जीवन माने कर्म

जीवन माने कर्म 

 

सत्य की जो व्यवस्था होती है, वो होती तो बड़ी सुन्दर है, लेकिन आदमी के अनुमान से अतीत होती है ।

 

मानसिक व्यवस्था से, सामाजिक व्यवस्था से ऊँची होती है प्राकृतिक व्यवस्था ।

व्यवस्था की परिभाषा ही यही है, जहाँ तुम्हें शान्ति है, वहाँ तुम कह सकते हो, “व्य” “वस्था” है । तुम सही अवस्थित्त हो ।

तुम सही अवस्थित हो, इसी को व्यवस्था बोलते हैं ।

 

पहली तो ये कि चलना तो? ज़रूरी है । दूसरी बात ये कि तय कर लो कि किसके कहे पर चलना है, किसकी व्यवस्था पर चलना है? दुनिया के कहे पर चलना है? प्रकृति के कहे पर चलना है? या सत्य के कहे पर चलना है । चलना तो है ही ।

अर्जुन अगर कहता है कि वो लड़ाई नहीं करेगा।, तो वो भी एक कर्म है, और उसका भी फल मिलेगा, और अगर वो लड़ता है, तो वो भी कर्म है, उसका भी फल मिलेगा ।

 

बुद्ध भी, पहले दौड़े थे, फिर थमे थे ।

सही दौड़ लगाओ ।

 

प्रकृति परमात्मा नहीं होती ।



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