आचार्य प्रशांत: अपने मन को हल्का कैसे करूँ?

आचार्य प्रशांत: मन बहुत होशियार है। लेकिन सिर्फ उतना ही होशियार नहीं है, जितना हम अंदाज़ा लगा रहे हैं। हम सोच रहे हैं कि उसे चाले चलने में, चतुराई दिखाने में, मज़ा आता है। ध्यान दीजिए कि उसे पछताने में भी बहुत आपत्ति नहीं है। एक क्षण को वो ऐसा हो सकता है जो सारी चालबाज़ियाँ दिखा दें और दूसरे क्षण वह ऐसा हो जाएगा जो उन्हीं चालबाज़ियों पर खूब पछ्ताले। दोनों हाथों में लड्डू हैं। जो उसे अपना फायदा करना है चतुराई देखा के, वो भी कर गया और पछता भी लिया तो चालबाज़ कहलाया भी नहीं। छवि भी गन्दी नहीं हुई। खेल लो जितनी चतुराई खेलनी है और बाद में कह लेना कि मैं क्यों इतनी चतुराई दिखता हूँ? थोड़ा पछता लेना।

सवाल यह नहीं है कि मन इतनी चतुराई क्यों दिखता है? सवाल यह है कि किस वक़्त क्या हो रहा है? मैं दो क्षण की बात करूँगा। पहला, जब वो चतुराई दिखा रहा था। कुटिलता के क्षण में क्या वाकई यह सवाल उठ रहा होता है कि क्या करूँ अपनी कुटलता का? दूसरा क्षण, जब मन यह सवाल कर रहा होता है कि कुटिलता का क्या करूँ? पहला क्षण है, जब कुटिलता है, तब यह सवाल उठ नहीं रहा होता है कि कुटिलता का करूँ क्या? तब तो कुटिलता से फायदा ही फायदा है। तब उससे किसी प्रकार की परेशानी नहीं है कि आप पूछे कि इसका करूँ क्या? फायदा ही है।

दूसरा क्षण जब यह सवाल उठ रहा है। जब यह सवाल उठ रहा है, उस क्षण में कुटिलता का मौका मौजूद है क्या? जब यह सवाल उठ रहा है, उस क्षण में चालाकी का अवसर भी है क्या? जिस क्षण में सवाल उठ रहा है, वो क्षण तो बनाया ही इस तरीके से गया है, गढ़ना ही इसी तरीके से की गया है कि तुम इस तरह के सवाल पूछ सको। दोनों मौको को देखना, ध्यान से देखना। पहले मौके में फायदा किससे था मन को? कुटिलता से। मन ने क्या कर ली?

श्रोता: चालाकी।

आचार्य जी: दूसरा मौका, जैसे अभी यहाँ बैठे हो, बनाया ही कुछ इस तरीके से गया है कि उसमें तुम आओ और चालाकी सामने रख सको। तो इस दूसरे मौके पर मन को फायदा किससे दिखता है? बात को सामने रखने से। जब तुम कुटिलता के क्षण में थे, तब भी मन क्या कर रहा था? अपना फायदा निकाल ही लिया है उसने। और जब तुम पछतावे के क्षण में हो, तब भी मन ने क्या निकाल लिया? फायदा अपना निकाल ही लिया। दोनों हाथों लड्डू है।

मन को ऐसा बनाओ कि उसे पछताना पसंद ही ना आए। मन को ऐसा कर लो कि किसी भी प्रकार की विचार प्रक्रिया उसे बोझ सी ही लगे।

साथ रहना, बात आगे बड़ेगी। कुटिलता, जाल रचना, फरेब करना, ये सब मन पर एक बोझ की तरह है। इनपर हम सभी सहमत हैं। सहज तो नहीं रह सकते उस वक़्त, कुछ ना कुछ तो करना है।

अतीत की ओर देखना, उससे ना पसंदगी ज़ाहिर करना और पछतावा करना, यह भी एक बोझ की ही तरह है। वह तुम्हारे लिए बड़े हर्ष का क्षण नहीं होता है जब तुम कह रहे हो अरे! यह मैंने क्या कर दिया एक घंटे पहले? एक घंटे पहले तुमने जो किया सो किया, लेकिन जिस क्षण में तुम यह कह रहे हो कि अरे! यह मैंने एक घंटे पहले क्या कर दिया, वह क्षण भी हल्का क्षण नहीं हो सकता। तो पछताने में और वह कृत्य करने में जिसके प्रति पछता रहे हो, एक बात साधारण है, क्या? दोनों मन को भारी करते हैं।

