गुणातीत हो जाओ

सत्य संसार दोनों एक साथ हैं, दोनों एक साथ हैं।

शरीर वैसा ही हो रहे, जैसा वो आत्मा के समक्ष समर्पित होने पर होता है, तो समझ लो वो वास्तव में समर्पित हो गया।

इस्लाम ये ही तो करता है, वो कहता है हर बच्चे के नाम के साथ उसका नाम जोड़ दो,

निर्गुण के जो गुण हैं, उनको जब सगुण धारण कर लेता है, तो वो गुणातीत हो जाता है।

पढ़ते तो शब्द हो, पर नि:शब्द में पहुँच जाते हो, वो दोहराना, वो बहुत जरुरी है, जप ये ही है, जप ये ही है।

तुम जितना लिखोगे, तुम उसके साथ जितना रहोगे, तुम पाओगे कि तुम्हे उसके ऐसे-ऐसे अर्थ पता चल रहे हैं, बोध ऐसे उद्घाटित हो रहा है, जैसे पहले कभी पता ही नहीं था,

१०० बार नहीं सुना तो क्या सुना?

कबीर एक है, पर कब्रिस्तान बहुत सारे हैं।



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