लड़की बाद में है और इंसान पहले है।

मुझे दुसरों की बात को बेमतलब वजन तभी देना होता है, जब मुझे साफ-साफ नहीं पता होता कि क्या ‘उचित’ है और क्या ‘अनुचित।’

देखो! ग़लत धारणाओं, संस्कारों, परवरिश के कारण मन बहुत हिंसक हो जाता है। भ्रम अनिवार्यतः हिंसा बनता है। हिंसा और कहीं से नहीं आती, भ्रमों से आती है। यह जो दुनिया है ये बड़े भ्रमों से जीती है, भ्रम में। नतीज़ा है–हिंसा। हिंसा हमेशा शिकार खोजती है।

जितना ज़्यादा तुम अपने आप को लड़की समझोगे, स्त्री समझोगी उतना ज़्यादा तुम सिर्फ पुरुष के लिए शिकार बनती जाओगी, क्योंकि पुरुष की पहचान ही इसी में है वो कौन जो स्त्री का विपरीत है और जो अपने आप को स्त्री से श्रेष्ठ मानता है।

लड़की बाद में है और इंसान पहले है।



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