मन को ऐसा कर लो कि वह भारीपन को पसंद ही ना करे।

याद है कबीर का, “फुलवा भार ना ले सके।” वह कैसे होगा? कल मैं कह रहा था वहाँ पर छात्रों से कि अगर बचपन से ही तुम्हें सिर दर्द बना हुआ है, तो सिर दर्द तुम्हारे लिए कोई विशेष समस्या नहीं रह जाएगी। तुम्हें आदत पड़ जाती है सिर दर्द की अगर निरंतर सिर दर्द में ही जिए हो। इसी तरीके से कल हममें से ही एक ने एक पंक्ति भेजी थी कि तुम्हारे बालो का वज़न कितना है? यह तुम्हें तब तक पता नहीं चलता जब तक तुम बाल हटा ना दो वर्ना तो यही लगता है कि बालो में क्या वज़न होता है? आदत पड़ जाती है वज़न ढोने की। सिर के ऊपर यह बाल है, सिर को आदत पड़ जाती है, सिर पर वज़न ढोने की। सिर से बाल हटाते हो, तब पता चलता ही कि कितना वज़न लेकर चल रहे थे।

एक बार हटाना ज़रूरी है। एक बार हटाना बहुत ज़रूरी है। जब तक हटाओगे नहीं, तब तक स्वाद नहीं मिलेगा हलकेपन का। तब तक भारीपन को आदतवश ही लिए चलोगे।

और जितना अपने आप को निर्भार होने का मौका दोगे, स्वाद दोगे, उतना ज्यादा फिर मन ऐसा ही हो जाएगा कि फुलवा वह भार ना ले सके। फिर वह भार लेने से इनकार करने लगेगा। फिर वह खुद ही कहेगा कि यह क्या कर रहे हो? नहीं करना। चुप-चाप हलके बैठे थे, यह कौन सी तिगड़म सोचने लग गये? हमें सोचनी ही नहीं है कोई साजिश, कोई तिगड़म।

लेकिन वह हो, उसके लिए तुमको अपने आपको और, और, और ऐसे मौके देने पड़ेंगे जिनमें हलके रहो। जिनमें बिना सिर दर्द के रहो। तुम लोगों के लिए जो कुछ विधियाँ बनाई हैं कि यह लिखो, यह पढ़ो, यह बनाओ और रोजाना ऐसा करो, जब मिलो तो ऐसे बात-चीत करो। और जो तुमसे कहता हूँ कि इकट्ठे पाँच-छः दिन के लिए चलो मेरे साथ, वो सब क्या है? वो तुमको हलके पन का स्वाद देने की कोशिश है। जब वहाँ पांच-छः दिन रह करके लौटोगे तो खुद ही तुमको लगेगा कि हमारे पुराने ढर्रे तो व्यर्थ ही मन को बस खटाते हैं। अगर हम पाँच दिन वैसे रह सकते थे, तो क्यों नहीं सदा वैसे रह सकते? तुमको वहाँ ले जाना सिर्फ मन को एक समुचित तर्क देने की कोशिश है। मन ताकी अपने आपको ही समझा सके। अरे! मैं रह गया पाँच दिन। बहुत ना मोबाइल फ़ोन के साथ समय बिताया, ना रोजाना ई-मेल चेक करी। एक अलग ही तरीके से पाँच रोज़, सात रोज़ बहुत मज़े में रह गया।

ना अपने दैनिक दिन की ख़ट-पट में उलझा। ना रोज़ दोस्त, यारो को रिपोर्टिंग करी। नेटवर्क नहीं था तो घरवालो को भी कुछ विशेष बताया नहीं। और मज़े की बात, जब मैं ये सब कर रहा था या यह कहो कि जब मैं ये सब नहीं कर रहा था, तो मुझे जरा भी अटपटा नहीं लग रहा था। याद है कैंप से आने के बाद तुममे से कई लोग यह कहते हो कि मुझे दोषित महसूस हो रहा है। पूछा क्यों? बोले छः दिन से मैंने अपने घर पर बात नहीं की है और मुझे उसका कोई अफ़सोस भी नही है, मुझे इसलिए अफ़सोस हो रहा है। यह तो ठीक है कि छः दिन घर पर बात नहीं की क्योंकि यह तो परिस्तिथियों का तकाज़ा था, नेवोर्क ही नहीं था तो छः दिन घर बात नही की। पर मुझे अफ़सोस यह हो रहा है कि छः दिन से मुझे अफ़सोस क्यों नहीं हुआ? मैं कैसे आपने लोगों को कैसे भूल सकता हूँ?

