बैठा और एक दूसरा मन होता है, जो कहता है, “हम जैसे हैं, हमसे तो ये होना ही था, हम ये न करते तो और क्या करते?” उसे कोई ‘अपराध बोध’ नहीं होता, उसे आदत का बोध होता है कि ये तो मेरी आदत ही है और मैं आदतों के एक पुंज के अलावा और कुछ हूँ नहीं।

श्रोता१: जैसे आम जीवन में भी देखते हैं कि “मैं गाड़ी चला रहा था, अपने दोस्त से बात कर रहा था, सामने एक छोटा-सा पिल्ला आया और क्योंकि मैं रोड की तरफ इतना बखूबी नहीं देख रहा था, तो वो मेरे टायर के नीचे आ गया। अब कष्ट तो होगा, लेकिन वो वापस भी नहीं आ सकता।”

आचार्य जी: ये जिसे कष्ट हो रहा है, क्या ये वही नहीं है जिसने पिल्ले को कुचला?

श्रोता१: वही है।

आचार्य जी: वही है न? तो कष्ट की अनुभूति और पिल्ले को कुचलना भी तो एक ही घटना है न? पिल्ला अभी पूरा कुचला नहीं गया था। ये जो आपको कष्ट हो रहा है, वो उसे कुचलने का हिस्सा है, एक ही घटना है जो आगे बढ़ रही है, क्योंकि आप वही हैं। क्योंकि आप वही हैं तो दो अलग-अलग कर्म तो नहीं कर रहे होंगे। नहीं समझे? मैं कुछ करूँ और उसके बारे में पछताऊँ, तो मैं ये ही कहता हूँ न कि मैंने किया? या ये कहते हैं कि किसी और ने किया? जो पछता रहा होता है, उसका वक्तव्य क्या है? किसने किया था?

श्रोतागण: मैने किया था।

आचार्य जी: आप किसी और के किये पर तो नहीं पछताते, आप क्या बोलते हो? “मैंने किया।” अगर मैंने किया तो फिर मैं वही हूँ जिसने किया और अगर मैं वही हूँ जिसने किया, तो फिर मैं अब वही न कर रहा होऊँगा जो तब हुआ। यदि ‘मैं’ न बदला तो मेरे कर्म कैसे बदलेंगे? पिल्ला कुचल नहीं गया, वो लगातार कुचला जा रहा है, हाँ, दिखाई नहीं पड़ रहा।

ये पछताते मन की साजिश है, सत्य को ओर न देखने की।

पछतावा हमारी बड़ी गहरी साजिश होती है।

श्रोता१: लेकिन ये अपने आप निकलता है।

आचार्य जी: जैसे कुचलने की घटना अपने आप होती है। वो भी वैसे ही हुई थी न? वो भी बेहोशी में हुई थी और ये भी बेहोशी में हो रही है। एक दूसरा मन होता है, जो जग जाता है, अब वो, वो रहा नहीं जिसने कुचला था। अब वो, ‘वो’ रहा ही नहीं जिसने कुचला था।

श्रोता १: ‘अपराध बोध’ के बाद होगा न वो या फिर…

आचार्य जी: नहीं। ‘अपराध बोध’ में भूलियेगा नहीं, वक्तव्य ये है कि…

श्रोता १: मैंने कुचला।

आचार्य जी: मैंने कुचला। अगर मैंने कुचला, तो मैं वही हूँ जिसने कुचला।

गलतियों को ठीक करने की कोशिश मत करिये, गलतियों से तादात्म्य हटा दीजिये।

मैं अब वो रहा नहीं और

ये बात कोई ढोंग की या बहाने की नहीं है कि कुछ कर दो और फिर कहो कि मैं वो हूँ नहीं।

ये बात बोध की है, जानना।

हम लगातार जुड़े रहते है पुराने से, अतीत से। आप ये ही थोड़ी करते हो कि बेचारा पिल्ला कुचल गया तो आपको उसकी ग्लानि है। आप ये भी करते हो न कि जिससे दो साल पहले की उधारी वसूलनी है, उसका नाम भी याद रखते हो। क्या इन दोनों घटनाओं में अंतर है? दो दिन पहले आपने पिल्ला कुचल दिया, आपको उसकी ग्लानि है। दो साल पहले आपने किसी को पैसे दिए थे और आपको वसूलने है, क्या उसको आप भूल गए हो? आप इन दोनों घटनाओं में साझा क्या है, ये देख पा रहे हो? क्या साझा है? मैं वही हूँ जिसने पैसे दिए थे तो मुझे हक़ है पैसे वापस लेने का। नहीं समझ पा रहे है?

