ख़ास दिन का इंतज़ार क्यों?

मनोरंजन से उदासी ख़त्म नहीं होती, सिर्फ कुछ समय के लिए छुपती है और जो चीज कुछ समय के लिए छुपती है वो कुछ समय बाद और ज़्यादा बल लेकर के प्रकट होती है ।

उसी से ‘आप हैं,’ उसी से ‘ये शब्द हैं,’ उसी से ‘मैं हूँ,’ उसी से ‘आपका सुनना यह है;’ यही संसार में जीने की कला है ।

दुनिया ख़ास दिन इसलिए मनाती है, ताकी उसकी बीमारियाँ कायम रह सकें ।

जब कर्तव्य आपकी अपनीं समझ से निकलता है, तो उसका नाम ‘धर्म’ हो जाता है ।

जब ‘कर्तव्य’ सिर्फ़ नैतिकता के उद्देश्यों से आता है, तो वो ‘कोरा-कर्तव्य’ कहलाता है । ‘कर्तव्य’ जब ‘आत्मा’ से प्रस्फुटित होता है तो उसी का नाम ‘धर्म’ होता है ।



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