अरे! क्या बिगड़ जाएगा?

भय आये, तो पूछिए अपने आपसे कि भय जो कुछ भी मुझे कह रहा है, जो भी कहानी सुना रहा है, वो कहानी अगर वास्तव में सच्ची है भी, तो भी क्या ?

अरे! क्या बिगड़ जाएगा?

ज़रूरतें अपनी कम रखिये, माँगें अपनी कम रखिये । जितनी आप अपनी ज़रूरतें और माँगें कम रखेंगे, भय के पास उतने कम उपाय होंगे आप पर हावी होने के ।

जो कुछ भी पक्का है कि आपसे छिनेगा,

क्या वो वास्तव में आपका है भी?

जो वास्तव में आपका है,

उसको ले कर के आपको कौन डरा सकता है ।

जो तुम्हारा नहीं है, उसको ‘मैं’ से मत जोड़ो ।

उससे ममता मत बैठाओ ।

और निराश होने की ज़रुरत नहीं है, बहुत कुछ है जो तुम्हारा है ।

पर उसका पता तो तब लगे ना, जब उस सब से ज़रा तुम्हें मुक्ति मिले जिससे बंधे बैठे हो ।

जिन्होंने जाना है, उन्होंने समझाया है कि जो चीज़ छिनने को तैयार ही लगती हो,

उसको तुम जाने दो ।

जो भी असली है, वो पाने के लिए आपको क़ीमत नहीं चुकानी पड़ेगी !

हाँ, अहंकार झुकाना पड़ सकता है, सर झुकाना पड़ सकता है ।

डर-डर के जो भी पकड़ोगे, पहली बात तो वो पकड़ने के क़ाबिल नहीं होगा, दूसरा, उसे पकड़ नहीं पाओगे ।

प्रेम में पकड़ना दूसरी बात होती है, वहाँ ऊपर-ऊपर से पकड़ना होता है, भीतर-भीतर से तो ‘प्राप्ति’ होती है ।

प्रेम में प्रयत्न होता है ऊपर-ऊपर और डर में, तुम कितना भी प्रयत्न कर लो, भीतर भीतर दूरी ही रहती है,

प्राप्ति कभी नहीं होती ।



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