नैतिकता और अध्यात्मिकता

नैतिकता हमेशा सामाजिक होती है, वो दूसरे को ध्यान में रखती है | नैतिकता कहेगी “सत्य बोलो”, आध्यात्म कहेगा “सत्य जानो”|

इसलिए क्योंकि जब तक क्षमा नहीं करोगे तब तक तुम्हारे मन पर दूसरों का वर्चस्व रहेगा और जहाँ दूसरे मौजूद हैं वहाँ आत्म तक कैसे पहुँचोगे?

और बहुत गहरा नुकसान होता है, जब आपके हाथों कोई ऐसा वक्तव्य पड़ जाए जो आपके अहंकार को बस पुष्ट करेगा|

गुरु वो जो तुम्हें बता सके कि इस समय पर तुम्हें क्या उचित है, पर नहीं, तुम्हारा अहंकार तुम्हें दर-दर भटकाता है और तुम वहाँ से वही उठा लाते हो, जो तुम्हें नहीं उठा के लाना चाहिए|

सत्य को आप नहीं जानते लेकिन इतना आप बखूबी जानते हो कि आपने कौन-कौन से भ्रम पाल रखे हैं|

प्रकाश बिंदु से, बोध-बिंदु से जो भी कुछ निकलेगा वो दूसरे के मन पर और संस्कार नहीं चढ़ाएगा और एक अव्यवस्थित मन से, संस्कारित मन से जो भी कुछ निकलेगा वो दूसरों के मन को भी संस्कारों की, धारणाओं की और परतें ही देगा|

पूरा यदि तुम कुछ भी समझ सको, तो तुमने पूरा समझ लिया, एक साधे सब सधे|



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