उपनिषद् ब्रह्मास्त्र हैं

विद्यार्थी माने? जो विद्या पाना चाहता हो| जो विद्या कि इच्छा रखता हो|

अविद्या माने क्या? अविद्या माने वो जो इन्द्रियगत है और मानसिक है|

लेकिन माया से आगे आपको वही ले जाता है जो स्वयं माया ना हो; मानसिक गतिविधि का दायरा वही तोड़ पाता है जो स्वयं मानसिक ना हो| एक नया विचार आपको निर्विचार नहीं बना सकता|

मन जिस में भी रत होगा, वो क्या होगा? मन की ही कोई गतिविधि|

उपनिषद् ब्रह्मास्त्र हैं|

विचित्र है अवस्था उनकी, जिनकी यात्रा शुरू ही नहीं हुई पर बहुत बुरी है अवस्था उनकी, जिनकी यात्रा शुरू तो हुई पर वो रास्ते में ही, थक के थम गए| रास्ते से उतर गए या वापस लौट गए| जो शुरू करे, उसे आखिरी मंज़िल तक जाना ही होगा और उस से ज़्यादा अभागा कोई नहीं, जिसने शुरू किया पर पथचित हो गया |

सत्य कोई गतिविधि नहीं है, वो कोई किताब नहीं है, वो कोई विचार नहीं है, वो कोई मंत्र नहीं है, वो आधार है| वो आसन है, बुनियाद है|

जिसको उपनिषद मिल गया, और जिस पर उपनिषद् बेअसर गया, उसका नर्क होता है भीमकाय!

सत्य के पास, ऋषि के पास, उपनिषद् के पास, गुरु के पास तब आइये जब आपने जाँच-पड़ताल पूरी ख़त्म कर ली हो| संदेह की कसौटी पे नहीं कसा जाता है| जो संदेह ले कर के आएगा वो संदेह में ही रह जाएगा|



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