द्वैत का मूल है अद्वैत

भाग कर के आप सिद्ध कर रहे हो कि मैं जैसा ही हूँ मैं सही हूँ, माहौल में कुछ गलती थी, दुर्घटना हो गयी थी, मैं तो यूँ ही फँस गया था। कोई बाँध के लाया था यहाँ? नतीजा जानते हैं क्या निकलेगा? नतीजा ये निकलेगा कि आप उठ कर के इस कक्ष से उस कक्ष में जाओगे, चूँकि आप ही हो यहाँ आने वाले और आप ही हो वहाँ जाने वाले। आप उस कक्ष में भी छटपटाओगे और ज़िन्दगी यही बनी रहेगी। एक कक्ष से दूसरे कक्ष में निरंतर पलायन। एक दुकान में मन नहीं लगा दूसरे पर भागे, दूसरे में मन नहीं लगा, तीसरे में भागे, तीसरे से चौथे में, चौथे से आँठवे में। भागने वाला शेष रहा, भागने वाला क़ायम रहा।

क्या छटपटा रहे हो? एक तरह का पछतावा है छटपटाहट। तुम ये साबित करना चाह रहे हो कि तुम तो कोई और हो, और ये बड़ा अन्याय हो गया है तुम्हारे साथ कि तुम यहाँ फँस गए हो।

जब तुम छटपटाते हो, तब तुम भाग जाते हो अपने आप से।

छटपटाहट हमेशा वजह कहीं और खोज ले जाती है। मूलतः तुम ही वजह हो। ये छटपटाहट तुम्हें कभी नहीं जानने देगी। इसके लिए तो रुकना पड़ेगा। और रुकने का मतलब, फिर से कह रहा हूँ, रुकने का मतलब ये नहीं है कि तुम कहना शुरू कर दो कि जो है बड़ा अच्छा है, मैंने स्वीकार किया। रुकने का मतलब ये है कि बीमार हूँ और बीमारी के तथ्य से भाग नहीं रहा।

क्योंकि सच्चाई तो स्वास्थ्य है। ये वैसी ही बात है कि कोई बोले कि, मैं झूठ बोल रहा हूँ। ये बड़ा असम्भव वक्तव्य है। अगर तुम वास्तव में झूठ बोल रहे हो, तो तुम ये बोल ही नहीं सकते कि झूठ बोल रहे हो। तो तुम बोलते कि मैं तो? सच बोल रहा हूँ। तो अनहोनी घटती है जैसे ही तुम कहते हो, मैं बीमार हूँ। अब तुमने एक पुल बना दिया है। उसके बीच में, जो तुम अपने आप को समझे बैठे हो, और उसके बीच में, जो तुम वास्तव में हो। अब तुमने दूरी मिटा दी। ये बात आप समझ रहे हैं ना, क्या कह रहा हूँ मैं? जो वास्तव में बीमार हो गया, वो क्या कह पायेगा कि मैं बीमार हूँ?

अपनी बीमारी कि खुली उद्घोषणा, अपनी बीमारी से रूबरू हो जाना। यही समझ लीजिये कि स्वास्थ्य उतर आया। स्वास्थ्य ने दस्तक दे दी। और ये बात स्वीकार से ज़रा हट के है।

सच्चा आदमी वो है, जो दोनों तलों पर, एक साथ जीए। वो कहे कि मन तो उलझा-उलझा है, दिल लेकिन तब भी सुलझा है।

अद्वैत है – द्वैत लगातार मौजूद रहे, लगातार मौजूद रहे द्वैत, तब भी अद्वैत है! अद्वैत ये नहीं है, कि द्वैत के विरोध का नाम अद्वैत है! समस्त द्वैत के मध्य, द्वैत से अछूते रह जाने को, अद्वैत कहते हैं। सर्दी और गर्मी के बीच में, आप ना सर्द हैं, ना गर्म हैं, इसको अद्वैत कहते हैं! द्वैत के बीच है अद्वैत। द्वैत का मूल है अद्वैत



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