अपूर्णताओं का विसर्जन

मोक्ष प्राप्ति नहीं है, मुक्ति है; उससे, जिसका आपने संचय कर रखा है। प्राप्त तो बहुत कुछ हम करे बैठे हैं। मोक्ष प्राप्ति नहीं है, प्राप्ति से मुक्ति है।

धर्म फिर है क्या? धर्म का पर्याय है ‘औचित्य’। क्या धर्म है, ये प्रश्न बिलकुल यही है कि ‘क्या उचित है?’

एक ही ‘धर्म है’, वो, जो वापस आपको आपके घर तक ले जाए। जो मन को आत्मा तक ले जाए। जो अहंकार को परमात्मा तक ले जाए, वही ‘धर्म’ है, उसके अलावा ‘धर्म’ नहीं।

भ्रम का पीछा करने से भ्रम नहीं मिटता। भ्रम मिटता है, भ्रम को भ्रम जानने से।

आप कमी को पूरा करने की कोशिश छोड़ो, कमी ही खत्म जो जाएगी।

‘धर्म’ वो नहीं है, जो अपूर्णताओं को पूर्ण करता हो। धर्म वो है, जो अपूर्णताओं को विसर्जित कर देता हो|

जो मन छिटका है, संकल्प भर कर ले वो, तो बोध अभी है, क्योंकि आप कहीं पर भी हैं, ध्यान की शक्ति कभी आपसे नहीं छिनी।

सच्चाई की ताकत से, सच्चाई को देखो, और फिर सच्चाई की ताकत से, सच्चाई में जियो। यही ‘मोक्ष’ है।



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