अगर छ: दिन तक तुमने किसी को याद नहीं किया, तो यह प्रमाण है इस बात का कि तुम्हारा वह याद करना कृत्रिम है, नखली है। और याद किये बिना काम मज़े में चलता। तुमने बस एक कर्तव्य बना लिया है याद करना भी, कि बस याद करना चाहिए, कि याद आनी चाहिए, कि मन झुलझुलाना चाहिए। हफ्ते भर जब नहीं झुलझुलाया, तब जरा भी असहज हो रहे थे? तब तो नहीं हो रहे थे। तब तुम्हें याद ही नहीं आ रही थी। यह प्रमाण है इस बात का कि जिन ढर्रो पर चल रहे हो, जिन आदर्शों को पकड़ के बैठे हो, वो नकली हैं, सतही हैं, झूंठे और कृत्रिम हैं। नहीं तो काम कैसे चल जाता?

जो लोग कहते है कि हम पढ़ नहीं सकते, कैसे तुम वहाँ इतना पढ़ जाते हो? जो कहते है कि हम गा नहीं सकते, कैसे तुम वहाँ इतना गा जाते हो? जो कहते है कि हमें तो दिन में कम से कम आठ घंटे की नींद चाहिए, वहाँ कैसे पाँच घंटे में काम चला लेते हो? जो कहते है हमें पानी में डर लगता है, कैसे वहाँ पर उस उफनती नदी में घुस जाते हो? जो कहते है हम कलाबाजी नहीं कर सकते, कैसे वहाँ दस-दस कर जाते हो? कैसे? और अगर वहाँ कर सकते हो, तो देखो ना तुमने व्यर्थ ही अपने आपको बाँध रखा था, कि नहीं बाँध रखा था?

देखो हटता सिर्फ वह है जो अस्वाभाविक होता है।

इस बात को बिल्कुल ध्यान से समझ लेना ज़िन्दगी में।

स्वभाव कभी नही हटता, मात्र वह हटता है जो अस्वाभाविक होता है।

अगर कुछ हट रहा है तो जान लेना कि वह महत्वपूर्ण वैसे भी नहीं है अन्यथा हटता क्यों?

अन्यथा क्यों हटता? जितने मौके अपने आपको दोगे यह देखने के कि क्या-क्या हटा करके चैन से जीता हूँ? उतना तुम्हें स्पष्ट हो जायेगा कि तुम व्यर्थ ही मन की बातो को बोझ की तरह ढोते हो। पर उसके लिए पहले तुम्हें अपने आपको मौके देने पड़ेंगे। मौके देने पड़ेंगे क्योकि मन तर्क और प्रमाण पर चलता है। वो मौके मन को मन के ही विरुद्ध तर्क और प्रमाण देंगे। मन को समझाने के लिए अंततः कुछ तो प्रमाण चाहिए। फिर तुम कह पाओगे कि यह रहा प्रमाण। देखो कितने भले थे, कितने हलके थे। और तुम्हारे जीवन में ऐसे मौके जितने कम होंगे, तुम्हारे लिए यह जान पाना उतना ही दुष्कर हो जाएगा कि तुम कितना बड़ा बोझ ढो रहे हो।

मैं फिर कह रहा हूँ, समझो।

मन के पास कुछ भी जानने का एक ही उपाय होता है, तुलना।

डायरेक्ट नोइंग(सीधे जानने) जैसी कोई चीज़ मन के पास नहीं है।

मन के पास सिर्फ तुलना है। और तुलना करने के लिए दो पड़ले होने चाहिए। अगर मात्र एक ही प्रकार के अनुभव से ज़िन्दगी भरे हुए हो तो कष्ट तो होगा। लेकिन यह ठीक-ठीक तुम्हें पता नही चलेगा कि इससे बाहर की ओर कोई रास्ता भी है? और काम आसान है, बहुत आसान है। तुम्हें अपने आपको बहुत मौके नहीं देने पड़ेंगे। याद रखना बिमारी को लगता है बहुत समय मन को घेरने में। स्वास्थ तो स्वास्थ है, स्वभाव है ना।