अतीत से जुड़ाव बना हुआ है और जब तक आप किसी से पैसे वापस लेने की सोचते रहोगे तब तक आपको ये पछतावा भी रहेगा कि मैंने पिल्ले को कुचल दिया और आप पैसा वापस ले सको इसके लिए जरूरी है आप पछताओ कि मैंने पिल्ला कुचल दिया, इसीलिए आप पछता रहे हो।

अतीत में आपकी बहुत सारी पूँजी है, बड़ा निवेश है आपका अतीत में, वो निवेश कायम रहे, इसके लिए जरूरी है कि आप अतीत से जुड़े रहो। अतीत से आपको बहुत कुछ मिल रहा है न? नाम, सम्मान, पहचान, सब मिल रहा है और जब आप अतीत से जुड़े हो, तो फिर आपको ये भी कहना पड़ेगा कि अतीत में जो पिल्ला कुचला गया वो भी मैंने ही कुचला था, मैं ही जिम्मेदार हूँ। परित्याग नहीं हो पा रही है, संपर्क टूट नहीं रहा है, पहचान नहीं कट रही है।

जो व्यक्ति जितना पछताता है, वो उतना ही ज़्यादा अतीत से वसूलने को भी तैयार बैठा है।

वसूलेगा भी तो, मैने तेरे ऊपर इतना खर्च किया था, दे। समझिए इस बात को।

श्रोता१: अगर हमने दुर्घटना का परित्याग कर दिया, कि ठीक है हो गया।

आचार्य जी: नहीं,

दुर्घटना को नहीं प्रित्यागना है, दुर्घटना करने वाले को प्रित्यागना है।

बहुत-बहुत अंतर है इन दोनों बातों में समझियेगा। दुर्घटना को प्रित्यागने वालों से तो अदालतें भरी पड़ी हैं। दुर्घटना करके वहाँ जाते हैं और कहते हैं, हमने नहीं किया।

(सब हँसते है)

क्या यही नहीं होता है? आप दुर्घटना का परित्याग करते हो, मैं कह रहा हूँ दुर्घटना करने वाले का परित्याग करो; मैं वो हूँ नहीं जिसने किया था।

देखिये अब क्या करें शब्दों का है।

(सब हँसतें है)

आप बात समझ रहें हैं? मैं क्या कह रहा हूँ? बात समझ रहे है न? ये झूठ बोलना तो बहुत आसान है कि मैंने नहीं किया, वो तो झूठ है, क्योंकि तुम वही हो जिसने किया था। आप वो अब रहिये ही मत जिसने किया, क्योंकि जब तक आप वो है तब तक वो आपका आखिरी दुर्घटना नहीं हो सकता और वो आखिरी पिल्ला नहीं हो सकता, अभी और बेचारे पिल्ले मरेंगे।

श्रोता१: लेकिन बहुत सी जगह पर लगता है कि दिमाग सचेत हो गया है उसके बाद।

आचार्य जी: नहीं, बिलकुल नहीं। सचेत हुआ होता तो पछताता कैसे?

चैतन्य होने का तो अर्थ ही होता है अतीत से असम्पृत हो जाना,

तो पछतावा कैसा?

ये जो असम्पृत होना है, इसी को प्रायश्चित कहते हैं। प्रायश्चित, है नहीं, अब पुराने से जुड़ाव नहीं रहा या पछतावा नहीं है।

श्रोता१: भागना नहीं है?

आचार्य जी: न, भागना नहीं है।

अतीत से भागने वाला तो वही है, जो अतीत की पैदाइश है।

और आप देखिये न, समस्त पछतावे में धारणा क्या रहती है? समस्त पछतावे में धारणा ये रहती है, कि मुझसे ये कैसे हो गया? धारणा ये रहती है कि जिसने ये करा, मैं उससे बेहतर हूँ, तो धोखे से हो गया मुझसे। पछतावे में हम अपने आप ये झूठ बोल रहे होते हैं कि मैं ऐसा हूँ नहीं, मुझसे बस हो गया, ग़लती से हो गया। क्या आप ये कहोगे कि आपने पिल्ले को जान कर कुचला? आप क्या बोलते हो पिल्ला?

श्रोता१: ग़लती से।

आचार्य जी: प्रायश्चित आपने तब किया, जब आप बोलो कि मैं जैसा हूँ, उससे तो पिल्ला मरना ही था और ये बात बड़ी कचोटती है। पर जिस दिन आप ये स्वीकार कर लोगे न, कि पिल्ला ग़लती से नहीं मारा, आपके होने से मारा है, आप जैसे हो उससे पिल्ले की मृत्यु निश्चित ही थी। उस दिन समझिए कि आज आपने वास्तव में उस पाप से हाथ धो लिए। और भूलियेगा नहीं कि आपने पाप से हाथ नहीं धो लिए, आपने पापी से हाथ धो लिए।

हम पाप से बचने को आतुर रहते हैं, पापी को नहीं छोड़ना चाहते।

अब क्या हो? आदमी की सारी समस्या ही यही है कि पाप धोना चाहता हैं और पापी को वैसे का वैसा रखना चाहता हैं।

अभी रविवार को था किसी ने बताया था कि रामकृष्ण कहते थे कि “जब तुम नहाने जाते हो तो तुम कपड़ों के साथ आपने पाप नदी के बगल वाले पेड़ पर रख देते हो और जब तुम नहाकर वापस आते हो, तो तुम उनको फिर धारण कर लेते हो” क्योंकि पापी तो वही है न? तो पाप लौट के आ जायेगा। जब पापी को नहीं छोड़ा तो पाप को कैसे छोड़ दोगे? इसको हटा भी दिया तो लौट कर आएगा। बात समझ रहे हैं?

