चालाकी नहीं, समझदारी

मन को ऐसा बनाओ कि उसे पछताना पसंद ही ना आए। मन को ऐसा कर लो कि किसी भी प्रकार की विचार प्रक्रिया उसे बोझ सी ही लगे।

मन को ऐसा कर लो कि वह भारीपन को पसंद ही ना करे।

एक बार हटाना ज़रूरी है। एक बार हटाना बहुत ज़रूरी है। जब तक हटाओगे नहीं, तब तक स्वाद नहीं मिलेगा हलकेपन का। तब तक भारीपन को आदतवश ही लिए चलोगे।

देखो हटता सिर्फ वह है जो अस्वाभाविक होता है।

स्वभाव कभी नही हटता, मात्र वह हटता है जो अस्वाभाविक होता है। अगर कुछ हट रहा है तो जान लेना कि वह महत्वपूर्ण वैसे भी नहीं है अन्यथा हटता क्यों?

मन के पास कुछ भी जानने का एक ही उपाय होता है, तुलना। डायरेक्ट नोइंग(सीधे जानने) जैसी कोई चीज़ मन के पास नहीं है।

बिमारी तो बाहरी है, लगते-लगते लगती है। वह तो स्वास्थ है, अपना है। बोझ, भार तो बाहरी है। आते-आते, आते है। निर्भार रहना तो अपना है। और अपना तो अपना होता है।

अपने आपको जितने मौके दोगे हल्का रहने के, बोझ से फिर उतना ही बचोगे।

समझना चालाकी से बड़ी चालाकी है। चालाकी तो सिर्फ चालाकी है और समझदारी महा-चालाकी है।

चालाकी नहीं, समझदारी।



पूरा लेख पढ़ें: आचार्य प्रशांत: अपने मन को हल्का कैसे करूँ?