कुछ झलकियाँ भी अगर मिलीं स्वभाव की, तो वे काफी होंगी यह प्रमाणित करने के लिए कि क्या है जो जीवन से गायब है? और तुम कहोगे बहुत-बहुत कीमती है जो गायब है। अब और उसको नहीं खोना।

यह था जो नहीं मिल रहा था? ऐसा हो सकता है? और अगर यह संभव है, तो मैं इसी में क्यों ना जियूँ। यह संभव है तो मुझे इसी में जीने दो ना। मुझे नहीं जाना उधर, मुझे नहीं लौटना। और यह बात फैसले की तरह नहीं आएगी। फिर यह बात उतनी ही सहज रूप से उठेगी, जैसे के एक आदमी जो अन्यथा स्वस्थ रहता हो, जब बीमार पड़ता है तो उसके भीतर से बिमारी के प्रति एक सहज प्रतिरोध उठता है। उठता है की नहीं उठता है? उसको तुम उसकी अपनी प्रतिरक्षा भी कह सकते हो।

एक स्वस्थ आदमी जब बीमार होता है तो क्या होता है? उसका जो पूरा प्रतिरक्षा तंत्र है, वह सक्रिय हो जाता है, प्रतिरक्षा। और बिमारी को हटा देता है। फिर तुम ऐसे हो जाओगे कि स्वास्थय में जीते है और ज्यों ही बिमारी का आक्रमण होता है, त्यों ही अब हमारे भीतर कुछ है जो खुद ही उसका प्रतिरोध कर देता है। उसे आने नहीं देता। उसको पसंद नहीं करता। अब मेरे तंत्र ने स्वास्थय को जान लिया है तो साथ में यह भी जान लिया है कि बिमारी क्या है?

तुम्हारा प्रतिरक्षा तंत्र ऐसे ही काम करता है कि बाहर का कोई जीवाणु वगैरा अगर शरीर में घुसे तो शरीर उसे पहचान लेता है कि यह बाहरी है, यह नहीं चाहिए। और शरीर की कोशिकायें उससे लड़ना शुरू कर देती है कि तू यहाँ से हट। तेरा यहाँ क्या काम? हम मज़े में जी रहे थे, तू क्यों चला आ रहा है? ऐसा कर लो अपने मन को कि जब फिर व्यर्थ विचार घुसे, जैसे जीवाणु बाहर से घुसता है ना शरीर में, वैसा ही विचार भी घुस्ते है बाहर से मन में। तो ऐसा कर लो मन को कि फिर जब व्यर्थ विचार घुसे, तो तुम्हारे भीतर एक प्रणाली हो, प्रतिरोध की, प्रतिरक्षा की जो सदैव सक्रिय हो जाये और कहे विचारों से कि तुम कहाँ से आ गए? मुझे तुम पसंद नही, तुम बाहरी हो। हम खुश थे पहले जैसे थे। हम अपने मौन में बहुत खुश है, हमें तुम्हारा कुलाहल नहीं चाहिए।

लेकिन उसके लिए पहले स्वास्थ को थोड़ा पाना पड़ेगा। थोड़ा सा उसमें स्थापित होना पड़ेगा। मैं थोड़ा ही कह रहा हूँ क्योंकि वो इतना हल्का और इतना आकर्षक है कि उसका थोड़ा सा स्वाद भी काफ़ी होता है।

बिमारी तो बाहरी है, लगते-लगते लगती है। वह तो स्वास्थ है, अपना है।

बोझ, भार तो बाहरी है। आते-आते, आते है। निर्भार रहना तो अपना है।

और अपना तो अपना होता है।

तुरन्त पता चल जाता है कि यह अपना है, तुरन्त। जैसे कोई पुराना रिश्ता हो। तुरन्त समझ जाते हो कि यही है, यही है। यही तो नही था ज़िन्दगी में इसीलिए इतनी उलझाने और इतना बैरोनक था सब कुछ। तुरन्त समझ जाते हो कि यही है।