श्रोता१: आचार्य जी, तो क्या कोई भी चीज़ ग़लती से नहीं होती?

आचार्य जी: कभी नहीं, कभी भी नहीं प्रवीण, तुम कुछ गलती से नहीं करते, कभी कोई ये न कहे कि धोखे से हो गया, वो तुम्हारे होने का प्रतिफल है, तुम जैसे हो तुमसे ये होना ही था, कोई न कहे कि मुझसे धोखे से हो गया।

श्रोता१: तो क्या भूल का सुधार नहीं होता?

आचार्य जी: न, बिलकुल भी नहीं। बिलकुल भी नहीं, कभी भी ये कोशिश मत करिएगा कि मैं भूल सुधार करूँ।

भूल का कोई सुधार नहीं होता, आत्मज्ञान होता है।

भूलें नहीं सुधारी जा सकती।

श्रोता१: मैं बचपन में पाठशाला से जब निकलता था, तो चोरी से समोसे खाता था और उसके पैसे नहीं देता था और ये बात मुझे काफी अंदर से परेशान करती थी, फिर खुद के लिए जो हल निकाला तो हल ये ही निकला कि मैं उसके पास जाऊँ और उसके पास गया मैं उसे बताया, १० साल बाद करीब, उसे पैसे देकर आया, फिर लगा कि हाँ, थोड़ा आराम हो गया है, जो पहले नहीं लग रहा था और अगर मैं ऐसा नहीं करता तो मैं क्या करता फिर?

आचार्य जी: कुछ नहीं करते, भूल जाते।

श्रोता१: अगर भूल गए तो बेईमानी हुई।

आचार्य जी: किसके प्रति बेईमानी हुई?

श्रोता१: खुद के होश के प्रति। हर इंसान को पता है कि उसने क्या-क्या गलत किया है आपने जीवन में।

आचार्य जी: तो देखते हैं, क्या करा आपने, आपने कहा कि मेरे मन पर एक बोझ है, जो मुझसे कह रहा है कि तुमने चोरी करी और १० साल बाद जाके मैंने उसे पैसे दे दिए और अब मेरे मन में जो मेरी छवि थी, वो बेहतर हुई कि मैं चोर नहीं हूँ। इस पूरी प्रक्रिया में फायदा किसका हुआ है? कौन बेहतर महसूस कर रहा है?

श्रोता१: मैं खुद।

आचार्य जी: आप पैसा दे के निकले, अब आप कैसा अनुभव कर रहे थे अपने बारे में?

श्रोता१: आगे से ऐसा मत करना है।

आचार्य जी: आपने उसको पैसे दे दिये, अब आप अपने बारे में कैसा अनुभव कर रहे हो?

श्रोतागण: मैं बेहतर।

श्रोता२: १० साल बाद भी तो पैसे का मूल भी बदल गया है न?

(सब हँसते है)

श्रोता१: इस चीज़ का ध्यान रखा था।

आचार्य जी: वो ठीक है, वो हो सकता है क्र दिया हो कि समोसे १० के खाए हों और उसके ५०० लौटा दिए हों, वो हो सकता है। मैं कह रहा हूँ कि आप उसको दे कर निकले उसके बाद आप बेहतर अनुभव कर रहे थे?

श्रोता१: हाँ।

आचार्य जी: ठीक। अब हम देखना चाहते हैं कि ये कौन है जो बेहतर अनुभव कर रहा था, कौन है ये?

श्रोता१: वहाँ पर मैं हूँ।

आचार्य जी: कौन है?

श्रोता१: मैं खुद ही हूँ।

आचार्य जी: किसकी चाहत थी बेहतर अनुभव करने की? वो कौन है उसको एक नाम दीजिये?

श्रोता१: ‘मन की’। पवित्र तल पर था थोड़ा।

आचार्य जी: अब आप अपने आपको सिर उठा कर कह सकते हैं कि मैं चोर नहीं हूँ। एक छवि है न? इसमें आप किसका भला कर रहे थे, ईमानदारी से बताइये, किसका कर रहे थे? जिसको आपने पैसे दिए उसका या अपना?

श्रोतागण: अपना।

श्रोता१: अभी लड़ाई तो आचार्य जी खुद की ही है?

