दूसरों की तरफ देखना बंद करो

आचार्य प्रशांत: इसे लागू करें । आपने लिए खोजें और दूसरों को न सुनें कि कोई बता रहा है कि ये कर लो, वो कर लो । तुम्हें दुनिया में हज़ार तरह के स्ल्ह्कार मिल जाएंगे । देने का एक मात्र मूल्य आपकी स्वयं काबिलियत है । और इसके अलावा कोई सलाह और मत दे देना । और देखो मैं कितनी खतरनाक सलाह दे रहा हूँ, पहले से कई लोगों के चेहरे उतरे हुए हैं कि आचार्य जी और कोई सलाह दे दीजिये, ये मत दीजिये । क्योंकि इस सलाह का आपने जैसे ही पालन किया, ये विशेषज्ञ को ठेंगा दिखाने वाली बात है – “मैं तुम्हारी नहीं सुनूंगा !”

श्रोता: अपनी करुँगा ।

आचार्य जी: तो इसलिए आप को डर लग रहा है । आपने चेहरे देखो, कितने डरे हुए हो तुम, के ये कर कैसे दें ।

श्रोता: आचार्य जी, अभी जो आपने हमें इतना सारा बताया है, तो क्या आप ये अपने जीवन में लागू करते हैं?

आचार्य जी: क्या फर्क पड़ता है? अभी भी जो उसने सवाल पूछा, उसने क्या पूछा? “आप बता दो”, तुमने क्या सवाल पूछा? “आप करते हो क्या?”

और मैं तुमसे क्या कह रहा हूँ? ये तुम्हारी ज़िन्दगी है, मेरी नहीं ।अंदर देखो, न की बाहर । तुम ज़िन्दगी भर दूसरों से यही तो पूछते रहे हो ना, कि तुम क्या करते हो और तुम क्या करते हो? अब फिर मुझसे पूछ रहे हो, आप क्या करते हो?

(छात्र हँसते हैं)

और मैं तुम्हें बता दूँ, तो उससे फर्क क्या पड़ेगा? और मैं तुम्हें बता भी दूँ के मैं क्या करता हूँ, तो क्या तुम समझ पाओगे? आप क्या हैं, क्या आप वास्तव में समझ सकते हैं ? तुम्हें अपनी ज़िन्दगी समझ नहीं आती, तुम मेरी समझ लोगे?

सबसे पहले, अपने आपको देखो और उसका रास्ता ये है, कि पहले दूसरों की तरफ देखना बंद करो ।

सिर्फ तभी तुम स्वयं को देख पाओगे।



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