खुदा कौन?

‘मन’ को बचाए रखने, ‘मन’ को सुरक्षित रखने का बड़ा सुगम तरीका है किसी एक तरह के आचरण को पकड़ लेना और उसको दोहराए चले जाना।

हममें से जिसके पास भी कुछ ऐसा है जो पूरी तरीके से निषिद्ध है, जिसको खोल देने की बात सुन कर ही हमें पसीना छुट जाता हो, चाहे वो कोई कर्म हो, और चाहे वो जीवन का कोई राज़ हो। वो समझ ले कि वही उसकी हथकड़ी है। उसी ने उसको जकड़ रखा है।

भाई, खुदा कौन? जो सबसे बड़ा, और जो सबसे बड़ा खुद को ही माने बैठा हो, जो सबसे बड़ा अहंकार को ही माने बैठा हो, वो तो खुद को ही खुदा जान रहा है ना? कि गुरु से भी बड़ा अहंकार है। (हँसते हुए) गुरु से भी बड़ा अहंकार है। तो फिर तुम तो एक खुदा को भी नहीं मानते हो। तुम काहे के मुस्लमान हो? जो कहे कि दो खुदा है वो काहे का मुस्लमान?

दिक्कत हमेशा आतंरिक ही होती है, हमारे अपने होश में होती है। लेकिन मुश्किल तो है ना, मुश्किल तो है।

जो भी कुछ जीवन में बड़ा कीमती मान रखा है, उसी पे ध्यान दो, वही बंधन है।

तुमने अगर यह मान लिया है कि एक ही सूचक था और उसके बाद अब कोई और नहीं हो सकता, उसके अतिरिक्त में किसी और से नहीं सीख सकता तो पागल ही हो तुम।

यहाँ पर एक बात है कि कभी तिलमिलइए तो जान जाईये कि कुछ लग गया है। कुछ है अब इसमें मेरे लिए।

तुम वो हो जिसेको सदा रोशनी बाहर से चाहिए, और रात है बड़ी अँधेरी। तुम्हें तो मैं कुछ भी सिद्ध नहीं कर सकता।

तुम इतना तो कर ही सकते हो कि कम से कम अपने कान और अपने मन को थोड़ा दूर हटाओ। ऐसे पढ़ो जैसे बच्चा पढ़ता है। बिलकुल ऐसे कि पहली बार पढ़ रहे हो। यह मान के नहीं कि गीता है तो मान ही लेना है, या कि किसी ने इसका अर्थ पहले बता रखा है तो मुझे पता ही है। यह मान के नहीं। किसी भी दृष्टी के साथ उस पे मत जाओ।



पूर्ण लेख पढ़ें: तुम्हारी व्यवस्थाओं का केंद्र है अहंकार