आचार्य जी: ‘खुद’ कौन सा वाला, अहंकार वाला? उसको अच्छा प्रतीत कराने की? अब मैं आपको बताता हूँ वर्तमान में जीने का क्या अर्थ है? वर्तमान में जीने का ये अर्थ है, अभी अगर मेरे पास ५०० देने की क्षमता है, तो वो ५०० मैं इस आधार पे नहीं दूँगा कि १० साल पहले मैंने किसी के समोसे खाए थे। वो मैं इस आधार पे दूँगा कि आज इस ५०० का समुचित उपयोग क्या है?

जिसको आपने पैसे दिए, क्या आपने ये जानना चाहा कि उसको इसकी आवश्यकता भी है या नहीं? क्या आपने ये जानना चाहा कि कहीं वो आतंकी गतिविधियों में तो नहीं लिप्त है कि इस ५०० से हथगोला ही खरीद ले? आता नहीं है ५०० में पर, जो भी आता है। क्या आपने ये जानना चाहा? आपने उसको ५०० दे दिये सिर्फ इसलिए ताकि आपकी आत्मछवि साफ हो सके। सिर्फ अपनी छवि चमकाने के लिए आप दे आए और अब मैं आपसे एक सवाल पूछता हूँ, आप जो ५०० रुपया लेके गए थे, जिसको देने के लिए यदि उसके घर के सामने एक दूसरा व्यक्ति घूम रहा होता, जो वास्तव में ज़रूरत मंद होता तो क्या आप उसको देते ?

श्रोता१: मैं, उसको? नहीं समझा मैं आपकी बात?

आचार्य जी: आप जिसको देने गए थे, उसका नाम रमेश है। आप उसको ५०० देने गए थे क्योंकि आपने १० वर्ष पहले आपने उससे समोसे लिए थे, ठीक? आप जब रमेश को देने जा रहे हैं ठीक इसी समय आपको एक दूसरा व्यक्ति मिलता है, उसका कुछ और नाम है, क्या नाम है?

श्रोता१: महेश।

आचार्य जी: महेश। महेश वास्तव में जरूरतमंद है और आपके पास ५०० ही है देने के लिए, आप क्या वो महेश को देते?

श्रोता१: उस दिन महेश को देता।

आचार्य जी: आपके पास ५०० ही हैं, आप महेश को देते, तो आप उसको कभी न दे पाते।

श्रोता१: अच्छा, उसको दे ही नहीं पाते?

आचार्य जी: आपके पास ५०० ही है।

श्रोता१: तो फिर मैं उसको देता।

आचार्य जी: किसको देते?

श्रोता१: दुकानवाले को।

आचार्य जी: दुकानवाले को देते। यानि आप किसके स्वार्थ के वशीभूत काम कर रहे है?

श्रोता१: अपने।

आचार्य जी:

जो काम स्वार्थ के वशीभूत किया जा रहा है, उसमें पुण्य कहाँ है?

पुण्य कहाँ है? वर्तमान में जीने का अर्थ होता है कि मैं अभी देखूँगा कि इस ५०० की समुचित उपयोगिता क्या है, मैं किसको दे सकता हूँ? मैं ये नहीं देखूँगा मुझे अतीत के वशीभूत होते हुए किसको देना है? और भूलियेगा नहीं, इसमें आपने जो बोला उस तर्क में खतरा कितना बड़ा है? यदि आपने किसी का इतना ले लिया हो कि अब आप उसे लौटा ही न सकते हों, तो आपके तर्क की निष्पत्ति ये है कि अब मुझे जीवनभर ग्लानि में जीना पड़ेगा।

श्रोता१: हाँ, सत्य है।

आचार्य जी: है न ? तो ये तो बड़ा खतरनाक काम हो गया।

श्रोता१: जहाँ भी ये बात बैठेगी ये ही ईमानदारी है?

आचार्य जी: ये ईमानदारी नहीं है, ये अतीत में जीना है। देखिये मैं फिर कह रहा हूँ आप से, जब आप किसी का १० रुपैया लौटने को इतने उत्सुक हैं, तो जिसने आपसे १० वर्ष पहले १० रुपैया लिया था, आज जब वो ही आपको लौटाने आए, तो आप उससे कितने की उम्मीद करोगे? जैसे आप १० का ५०० लौटा रहे हो, वैसे ही जिसने आपसे १० लिया था, उससे उम्मीद कितने की रखोगे?