अपने आपको जितने मौके दोगे हल्का रहने के, बोझ से फिर उतना ही बचोगे।

तुम चालाकियाँ सिर्फ इसलिए करते हो क्योंकि कहीं ना कहीं तुम्हें चालाकियाँ आकर्षक लगती है। मन जात ही उसकी ओर है जिसकी ओर कुछ ना कुछ फायदा दिखता है। चालाकियाँ आकर्षक लगनी बंद हो जाएँगी। तुम कहोगे इनमे क्या आकर्षण है? जो असली आकर्षक चीज़ है, वह कुछ और है। और हमें वही करने दो, हमें वहीं रहने दो।

उसका अर्थ यह नहीं है कि फिर तुम भोंदू हो जाओगे क्योंकि मुझे पता है कि मन की चालाकियों का एक तुरन्त तर्क यह भी आएगा कि चालाक ना रहे तो बेवकूफ बनेंगे। इस ज़ालिम ज़माने में जाएँगे कैसे? लोग हमारी नाक, कान, हाथ, पूँछ सब काट के ले जाएँगे। हम नही चालाक होना चाहते। दूसरे चालाक है तो इसलिए, सिर्फ अपनी सुरक्षा के लिए। ठीक वैसे जैसे की कोई देश नहीं कहता है आज-कल कि ‘वॉर मिनिस्टर,’ कहा जाता है ‘डिफेंस मिनिस्टर’ और कभी कोई पूछता नहीं कि किससे डिफेंस कर रहे हो? हर देश सिर्फ डिफेंस कह रहा है, वॉर-मिनिस्टर कोई कह ही नहीं रहा। जब कोई वॉर करने वाला नही है तो फिर किसके विरुद्ध रक्षा की जरूरत है? यह तो वैसे ही। तो मन तर्क देता है कि हम नहीं चालाक है पर दूसरे करेंगे तो थोड़ी बहुत हमें भी आनी चाहिए ना।

समझोगे, और

समझना चालाकी से बड़ी चालाकी है।

चालाकी तो सिर्फ चालाकी है और समझदारी महा-चालाकी है।

समझोगे, और समझोगे सब कुछ। चालाक सिर्फ इतना समझता है कि चाल क्या है? समझदार यह तो समझता ही है कि चाल चली जा रही है और क्या चाल है। वह उसके अलावा भी बहुत कुछ समझता है। समझदार व्यक्ति वह सब जानता है जो एक चालाक मन जान रहा है। ऐसा नहीं है कि वह उन बातो को नही जानता है। उसे सब दिखाई देता है। उसे कुछ कम दिखना नहीं शुरू हुआ। उसे कुछ ज़्यादा दिखने लगा है।

कोई तुम्हारे सामने बैठ कर चालाकियाँ कर रहा होगा, तुम्हे उसकी बातो का एक-एक पुर्जा साफ़-साफ़ नज़र आएगा, अलग-अलग।ये, यह चाहता है, ये, यह चाहता है और तुम्हें सब नज़र आएगा और तुम्हें उसके अलावा भी नज़र आएँगी बातें। तुम्हें फिर उसके दुःख और काकरता भी नज़र आएँगी और तुम्हें यह भी नज़र आएगा कि यह सब कह करके वह सिर्फ अपने लिए पीड़ा का इन्तेज़ाम कर रहा है।

चाल भी नज़र आएगी, चाल का उद्गम भी नज़र आएगा। और चाल का अंजाम भी नज़र आएगा। सब जानोगे, बेवकूफ नहीं हो गए। मंदबुद्धि नही हो गए। बुद्धि अपना काम करेगी पर अब सद्बुद्धि होगी। तो अंततः इतना ही कह रहा हूँ कि

चालाकी नहीं, समझदारी।

चालाकी नहीं, समझदारी। और जिन लोगों को चालाकी से आकर्षण हो, वो इसको इस रूप में कहें कि समझदारी महा-चालाकी है। तो उन्हें अच्छा सा लगेगा कि देखो हमारा कोई पदावनति नहीं हो गई है कि पहले चालाक थे, अब चालाक नहीं रहे, भोंदू हो गए। वह अपने आपको यह कह कर समझा सकते हैं कि पहले सिर्फ चालाक थे, अब महा-चालाक हैं। तो तरक्की हो रही है। घबराने की कोई बात नहीं। अब महा-चालाक है।



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निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं :-

१. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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२: अद्वैत बोध शिविर:
अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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४. जागरुकता का महीना:
फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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७. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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८. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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९. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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१०. बोध-पुस्तक
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