श्रोता१: मैं नहीं रखूँगा।

आचार्य जी: ये नहीं होता है। ये संभव नहीं है।

(सब हसतें है)

श्रोता१: ऐसा हो सकता है अगर आपको और उदाहरण देता हूँ, जिसमें कभी नहीं हुआ लेकिन जो अपने अभी दिया है।

आचार्य जी: नहीं, नहीं। आप हो सकता है, नैतिकता के चलते इस बात को व्यक्त न करो उस व्यक्ति से, लेकिन जब वो देगा, मानलीजिए जैसे इन्होंने अभी कहा कीमत बढ़ गयी है। किसी ने आपसे १० साल पहले १० रूपये लिये हो और आज वो आपको १० रूपये लौटाने आये और १० ही लौटाये तो तुरंत मन में ये तर्क उठेगा कि ये क्या है? हो सकता है आप उससे ये भी कह दो कि यार लौटा क्यों रहा है रखदे-रखदे और हो सकता है लो भी नहीं पर मन में ये ख्याल निश्चित उठ जायेगा कि ये क्या कर रहा है? १० साल पहले का १० रुपैया आज १० ही रूपये में लौटा रहा है। जैसे आज आप लौटाने को आतुर हो वैसे ही आप लेने को भी आतुर होगे, क्योंकि अतीत से जुड़े हुए हो न हिसाब-किताब तो बराबर करना ही पड़ेगा।

श्रोता३: मैं कह रही थी कि, अगर उस बीच में उससे कुछ अनबन हो गयी होगी तो फिर पक्का सोचोगे कि अगर मैंने ये १० रूपये कहीं और लगाये होते तो आज मुझे इसका तीन गुना मिलता।

श्रोता१: तो फिर?

श्रोता४: और उस समय का क्या अगर मैंने किसी से पैसे लिए और मैं लौटा ही न सकूँ अगर मुझे पता है कि मुझसे लौटाया नहीं जाएगा और आधा अधूरा लौटना चाहती हूँ, तो वो अब नहीं लौटा रही कि उसको जरुरत नहीं है।

आचार्य जी: तो फिर आप इस बात को छोड़ दीजिये पीछे कि अपने उससे पैसे लिए थे, इस कारण आपकी ज़िम्मेदारी है लौटना। आप तो ये देखिये कि मैं यहाँ पर खड़ी हुई हूँ और मेरे ऊपर ये मुर्दा नियम ही नहीं लागू होता कि जितना लिया है उतना लौटाओ। ५०० रुपैया नकद लिया है तो ५०० रुपैया नकद लौटाओ। मुझे ये पता है कि आज लौटाने के असंख्य तरीके, सबकुछ, मेरे सामने मौजूद हैं जितने भी तरीके हो सकते हैं। तो मैं इतना ही कर सकती हूँ कि उस व्यक्ति के पास जाऊँ और फिर जो उचित हो वो करूँ। उसमें लेने, देने, लौटाने जैसी कोई बात नहीं है, ये भी हो सकता है कि आप उसके पास जाएँ और वहाँ आपको दिखाई दे कि ये आदमी, तो जो इसके पास पैसे हैं भी, आपने उससे मान लीजिए ले रखे हैं ५०० रुपये, आप उसके पास जाते हैं और उसके पास अभी और ५०० रूपये हैं, और वो उन ५०० रुपये लेकर के जा रहा है शराब की दुकान में, तो आपके लिए क्या उचित होगा कि उसे ५०० और दे दें? नहीं, आपके लिए उचित होगा कि ५०० और ले लें।

(सब हँसते है)

ले लीजिये।

ये लौटाने की ताकत है। अच्छी लग रही है अभी क्योंकि इसमें लेने-लेने की बात हो रही है।

(सब हँसते है)

इसमें उल्टा भी होता है, देना बहुत पड़ता है। देना ही पड़ता है ज़्यादा। ये हिसाब-किताब बराबर करने वाली बात जीवन में नहीं चलती है। जीवन में बही-खाते ऐसे नहीं चलते कि जितना लिया था उतना लौटा दिया तो काम हो गया। ये लेना, लौटना इन सब में बताईये न कि आत्मछवि, आत्ममुग्धता के अलावा प्रेम कहाँ है? छात्र आते हैं, हमारे माँ-बाप ने मात्र इतना ख़र्च किया है, हम अपने हिसाब से कैसे चल लें हमें लौटाना तो पड़ेगा न?

मैं कहता हूँ, ठीक है, ये बता दो रिश्ता किसका है? रिश्ता दुकानदारी का है? उधारी का है? सूद और ब्याज का है? या रिश्ता प्रेम का है? अगर रिश्ता प्रेम का है, तो ये भूल जाओ कि तुम्हें बस उतना ही लौटना है, जितना उन्होंने दिया। तुम्हें उससे अनंत गुना ज़्यादा भी देना पड़ सकता है, और कुछ न दो ये भी ठीक है। क्योंकि प्रेम में कोई नियम नहीं। हो सकता उन्होंने कुल १० ही लाख ख़र्च किये हों, हो सकता है ख़र्च उसके एवज में उन्हें १० करोड़ लौटाओ तो भी काम पड़े, ये भी हो सकता है कि कुछ देने की ज़रूरत ही नहीं। कोई नियम नहीं है।

स्थिति पर है कि बात अभी क्या उचित है। और अगर रिश्ता दुकानदारी का है तो सीधे-सीधे गणित लगाओ कि १० लाख दिए थे, इस पर इतना ब्याज होता है, इतना है लौटा दो बात खत्म हो गयी।

तो मुझे बताओ रिश्ता किसका है? रिश्ता किसका है? जो लेने देने वाली बात होती है न, मैंने तुझसे इतना लिया, लौटा दिया इसमें कहीं प्रेम नहीं है। इसमें सिर्फ अहंकार है कि ‘हम निवृत हुए भैया, अब हम से कोई माँग न कर लेना। हम साफ आदमी हैं, जितना लिया तुमसे पूरा लौटा दिया है, भरपूर।’ क्या बोलते हैं कॉर्पोरेट में एफ.एन.एफ., हो गया है खत्म। ऐसे थोड़ी जिंदगी चलती है।

श्रोता१: आचार्य जी, अगर कोई जैसे ग़लती करी, आप उससे सीख रहे हो, तो वो जो सीखना है वो भी, जो बोलेगा कि मैं सीख रहा हूँ, वो तो वही है न जिसने ग़लती करी, वही सीखेगा। तो आचार्य जी, असल में ग़लती से कुछ सीखना होता ही नहीं है?

आचार्य जी: ग़लती से बाद में नहीं सीखा जाता, बाद में तो तुम्हारे पास उसकी स्मृति है, मूल्यांकन है, जिसे गलती से सीखना होता है, वो तभी सीखता है न जब वो गलती कर रहा होता है। और मुझे थोड़ा-सा ये बताना कि, तुम १०० बार गलती करते हो, तुम्हें १०० बार उसकी स्मृति रहती है, तुम उससे कब सीख पाते हो? सच तो ये है कि जितना ज्यादा तुम्हारे पास किसी ग़लती की स्मृति है, संभावना उतनी कम है कि तुम उस ग़लती के विपरीत कुछ कर पाओगे। ये बात सुनने में अजीब लगेगी पर बात बिलकुल ठीक है, समझना इस बात को। तुम्हारे अगर किसी ग़लती कि १०० बार की स्मृति है, तो इसका मतलब समझते हो क्या है? वो ग़लती तुम्हारी गहरी आदत बन चुकी है, नहीं तो १०० बार स्मृति कैसे रहती।

तुम्हारे पास अगर किसी ग़लती की १०० बार स्मृति है, ऐसे करी थी। उस ग़लती के बारे में एक-एक बात जान गए हो, पता है न, ऐसे करता हूँ, फिर ऐसे कर हूँ, फिर ग़लती कर देता हूँ, सब कुछ जान गए हो, सारे तरीके समझ गए हो तुम अपनी गलती के, तो इसका मतलब समझते हो, जानते हो क्या है? ग़लती तुम्हारी गहरी आदत बन चुकी है, वो ग़लती तुम हो। उसके बारे में बाद में सोच के नहीं उसे बदल पाओगे, क्योंकि वो सोचने वाले भी ‘तुम’ हो,

अपने आप को बदलो, ग़लती को नहीं बदलो।

इस दृष्टि को समझियेगा, गलती को बदलने की कोशिश मत करिए, ग़लती सुधारने की कोशिश मत करिये, स्वयं को सुधारिए क्योंकि आप ही वो हैं जो बार-बार गलती करता है।

श्रोता१: आचार्य जी, मतलब जब-तक किसी का अनादर न करो तब-तक आदर करने की जरूरत नहीं? और आदर करके आप अपनी ग़लती सुधार रहे हो आप खुद को नहीं सुधार रहे।

आचार्य जी: अनादर, आदर तुम जैसे हो वहीँ से निकलेगा न? अगर तुम्हारा मन गन्दा है, तो तुम्हारे अनादर की भी क्या कीमत और तुम्हारे आदर की भी क्या कीमत? तो बात इसकी नहीं हैं कि तुम किसी का अनादर या किसी का आदर करते हो। तुम जो भी कुछ कर रहे हो, वो सिर्फ परिणाम है तुम्हारे होने का। नहीं समझे? तुम किसी को गाली दो, चाहे तुम किसी की तारीफ करो, तुम अगर झूठे आदमी हो तो वो गाली कैसी होगी? और तारीफ कैसी होगी?

श्रोता: झूठी।

आचार्य जी: तो बात आदर-अनादर की नहीं है, बात तुम्हारे होने की है, मैं कैसा हूँ। मैं जैसा हूँ वैसे ही मेरे शब्द होंगे, वैसी मेरी गाली वैसे मेरा आदर।

श्रोता१: आचार्य जी, इसी संदर्भ में अभी थोड़ी देर पहले ही आपने ऐसे बोला था कि दूसरा मन जाग जाता है, लेकिन आप खुद ही बदल जाइए, ये कैसे बदलाव आते हैं? गलती का परित्याग भी करना है, लेकिन ख़ुद को बदलना भी है। कैसे वो गलती जो है उसका परित्याग भी कर देगा?

आचार्य जी:

आप जगे हुए ही रहते हैं। जब आप स्वभाव विपरीत चलने की ठान्ते हैं, जब आप असम्भव को संभव बनाने की कोशिश करते हैं, तब जीवन में जटिलताएँ आ जाती है क्योंकि आप वो करना चाह रहे हैं, जो हो नहीं सकता।

पर लगे हुए हैं कि करूँगा तो है ही। आप तो नये है ही, जीवन अपने आप में प्रकट सत्य है। पर आप ठान भी लेते हैं, संस्कारों के वशीभूत हो करके, उनको महत्व दे के कि मुझे जुड़के रहना है अतीत से, नहीं तो सब तो है ही, थमा हुआ है, सब कुछ है। देखिये ध्यान और प्रेम कोई सीख के नहीं आता, किसी पाठशाला में सिखाये नहीं जाते, वो तो लगातार अपना काम करते ही रहते हैं। आप उनके ऊपर चढ़ के बैठ जाते हो।

आपके होंगे बड़े संस्कार कि ये सोचो और वो सोचो और ये सोचो, पर ध्यान तो उठता है, आप उसको दबाते हो, कहते हो नहीं कुछ और ज़रूरी है, आपके होंगे बड़े संस्कार कि बंधन बड़ी अच्छी बात है और ऐसे-ऐसे सीमाओं में बंधके रहना चाहिए और ये वर्जनाएँ उचित हैं। पर मुक्ति कि चाहत तो उठती है, आप उसको दबा देते हो। आपके होंगे बड़े संस्कार कि ऐसे नहीं, ये नहीं, वो नहीं, इसकी ओर मत जाना, उससे बात न करना, उससे आकर्षित न होना, उससे सम्बन्ध न बनाना, पर प्रेम तो उठता है, आप उस प्रेम को दबा देते हो। अब आप पूँछो प्रेम कैसे उठे? अरे वो तो उठ ही रहा है, आप उसे दबानाछोड़ो न। आप बोलो मुक्त कैसे हो जायें? मुक्ति तो तैयार खड़ी है, आप उसे बार-बार दबाते हो, आप उसे दबाना छोड़ो।

सहजता यही है, जो हो रहा है उसे होने दो, क्यों उसपे चढ़ के बैठ जाते हो?

अभी कुछ नये लोग हैं, जिन्होंने आना शुरू किया है। आप भी उनमेंसे एक है उनकी बेचारों की बड़ी विकट स्थिति है, वो यहाँ पर बैठे होते है, सब ठीक, समझ में आ रहा है, सब शांति। सब ठीक ही ठीक है, कुछ है ही नहीं गड़बड़, यहाँ से जाने के बाद, जो उन्हें ठीक मिला भी होता है वो उस-पर फिर चढ़कर बैठने लगते हैं। दबाने लग जाते हैं, फिर वो उसके ऊपर सवाल उड़ेलना शुरू करते हैं। अब इधर-उधर सवाल लिखकर भेजेंगे।

एक सज्जन थे, उन्होंने मुझे सवालों की फेरिस्त भेजी इतनी लम्बी। मैंने कहा आप आए एक बार अपने एक सवाल पूँछा, आपको उसका समुचित उत्तर मिला, अपने बाकि सारे क्यों नहीं पूँछे? चलिए नहीं पूँछे कोई बात नहीं, अगली बार आईयेगा तो पूँछियेगा। वो आए ही नहीं फिर कभी, क्योंकि उन्हें उन सवालों को बचाके रखना था। ये साजिश देख रहे हो, हम कितनी रखते हैं अपने आप से।

उन्होंने एक पूँछा, वो सवाल साफ़ हो गया। उसको वो दोबारा नहीं पूँछ रहे थे। वो १०-१२ और नए सवाल ले के आ गये थे और वो सवाल सारे यूँही, कुछ जिनमें दम नहीं। तुमको एक छोटा-सा जवाब दिया गया कि छुप के पूँछने की ज़रुरत क्या है? सबके सामने पूँछिए सबका भला होगा, सब सुनेंगे। वो आए ही नहीं क्योंकि आते तो उन्हें अच्छे से पता था कि जैसे पिछला सवाल साफ हो गया, ये भी साफ हो जाएँगे और हम सवालों को साफ होने नहीं देना चाहते।

हमने तय कर रखा है कि मुक्ति को, प्रेम को दबा कर रखेंगे, उसके लिए शंकाएँ ज़रुरी हैं, उसके लिए संस्कार जरुरी है, उसके लिए सवाल ज़रुरी हैं, विचार ज़रुरी हैं, तो बड़ा डर लगता है। शांत, सहज, निर्विचार हो जाने से बड़ा डर लगता है। आप यहाँ बैठे होते हो, सब शांति है सहजता है, कुछ भी कोई कहीं जटिलता नहीं, कोई कठिनाई नहीं, सब ठीक है। बहार निकलोगे, आपके मन में १० कुल्बुले उठने लगेंगे, ये गड़बड़ है, ऐसे नहीं। अरे! तो आओ बात कर लो, अच्छा है हम भी जाने, सुने। आपको क्या लगता है? कि वो जो बाहर उठ रहा है, वो स्वभाव है। स्वभाव ये है प्रवीण, जो अभी है। एक बिलकुल निशांत खालीपन, जिसमें कुछ नहीं है, बस मौन, शांति, विश्राम। जो बाहर करोगे वो आदत है, क्योंकि अभी विश्राम ज़रूर है, पर तुम्हारा जो अशांति का बीज है, वो बचा हुआ है। वो अभी जला नहीं है।

तो बाहर जाते ही फिर से पेड़ बन जायेगा, वहाँ फिर से कुलबुलाना शुरू कर दोगे। इस बीज में भी कोई बहुत बड़ा दम नहीं है, इसलिए निर्बीज समाधी भी होती है। वो ऐसी होती जिसमे फिर वो बीज भी जल गया।

अब वो शंकाएँ उठनी ही बंद हो गयी है जो उठा करती थी। जो सारे शक उठते थे, जो सारे विरोध के स्वर भीतर से उठते थे। यहाँ आप मे से ऐसा कोई भी नहीं है, जो बातें जो मैं कह रहा हूँ, उनका विरोध न करता हो। आप अच्छे से जानते हैं, आपके भीतर एक है जो बैठा हुआ है जो कहीं न कहीं इन सारी बातों का विरोध करता है और मेरा तो धुर विरोधी हैं, हैं कि नहीं हैं? उसके मन में बड़ा गहरा विरोध है मेरे प्रति, उसे ज़िन्दा कौन रखे है? और याद रखना वो स्वाभाव नहीं है, वो तुम हो।

(हँसते हैं)

उसे तुम ज़िन्दा रखे हो न? अभी जो मेरे सामने पड़ता है तो वो लुक जाता है, वो इधर-उधर छुप जाता है। उसकी बिलकुल हालत पस्त हो जाती है। वो कहीं इधर कोने कतरे जा करके बिलकुल बीज रूप हो करके, जरा-सा हो करके ऐसे बैठ जाता है कि अरे! बाप रे! ९:३० कब बजेगा(सत्र समाप्ति का वक़्त)?

(सब हँसतें है)

तो अभी उसका होना पता नहीं चलता। तुम बाहर निकलोगे वो फिर चौड़ा हो जायेगा, ‘अच्छा क्या बोल रहे थे ये कि अतीत से असम्पृत हो जाओ, अच्छा, तो नाम कैसे याद रखूँगा, तो घर कैसे जाऊँगा, ये देखो, गलत बोला न, पकड़ लिया मैंने।’ अभी देखिएगा बाहर जाते ही वो क्या करता है। कितने तर्क देगा वो, देखिएगा। वो आप नहीं हैं। आप तो वो हैं जो अभी आप हैं, पर साथ ही साथ वो भी लगा हुआ है। उसको पोषण देना बंद करिए सब ठीक हो जायेगा, उसको पोषण आप ही देते हैं।

तुम्हें क्या लगता है की अभी ये जाएगा २ बजे, ये शांत बैठने वाला है? मैं ये नहीं कह रहा की वो नहीं उठेगा। वो उठेगा, विचार उठता है और विचार तुम्हारे संस्कार से आते हैं, तुम्हारे संस्कारों से उठता है। अगर वो वास्तविक होता तो वो अभी उठता न? अभी नहीं है ये भी तुम जानते हो।

जितना ये बात सच है की तुम मेरे विरोध में खड़े हो, उतनी ही बात ये भी सच है की तुम्हें मुझसे प्यार भी है और तुम्हारी हालत ये है की तुम्हें समझ में नहीं आता है की जाएँ तो किधर को जाएँ। कभी गाली देते हो, कभी लगता है फंस गए हैं, कभी चले भी आते हो। तुम देखो की तुम्हें उन दोनों में किसके साथ रहना है।

वो बड़ी बढ़ियाँ सी कहानी थी की हममें से हर किसी के भीतर दो भेड़िये हैं। उनमें हमेशा लड़ाई चलती रहती है। दादा हैं, वो बच्चे को कहानी सुना रहे हैं, तो बच्चा पूछता है, ‘दादा, जीतता कौन है उन दोनों में से?’ तो दादा, बड़ा सुंदर, छोटा सा जवाब देते हैं कि ‘तुम जिस भेड़िये के साथ हो वो जीत जाता है।’



शब्द-योग सत्र से उद्धरण। स्पष्टता के लिए सम्पादित।

संवाद देखें : आचार्य प्रशांत: पश्चाताप व्यर्थ है; पाप नहीं पापी को छोड़ो


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